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(नीरज कृष्ण)

“बच्चे काम पर जा रहे हैं जेहन में लगातार चोट कर रही हैं।”

साधारण से शब्दों वाली कविता की इस पंक्ति ने मन का कोना-कोना तार-तार किया है। कविता में एक अन्य पक्ति है कि “क्या तमाम खिलौनों को धरती खा गयी या आसमान निगल गया, क्या सब किताबों को दीमक ने खा लिया?” सौधा सा अर्थ है कि आखिर ऐसा क्या हो गया है कि बच्चे काम पर जा रहे हैं? मानव जीवन की उम्र का सबसे सुंदर पड़ाव माना जाता है बचपन जब ना कोई फिक्र ना कोई चिंता अगर कुछ होता है तो माता-पिता का प्यार-दुलार और ममता, लेकिन हर बच्चे के भाग्य में यह सुख नहीं होता। बहुत से बचपन ऐसे भी हैं जिन्हें भर पेट भोजन भी नसीब नहीं है और अपना और अपने परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ भी अपने मासूम कंधों पर उठये हैं। यह बाल श्रमिक हमें समाज में यत्र तत्र कहीं भी दिखाई दे जाते हैं और यह सिर्फ भारत की ही नहीं समस्त विश्व की समस्या है। संयुक्त राष्ट्र बाल श्रम को ऐसे काम के रूप में परिभाषित करता है, जो बच्चों को उनके बचपन, उनकी गरिमा और क्षमता से वंचित करता है, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। बच्चों के स्कूली जीवन में हस्तक्षेप करता है। बाल श्रम आज दुनिया में एक खतरे के रूप में मौजूद है। आज के बच्चे कल के भविष्य हैं। देश की प्रगति और विकास उन पर निर्भर है। लेकिन बाल श्रम उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर चोट करता है। कार्य करने की स्थिति, और दुव्र्व्यवहार, समय से पहले उम्र बढ़ने, कुपोषण, अवसाद, नशीली दवाओं निर्भरता, शारीरिक और यौन हिंसा, आदि जैसी समस्याओं के कारण ये बच्चे समाज की मुख्य धारा से अलग हो जाते है। यह उनके अधिकारों का है। यह उन्हें उनके सही अवसर से वंचित करता है जो अन्य सामाजिक समस्याओं को ट्रिगर कर सकता है।

बाल श्रम एक वैश्विक चुनौती है। बाल श्रम को लेकर अलग-अलग देशों ने कई कदम उठाए हैं। बाल श्रम से निपटने के लिए हर साल 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवसके रूप में मनाया जाता है। विश्व बाल श्रम • निषेध दिवस की शुरूआत साल 2002 में इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन द्वारा की गई थी। इस दिवस को मनाने का मकसद बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा की जरूरत को उजागर करना और बाल श्रम अलग अलग रूपों में बच्चों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघनों को खत्म करना है। हर साल 12 जून को मनाए जाने वाले विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के मौके पर संयुक्त राष्ट्र एक विषय तय करता है। इस पर अलग-अलग राष्ट्रों के प्रतिनिधि, अधिकारी और बाल मजदूरी पर लगाम लगाने वाले कई अंतराष्ट्रीय संगठन हिस्सा लेते हैं, जहां दुनिया भर में मौजूद बाल मजदूरी की समस्या पर चर्चा होती है। दुनिया भर में ऐसे कई क्षेत्र हैं जहां बच्चों को मजदूर के रूप में काम पर लगाया जा रहा है। पहले बच्चे पूरी तरह से खेतों में काम करते थे, लेकिन अब वे गैर-कृषि नौकरियों में जा रहे हैं। कपड़ा उद्योग, ईंट भट्टे गत्रा, तम्बाकू उद्योग आदि में अब बड़ी संख्या में बाल श्रमिकों को देखा जाता है। अशिक्षा के साथ गरीबी के कारण, माता-पिता अपने बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलवाने के बजाय काम करने के लिए मजबूर करते हैं। पारिवारिक आयमजबूर करते हैं। पारिवारिक आय की तलाश में, माता-पिता बाल श्रम को प्रोत्साहित करते हैं। अज्ञानतावश वे मानते हैं कि बच्चों को शिक्षित करने का अर्थ है धन का उपभोग करना और उन्हें काम करने का अर्थ है आय अर्जित करना। लेकिन वे ये नहीं समझते कि बाल श्रम काम नहीं होता बल्कि गरीबी को बढ़ाता है क्योंकि जो बच्चे काम के लिए शिक्षा का त्याग के लिए मजबूर होते हैं, वे जीवन भर कम वेतन वाली नौकरियों में बर्बाद होते हैं

