“कहो ओंस चाहे शबनम है ये दर्द की बूंद जख़्म पर टपकी जैसे,कोई मरहम” !

ख़बर शेयर कर सपोर्ट करें

प्रतिभा की कलम से

जो पल,जो चीज,जो स्थिति रुच जाए,उसमें कुछ देर ठहर जाना मन को सुकून देता है। सर्दी के दिनों में दिल अक्सर रुक जाता है गेहूं और जौ की पत्तियों में अटकी नन्ही-नन्ही ओस की बूंदों पर । इन ठिठुरती बूंदों की ताजगी तांबे के बर्तनों जैसी बचपन की यादों पर नागफनी के कांटे की छुअन जैसी नींबू के बूंद की खट्टी घिसाई कर मन को भी चकाचक कर जाती है।
अब छोटी बच्चियों की नाक छिदवाने सुनार के पास जाते हैं शायद। तब ऐसा नहीं था। नाक छिदवाना किसी छोटे-मोटे अनुष्ठान से कम नहीं था उस वक्त। पांच,सात या नौ बरस की लड़कियों को एक साथ बिठाकर किसी विशेषज्ञ दादी या ताई जैसी महिला से नागफनी के कांटे से नाक छिदवाने का कार्यक्रम शुरू !
आह ! दर्द तीक्ष्ण हुआ था, लेकिन आंसू निकलने से पहले ही जरा सा गुड़ का टुकड़ा झट मुंह में धर दिया था उन दादी ने । फिर जुबाँ पर न जैसे,मगर नाक पर तो दर्द रहता ही था हर पल । सुबह मुंह धुलाने की जिम्मेदारी माँ ने ले ली। धीरे से मुँह धुलाया,पोंछा इस तरह कि नाक ना दुखे । मगर वह कोई एक दिन में दूर हो जाने वाला दुख ना था । सुबह, हर सुबह गेहूं की पत्तियों से ओस इकट्ठा कर नाक में छिदी हुई जगह के आसपास टपका देतीं मां । उस दर्द या झंझट को बर्दाश्त करना ही था कि नाक में पहनने वाली लौंग का लालच जो दिया था उन्होंने। लाल नग वाली लौंग मुझे दाड़िम के लाल दाने सी लगती,और सफेद नग वाली ओस की बूंद सी लगती । इस तरह ओस वाला घरेलू मरहम लगाते- लगाते जब नाक से दर्द एकदम जाता रहा तो उसमें काँच के सफेद नग वाली लौंग पहनकर लगा जैसे असली ओस हमेशा के लिए जमा ली वहां पर ।
ये तब का रिश्ता था ओस से जब स्कूल में दाखिला भी ना हुआ था । जब लिखने-पढ़ने के दिन आए तो पढ़ा कि शिवानी जी की कहानियों में उनके बचपन का प्रिय शहर रामपुर के राजा साहब के रसोई में पकने वाला गोश्त कितना स्वादिष्ट और अलग होता था । क्योंकि खानसामा गोश्त को रातभर ओस में भीगने छोड़ देता था। फिर कहीं यह भी पढ़ा कि शरद पूर्णिमा की रात को कदम्ब के पेड़ के नीचे खीर रख दी जाए तो ओस के रूप में उस पर अमृतवर्षा होती है। प्रात: इस खीर को खाकर शरीर अनेक रोगों से मुक्त होता है । बलवान बनता है। वास्तव में इन बातों पर ओस का कोई फायदा था या नहीं,यह जानने की जरूरत कभी महसूस हुई नहीं, क्योंकि मेरी तो कोई बेटी है नहीं,जो जब पाँच बरस की होती तो मैं भी बसंत पंचमी पर उसकी नाक छिदाती । अपनी माँ से पूछती कि – “माँ ! क्या सच में ओस डालने से नाक के दर्द और संक्रमण में कोई राहत मिलेगी” ? या अगर मैं मांसाहारी होती तो माँस को ओस में लटका कर रखती,क्योंकि रामपुर का शाही बावर्ची रखता था । अब शरद पूर्णिमा की रात अगर मैं खीर को ओस में रख भी दूं तो कदम्ब का पेड़ कहां से लाऊं? मेरे घर के आगे तो आंवले का पेड़ है । लेकिन कुछ बातें ना समझी जाएं तो ही अच्छी लगती हैं, जैसे-पहेलियां ।
नागफनी के कांटे, नाक की लौंग, आंख से झरते आंसू और मुंह में गुड़ की यादों जैसा कोई अनुष्ठान गेहूं और जौ की सुकुमार पत्तियों के लिए भी है क्या,जो प्रकृति मां हर सुबह टपका देती है उनकी नाक पर ओस की बूंदे, किसी को नहीं मालूम मगर किसी पहेली की तरह ही मन को लुभाता, आंखों में झिलमिलाता ओस का अबूझ सौंदर्य खींच ही लेता है हर नजर को अपनी तरफ।
“कहो ओस चाहे शबनम
है ये दर्द की बूंद
जख़्म पर टपकी
जैसे,कोई मरहम” !

और पढ़ें  उत्तराखंड को बनायेंगे देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक राजधानी : मुख्यमंत्री

प्रतिभा नैथानी

देहरादून

                                    

2 thoughts on ““कहो ओंस चाहे शबनम है ये दर्द की बूंद जख़्म पर टपकी जैसे,कोई मरहम” !

  1. बहुत-बहुत शुक्रिया संवादसूत्र का

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *