“संस्कृति शिक्षा एवं नई शिक्षा नीति के परिप्रेक्ष्य में स्वामी विवेकानंद के विचारों और दर्शन की प्रासंगिकता ” विषय पर आयोजित एक दिवसीय वेबिनार सम्पन्न।

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सँवादसूत्र देहरादून/अगस्त्यमुनि: राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अगस्त्यमुनि की राष्ट्रीय सेवा योजना समिति के द्वारा स्वामी विवेकानंद की जयंती के उपलक्ष्य में एक दिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार जिसका शीर्षक “संस्कृति शिक्षा एवं नई शिक्षा नीति के परिप्रेक्ष्य में स्वामी विवेकानंद के विचारों और दर्शन की प्रासंगिकता ” का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रुप में प्रो. सुरेखा डंगवाल, कुलपति दून विश्वविद्यालय प्रो. पी.के. पाठक,निदेशक उच्च शिक्षा उत्तराखंड उपस्थित रहे एवं मुख्य वक्ता के रूप में प्रो.शिव शंकर मिश्र, विभागाध्यक्ष शोध विभाग श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली, प्रो. एम. एम. सेमवाल, विभागाध्यक्ष राजनीति विभाग केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर गढ़वाल एवं प्रो. संजय कुमार, प्राचार्य राजकीय महाविद्यालय सतपुली उत्तराखंड ने अपना उपयोगी, ज्ञानवर्धक, समसामयिक एवं सार्थक वक्तव्य प्रस्तुत किया.
सर्वप्रथम वेबिनार की संरक्षिका एवं महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. पुष्पा नेगी ने अपने औपचारिक स्वागत वक्तव्य मे कहा कि स्वामी विवेकानंद के विश्व प्रेम और भाईचारे का संदेश तथा वसुधैव कुटुंबकम …जैसे संदेश आज भी संपूर्ण विश्व को एक करने का संदेश देते हैं । प्रो. नेगी ने कहा कि आज संपूर्ण विश्व की समस्याओं जैसे आतंकवाद, सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, वैश्विक जलवायु समस्याएं आदि का समाधान विवेकानंद जी के दर्शन और विचारों में निहित है। प्राचार्य ने अपने वक्तव्य में कहा कि राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़े स्वयंसेविकों को गरीब बच्चों को पढ़ाना चाहिए तथा कोविड महामारी के कारण अपनी पढ़ाई से वंचित हो गए छात्र छात्राओं के पठन-पाठन में उनका सहयोग करना चाहिए ।

वेबिनार में मुख्य संरक्षक के रूप में उपस्थित प्रो. पी.के.पाठक,ने अपने आशीर्वचन रूपी वक्तव्य में स्वामी विवेकानंद जी के जीवन वृत्त के विलक्षण तत्वों पर प्रकाश डाला और साथ ही साथ उनके यूरोपीय देशों में भ्रमण तथा शिकागो के अद्भुत वक्तव्य का जिसे उन्होंने धर्म संसद में संबोधित किया था उस पर भी प्रकाश डाला । प्रो. पी. के. पाठक ने आगे कहा कि स्वामी विवेकानंद की दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के पूर्णत्व का विकास है जो कि पहले से ही मनुष्य में समाहित है । प्रो. पाठक ने कहा कि विवेकानंद की दृष्टि में शिक्षा केवल सूचनाओं और तथ्यों का संकलन नहीं है बल्कि वह एक ऐसी प्रणाली है जिसके द्वारा व्यक्तित्व और चरित्र के निर्माण की एक नई प्रयोगधर्मिता का विकास होता है।