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संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूपभारत का संविधान मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धातों की विभिन्न धाराओं के माध्यम से कहता है- 14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्टरी या खदान में काम करने के लिये नियुक्त नहीं किया जाएगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जाएगा। बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून 1986 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को किसी भी अवैध पेशे और 57 प्रक्रियाओं में, जिन्हें बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिये अहितकर माना गया है, नियोजन को निषिद्ध बनाता है। इन पेशों और प्रक्रियाओं का उल्लेख कानून की अनुसूची में है फैक्टरी कानून 1948 के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन को निषिद्ध करता है। 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्टरी में तभी नियुक्त किये जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिये हर दिन साढ़े चार घंटे की कार्यावधि तब की गई है और उनके रात में काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। भारत में बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई में महत्त्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 1996 में उच्चतम न्यायालय के उस फैसले से आया, जिसमें संघीय और राज्य सरकारों को खतरनाक प्रक्रियाओं और पेशों में काम करने वाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटने और गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था। दुनिया भर में बाल श्रम में शामिल 152 मिलियन बच्चों में से 73 मिलियन बच्चे खतरनाक काम करते हैं। खतरनाक श्रम में मैनुअल सफाई, निर्माण, कृषि, खदानों, कारखानों तथा फेरी वाला एवं घरेलू सहायक इत्यादि के रूप में काम करना शामिल है। इस तरह के श्रमबच्चों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और नैतिक विकास को खतेरे में डालते हैं। इतना ही नहीं, इसके कारण बच्चे सामान्य बचपन और उचित शिक्षा से भी वंचित रह जतते हैं। बाल श्रम के कारण दुनिया भर में 45 मिलियन लड़के और 28 मिलियन लड़कियाँ प्रभावित 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में करीब 43 लाख से अधिक बच्चे बाल मजदूरी करते हुए पाए गए दुनिया भर के कुल बाल मजदूरों में 12 प्रतिशत की हिस्सेदारी अकेले भारत की है। गैरसरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत में करीब 5 करोड़ बाल मजदूर हैं। बाल-श्रम केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, यह एक वैश्विक घटना है। बाल श्रम में बच्चों का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है, क्योंकि उनका आसानी से शोषण किया जा सकता है। बच्चे अपनी उम्र के अनुरूप कठिन काम जिन कारणों से करते हैं, उनमें आमतौर पर गरीबी पहला कारण है। इसके अलावा, जनसंख्या विस्फोट, सस्ता श्रम, उपलब्ध कानूनों का लागू नहीं होना, बच्चों को स्कूल भेजने के प्रति अनिच्छुक माता-पिता (वे अपने बच्चों को स्कूल की बजाय काम पर भेजने के इच्छुक होते हैं, ताकि परिवार की आय बढ़ सके) जैसे अन्य कारण भी हैं। बाल श्रम के लिए जिम्मेदार एक और प्रमुख समस्या है। तस्करी। एक अनुमान के अनुसार, लगभग 1.2 मिलियन बच्चे यौन शोषण और बाल श्रम के लिए सालाना तस्करी होते हैं। भारत में बाल तस्करी की मात्रा अधिक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, प्रत्येक आठ मिनट में एक बच्चा गायब हो जाता है। ये बच्चे मुख्य रूप से भीख मांगने, यौन शोषण और बाल श्रम के लिए तस्करी के शिकार हैएवइनके साथ जानवरों से बदतर सलूक किया जाता है। बाल श्रम मानवाधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है, इससे बच्चों के मानसिक, शारीरिक तथा बौद्धिक विकास अवरुद्ध होता है।

