प्रेम ग्रंथ सी तुम

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संजीव

इक प्रेम ग्रंथ सी तुम
अक्सर पढ़ता हूं तुमको
तन्हाई मैं…
सपनों की रंगाई में…
आइने सी तेरी परछाई मैं
घुंघरू सी आवाज में

प्रेम ग्रंथ सी तुम
अक्सर पढ़ता हूं तुमको
सांसों के स्पंदन में
उभरी बाजुओं की नसों में
सिंदूरी सी मांग
जो सुनाई देती है
धडकनों मैं तेरी,

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इक प्रेम ग्रंथ सी तुम
अक्सर पढ़ता हूं तुमको
कुरान की आयतों में
जो बहती है अक्सर
गंगा सी धारा बन के
दिल के करीब से मेरे,

सुनता हूं तुमको अक्सर
मंदिर के शंखनाद में
उफनती नदी की धारा में
अक्सर तुम सुनाई देती हो
प्रेम ग्रंथ की तरह..

ना मंदिर ना मस्जिद
अब जाता नहीं कहीं मैं सजदा करने
सुनता हूं तुमको अक्सर
धड़कती सांसे,आंखो में अमृत
गुलाबी लब,तमाम शोखी
और ख्वाब बस ख्वाब
हा सुनता हूं अक्सर
बस प्रेम ग्रंथ सी तुम..!!

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संजीव…(देहरादून )

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