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कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रुप में उपस्थित प्रो. सुरेखा डंगवाल ने अपने औजस्वी वक्तव्य में स्वामी विवेकानंद के विचारों और दर्शन के व्यापक फलक पर प्रकाश डालते हुए यह कहा कि स्वामी विवेकानंद ने प्राचीन भारतीय धर्म,संस्कृति,परंपरा,रीति- रिवाजों आदि की एक वैज्ञानिक व्याख्या पर बल दिया उन्होंने अध्यात्म विज्ञान की अवधारणा प्रस्तुत की और साथ ही साथ शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों में से नैतिक उन्नयन,चारित्रिक निर्माण और उस शिक्षित व्यक्ति के द्वारा संस्कृति, समाज और समुदाय तथा राष्ट्र के निर्माण में योगदान के अवदानों पर प्रकाश डाला ।प्रो. सुरेखा डंगवाल ने कहा कि विवेकानंद की जो विचारधारा थी वह भारत को एक विज्ञान,जनतंत्र और राष्ट्रवाद की आधुनिक विश्व की मान्यताओं के अनुकूल एक समृद्ध और एक समुन्नत राष्ट्र के रूप में रूपांतरित करने की थी।
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित प्रो.एम.एम.सेमवाल ने कहा कि विवेकानंद जी ने ऐसी शिक्षा पर बल दिया जिसके माध्यम से विद्यार्थियों की आत्मिक उन्नति के साथ चरित्र निर्माण हो सके ।प्रो. सेमवाल ने कहा कि नई शिक्षा नीति पर विवेकानंद का प्रभाव आसानी से देखा जा सकता है क्योंकि विवेकानंद जी का मानना था कि शिक्षा जीवन को पूर्ण करने वाली होनी चाहिए शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो चुनौतियों का सामना कर सके जो व्यक्तित्व के विकास के साथ आत्मनिर्भर बनाने वाली हो। प्रो. सेमवाल ने कहा कि नई शिक्षा नीति नए युग का सूत्रपात है, नई शिक्षा नीति समेकित है,नई शिक्षा नीति में समग्रता हैऔर नई शिक्षा नीति समावेशी है और नई शिक्षा नीति में एक एकात्मता का भाव है।प्रो. सेमवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि स्वामी विवेकानंद के योग,अध्यात्म, व्यवसायिक शिक्षा, कौशल विकास आदि को भारत की नई शिक्षा नीति 2020 में आसानी से देखा जा सकता है।
मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. संजय कुमार ने अपने व्याख्यान में स्वामी विवेकानंद को योद्धा और सन्यासी के रूप में चिन्हित किया और साथ ही साथ स्वामी विवेकानंद के पाश्चात्य संस्कृति और दर्शन के साथ जो वैचारिक टकराव और अंतर्विरोध था उस पर उन्होंने प्रकाश डाला और इस बात को उजागर किया कि विवेकानंद ने प्राच्य और पश्चिम,प्राचीन और आधुनिक दोनों ही धाराओं के बीच में संश्लेषण का प्रयास किया उन्होंने न तो प्राचीन संस्कृतियों को नकारने और नहीं आधुनिक संस्कृतियों को पूरी तरह से आत्मसात करने पर बल दिया निष्कर्षतः उनका यह कहना था कि स्वामी विवेकानंद दो महान संस्कृतियों के विलक्षण तत्वों को समाहित कर के भारतीय समाज और संस्कृति का निर्माण करना चाहते थे ।

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वेबिनार में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. शिव शंकर मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि स्वामी विवेकानंद आज लगभग 150 वर्षों के बाद भी भारतीय जनमानस के लिए ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व के लिए एक दृष्टांत के रूप में बने हुए हैं उन्होंने अपने जीवन को समाज के लिए समर्पित किया,संपूर्ण विश्व के सनातन हिंदू जीवन पद्धति, सनातन ज्ञान विज्ञान का जो उन्होंने प्रतिस्थापन किया वह हम सभी लोगों के लिए विशेषकर युवाओं के लिए अनुकरणीय है उनका यह मूल मंत्र था कि “उठो जागो और प्रयत्न करो तब तक प्रयत्न करो जब तक तुम्हें सफलता की प्राप्ति ना हो जाए” स्वामी विवेकानंद में यह भी भाव था कि समाज में समता की भावना होनी चाहिए इसलिए उन्होंने रामकृष्ण सेवा मिशन की स्थापना की। विवेकानंद जी का यह भी मंत्र था कि अपने लिए कोई जीना,जीना नहीं है जब तक हमारा जीवन समाज के लिए उपकारक ना हो ।सचमुच हम सभी भारतीयों के लिए और विशेषकर युवाओं के लिए आज भी स्वामी विवेकानंद अपने यश, अपनी कृति एवं अपनी प्रतिष्ठा से हमारे मध्य में जागृत हैं उनका चिंतन, उनके विचार और उनकी भावनाएं हमें सतत प्रेरणा दे रही है ।इस अवसर पर प्रो. मिश्र ने युवा छात्रों को यह संदेश दिया कि स्वामी विवेकानंद जी के जीवन से हम लोग सीखे और उनकी तरह उनके दिए गए संदेशों का,विचारों का अपने जीवन में यदि अनुपालन करें तो निश्चित रूप से यह हमारी राष्ट्र के प्रति सच्ची भावना होगी और हम अपने राष्ट्र की समृद्धि में अभिवृद्धि में अपना संपूर्ण योगदान कर पाएंगे।
कार्यक्रम का संचालन वेबिनार संयोजक जितेंद्र सिंह,कार्यक्रम अधिकारी राष्ट्रीय सेवा योजना के द्वारा किया गया एवं वेबीनार की आयोजक सचिव डॉ. मनीषा सिंह के द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया गया।इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. दलीप सिंह बिष्ट,डॉ.सीताराम नैथानी, डॉ. निधि छाबड़ा,डॉ.अंजना फरसवान, डॉ.कनिका बड़वाल,डॉ, चंद्रकला नेगी, डॉ,तनुजा मौर्य,डॉ. प्रकाश चंद फोन्दनी के साथ-साथ अन्य राज्यों एवं अन्य महाविद्यालयों के प्राध्यापकों, शोधार्थीयों एवं राष्ट्रीय सेवा योजना से जुड़े स्वयंसेवियों के साथ- साथ महाविद्यालय के छात्र छात्राए उपस्थित रहे।

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