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दीपशिखा गुसाईं

  एक बात कहूं मेरी सबसे बड़ी कमजोरी थी मैं खुद पर तो जल्दी यकीन नहीं करती पर दूसरों पर बहुत जल्दी कर लेती थी,, अकसर होता है कई बार हमारा खुद पर से तो भरोसा उठ जाता है पर दूसरों पर आँखें बंद कर यकीन कर जाते हैं,, अपनी ही खुशियों के लिये दूसरों का मुँह ताकतें रहते हैं,, पर कभी सोचा है हम कब तक दूसरों के भरोसे खुश रह सकते हैं,, धीरे से ही सही खुद पर भरोसा रखना सीखना पड़ता है,, 

  हाँ सच कहूं तो हम एक ऐसे समाज का हिस्सा बनते जा रहे जिसने खुद पर से यकीन करना बंद कर दिया है,,मैंने भी अब तक कई भूमिकाएं ओढ़ी पर शायद ही किसी मैं अपनी पहचान बना पाई हूँ,, मैंने खुद अपने जीवन मैं विस्तार तो किया और शायद हम सभी करते भी हैं,, 

  इसीलिए मैंने भी सीखा कि जीवन बहते हुए पानी जैसा है तो मैं भी क्यों न लचीली बन जाऊं,, और हर एक मोड़ पर कुछ नया सीखूं और कुछ नया करूँ,, अब मैं सामाजिक दबाओं के खिलाफ डटकर आवाज भी उठाती हूँ,, 

   अकसर लोगों को कहते सुना 30 के बाद तो जिंदगी का ग्राफ ढलान पर होता है,, पर ऐसा नहीं है 30 के बाद के इन सालों मैं जब इस ढांचे मैं खुद को फिट करने कि कोशिश की तो कई बार थक भी गई थी ,, तब सोचा मैं इस बने बनाये सांचे मैं ढलने की कोशिश ही क्यों कर रही क्यों न मैं अपना खुद का ढांचा निर्मित करूँ,,,

हाँ जो मैं कहना चाह रही थी वह यही है कि अपनी जिंदगी के लिये हमें दूसरों के विश्वास को ढोने की जरुरत ही नहीं,,, हम जैसा जिंदगी को बनाते वैसी ही बनती चली जाती है,, इसलिए मैं तो यही कहूँगी,, ये 30 से 50 की उम्र का रोना न रोयें,, अकसर कई लोग बर्फीले पहाड़ों पर कई दिन और रातें गुजारते  हैं,, पहाड़ों को चटखते देखते  है,कई  बार उनमें समाते अपनों को देखते  हैं ,, जमींदोज होते घरों मैं चीखते बच्चों की अंतिम चीख तक सुनते हैं ,, बावजूद इसके फिर भी वो जी रहे होते हैं,, 

    मतलब जिंदगी कभी एक जगह ठहरती नहीं है,, लोग क्यों अकसर परेशान हो जाते अपनी छोटी सी परेशानियों  को सोचते हुए और उसे नासूर बना देते हैं,, 

    बस जरुरत उस दुनियाँ को अच्छे से जानने की जिसमें आप सपने देखते हैं और अगर ऐसी कोई दुनियां नहीं भी है तो आप खुद पर विश्वास कीजिये और बना डालिये ऐसी दुनियां जिसमें आप अपने सपनों को साकार कर सकें,,,,  

दीप

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