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(दीपशिखा गुसाईं)

किसी भी संस्कृति और त्यौहार की पूरी जानकारी जरुरी है ,,जो इस पर्व को मनाते और जो इनसे अछूते,, हम ऐसे देश में जहाँ हर एक पर्व को चाहे वो किसी भी क्षेत्र का हो पूरी श्रद्धा से मान दिया जाता है ,,,
यह चार दिवसीय अनुष्ठान है,,इस में साक्षात दृष्टिगत देवता सूर्य की उपासना होती है।पहले दिन शुद्ध भाव से पूरी सफाई के बाद आम की टहनी से,मिट्टी के बने चूल्हे पर लौकी की सब्जी,अरवा चावल,चने की दाल से भोजन करना होता है।रात्रि में भी शुद्धता के साथ भोजन की क्रिया निबटाई जाती है।इसे “नहाय-खाय” कहते हैं।

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दूसरे दिन लगातार बारह घंटे तक निर्जला रह कर,संध्याकाल में स्नानोपरांत मिट्टी के चूल्हे पर दूध,गुड़ और चावल का खीर बनाना पड़ता है व्रती को।धोये हुए गेहूँ को सूखाने के बाद धोये हुए मशीन से पीसे गये आटा से रोटी बना कर घी के संग,मूली,अदरख के संग अग्रासन निकाल कर पहले कौर को अग्नि को समर्पित करते हुए प्रसाद ग्रहण किया जाता है।अग्रासन में निकले हिस्से को पूरे परिवार में प्रसाद के रुप में वितरण करना होता है।यह क्रिया ‘खरना” के नाम से जाना जाता है।
तीसरे दिन पुनः निर्जला रहते हुए अस्तगामी सूर्य को संध्याकाल में बाँस से बने सूप पर उपलब्ध केला,सेव,ठेकुआ(आटा-गुड़ से विशेष रुप से बनाया गया एक व्यंजन),नारियल आदि से नदी-पोखर में स्नान कर अर्घ्य दिया जाता है।इस क्रिया के बाद रात्रि में सोने का आसन जमीन पर होता है और रात भर दीप प्रज्वलित रखना पड़ता है उस प्रसाद के सामने।
. पुनः चौथे दिन(इस क्रिया में लगातार तब तक छत्तीस घंटे निर्जला और उपवास के कठिन व्रत के क्रम में ही)नदी या पोखर पर उसी प्रसाद पर दूध की धार देते हुए उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
तत्पश्चात फूल,अगरबत्ती, धूपादि से आरती कर व्रत का समापन कर उसी प्रसाद में से कुछ मुँह में डाला जाता है।इसे “परना”कहते हैं।

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इस व्रत के प्रारंभ का इतिहास द्वापरयुगीन है।हालांकि यह लंबा होगा।हाँ,इस व्रत का दर्शन बड़ी विचित्र है।इसके अनुसार जो डूब रहा है,वह पुनः उगेगा,लौटेगा का सिद्धांत लागू होता है।पूरे व्रत के काल में हर दृष्टिकोण से स्वच्छता-शुद्धता-आध्यात्मिकता का ख्याल रखा जाता है।
जी हाँ एक बार फिर हमने सिद्ध किया कि कितनी समृद्ध और पौराणिक संस्कृति है हमारी ,,,किसी भी प्रदेश में जाओ बहुत कुछ मेल खाता है क्यूंकि ईश्वर एक ही है बस रूप उसके अलग अलग ,,और हमारी संस्कृति जैसा विशाल और समृद्ध दुनिया की कोई और संस्कृति नहीं ,,,

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“दीप”

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