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वप्रथम 1990 में न्यूयॉर्क में एक विश्व शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसमें 151 देशों के प्रतिनिधियों नेभाग लिया तथा गरीबी कुपोषण भुखमरी के शिकार विश्व भर के करोड़ों बच्चो की समस्याओं पर विचार किया गया। भारत में 1979 में भारतीय सरकार द्वारा बाल श्रम को रोकने के उद्देश्य से गुरुपाद स्वामी समिति का गठन किया गया था। समिति ने अध्ययन के बाद प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में बाल श्रम का प्रमुख कारण गरीबी को स्वीकार किया तथा खतरनाक क्षेत्रों में बाल श्रम को प्रतिबंधित करने तथा उनके कार्य क्षेत्रों में सुधार करने का सुझाव दिया। साथ ही इन बाल श्रमिकों की समस्याओं के निराकरण के लिए एक बहुआयामी नीति की आवश्यकता पर भी बल दिया। भारत में बाल श्रम से उत्पन्न समस्याओं के निराकरण के क्षेत्र में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन संघ, भारतीय मजदूर संघ, सेंटर ऑफइंडिया ट्रेड यूनियन, हिंद मजदूर सभा बाल श्रम उन्मूलन एवं कल्याण कार्यक्रम आदि संगठनों का महत्वपूर्ण है, परंतु अब तक बनाए गए कानून तथा इस क्षेत्र में किए गए प्रयास पर्याप्त नहीं है। बाल श्रमिकों के हित के लिए अभी बहुत से सुधारों की आवश्यकता है। सरकारी नीतियों तथा निजी संगठनों के प्रयासों के साथ साथ देश के हर नागरिक को इन मासूम के प्रति अपनी संवेदनाओं को करना होगा। बाहरी दुनिया में ही घरेलू नौकरों के साथ होने व अत्याचारों की घटनाएं भी समाज में आम हो हैं।

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वह मासूम बच्चे जिन्हें स्कूलों में जाकरशिक्षा प्राप्त करनी चाहिए बाल श्रम का शिकारहो रहे हैं। बच्चे सड़कों के किनारे, कभी शो-रूममें, कभी घरों और हॉस्टल-दावे जैसे स्थानों परअक्सर ही हमें मजदूरी करते दिख जाते हैं। जिन्हेंहम देख उनकी स्थिति पर दया तो दिखाते हैं परंतु यह उन्हें उस स्थिति से निकालने का कोई प्रयासनहीं करते हैं। पढ़े-लिखे होने के साथ ही साथ, सम्पूर्ण रूप सक्षम होने के बाद भी हम ऐसे बच्चोंकी मदद करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं। केवल बड़ी बड़ी सभाओं में उनके बारे में चंद समय बातकरके, समाचार पत्र-पत्रिकाओं में आदर्शवादी आलेख लिख खुद को भावुक और संवेदनशील बतलानेका प्रयास करते हैं यह जानते हुए भी कि यहकार्य कानूनी अपराध होने के साथ ही एक बच्चे के मौलिक अधिकारों का हनन भी है। यह हमारा नैतिक जवाबदेही है कि बच्चे फील्ड में नहीं बल्कि अपने सपनों पर काम करें इसके लिए सरकार के साथ-साथ हमें भी ऐसे वंचित बच्चों को प्रेरित करने की जरूरत है।

बाल श्रम में संलग्न बच्चों के परिवारों को आर्थिक औरसामाजिक सुरक्षा उपलब्ध करायी जाये। परिवार के वयस्कसदस्यों को बच्चों से काम नहीं कराने की शर्त परसम्मानजनक रोजगार प्रदान किया जाये। इसके अलावा समाज खासकर ग्रामीण इलाकों में लोगों कोजागरूक करने के लिए व्यापक जागरूकता अभियानचलाये जाने की जरुरत है ताकि लोगों को कानूनी पहलुओंकी जानकारी मिल सके। सरकार के सभी विभागों और गैर सरकारी संस्थाओं के समुचित और नियोजित प्रयास बहुत आवश्यक है अन्यथा सब लोग पृथक-पृथक काम करतेरहेंगे ओर कोई नतीजा हासिल नहीं होगा। आज 211 मिलियन से अधिकयुवा बेरोजगार है, इसके बावजूद भी आखिर 152 मिलियन बच्चे मजदूरी क्यों कर रहे हैं, जो समाज अपनेवयस्कों को सम्मानजनक रोजगार न दें सके, वहसमाज बच्चों कोकाम करते हुए देखने के लिए अभिशप्त होगा ही।

नीरज कृष्ण
एडवोकेट पटना हाई कोर्ट
पटना (बिहार)

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