“हिमालय दिवस पर विशेष”

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प्रतिभा की कलम से”

“शहरों की भीड़भाड़ से दूर सुकून तलाशने जब कोई इन पहाड़ों में चला आये और यहां के हसीन नजारे देख आनंदित होते हुए भूल से कोई बिसरा हुआ राग छेड़ दे और परियां से उसका सामना हो जाए तो अचरज कैसा !

बेदिनी,दयारा, रुद्रनाथ, चोपता, नंदन कानन, औली, फूलों की घाटी, बर्मी, खतलिंग, मद्महेश्वर, क्वारी पास, हर की दून, रूपकुंड, तपोवन, कल्पनाथ.. जैसे मीलों लंबे विश्व प्रसिद्ध बुग्यालों से भरा-पूरा है हमारा उत्तराखंड। उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, इसलिए बुग्यालों को भी यदि देवताओं का बिछौना कह दिया जाए तो अतिशयोक्ति न होगी।
इनकी खूबसूरती किसको ना लुभाती हों ! खूब लुभाती है। मौसम अनुकूल होते ही पर्यटक तंबू लेकर यहां आ जाते हैं। भीड़ भले ही हो जाए फिर भी शांति भंग ना होने का अनुशासन बनाए रखने के लिए स्थानीय पहाड़ी लोग ताकीद करते हैं कि इन बुग्यालों में चिमटा, मंजीरा जैसे किन्हीं वाद्य यंत्रों का प्रयोग कर शोरगुल न किया जाए, वरना परियां भी मिल सकती हैं।
परियां वो, जिनके बारे में चांचरी लोकगीतों में गाया जाता है कि यह पानी से पतली और हवा से भी हल्की होती हैं। सुंदर, सुडौल, तीखी नासिका ,गोरा रंग, लाल होंठ, मखमली अंगिया और पीली साड़ी बदन पर पहने, हाथ में बंधे रेशमी रुमाल से भंवरों और बड़ी-बड़ी तितलियों को भगाने वाली जो यौवनाएं जादुई सौंदर्य की प्रतिमान हैं।
पढ़कर आंखों में रुमान उतर आया हो तो बता दें कि यह सिर्फ महसूस होती हैं, हाथ नहीं आती। क्योंकि यह मृतआत्माएं हैं। इन कमउम्र अविवाहित परियों को आंछरी या मांतृ भी कहा जाता है।
सुंदर चीजों का मोह किसी को मरकर भी चैन नहीं लेने देता। प्रेत बन अपने हिमालय रूपी घर-आंगन में ही घूमती विचरती ये आंछरियां चेतावनी देती हैं कि पर्वत पर जहां इनका मंदिर है वहां कोई घास काटने न जाये । पीले और लाल रंग के चटक वस्त्र पहनकर जंगल में विचरण ना करें। किसी वाद्य यंत्र का प्रयोग या किसी प्रकार का कोई शोरगुल कोई वहां ना करें। जल स्रोतों पर अकेले ना आएं, गंदगी न फैलाएं।
इस तरह परियां रक्षक हुईं हिमालय की।
इरादा अंधविश्वास फैलाने का नहीं है किंतु बेदिनी बुग्याल और दयारा की ट्रैकिंग पर गए कई पर्वतारोही और पर्यटकों ने स्वीकारा है कि किसी अदृश्य ने उन्हें वहां झकझोरा भी है।
शहरों की भीड़भाड़ से दूर सुकून तलाशने जब कोई इन पहाड़ों में चला आये और यहां के हसीन नजारे देख आनंदित होते हुए भूल से कोई बिसरा हुआ राग छेड़ दे और परियां से उसका सामना हो जाए तो अचरज कैसा !
कुदरत और इंसानों के साथ साथ भूत-प्रेत भी सुंदर होते हैं पहाड़ के।
खामोशी की चंचल अठखेलियों का नाम ही परी हो शायद ! लेकिन चाहती वह भी हैं किसी से बोलना- बतियाना और अपने सुख-दुख की सुनना-सुनाना !
इस तिलिस्म की ख़ूबसूरती बनाए रखने के लिए भी ज़रूरी है हिमालय बचाए रखना।

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प्रतिभा नैथानी

1 thought on ““हिमालय दिवस पर विशेष”

  1. बहुत-बहुत शुक्रिया संवाद सूत्र

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