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लघुकथा

✍️राजीव नयन पाण्डेय

..गतांक से आगे..

नीलांश यानि नील अब हास्टल में रहने के लिए एल.एल.बी. में बेमन से नामांकन ले लिया था, बस इसलिए कि हास्टल में रहने की व्यवस्था कही बाहर कमरा लेके रहने से अधिक सस्ता था।
नील अब जी जान से #नीलोफर यानी नीलू से जी जान से चाहत रखने लगा था, और यह बात नील के साथ-साथ नीलू के घर वाले भी जान चुके थे।
हांलांकि नील की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी न थी जितनी नीलू की, परन्तु सच्ची मोहब्बत तो न जाति देखती है और न धन… वो‌ तो बस मन देखती है… यानि ‘जो तन लागे, वो मन जाने”.

नीलू कभी-कभी नोट्स लेने, करेंट अफेयर्स के महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार-विमर्श करने हास्टल भी आती थी, जैसे “सिर्फ दोस्त” अपने अपने दोस्त से मिलने जाते हैं, परन्तु.. जब से हास्टल के मैनेजमेंट ने एक कमरे में दो छात्रों को रखने का आदेश जारी किया था… इसलिए नीलू अब कमरे तक न जा कर कभी कैंटीन तो कभी.. लाईब्रेरी में ही मिला करती थी।
इतिहास गवाह है कि लाईब्रेरी में बातचीत न करने का आदेश भले… लगा हो, परन्तु दुनिया भर में सबसे ज्यादा आंखों आंखों में बातें बे आवाज की .. लाईब्रेरी में ही होती है।

‘तुम समझते क्यों नहीं’ नीलू ने किताब के पन्नों को पलटते हुए कहा, पर नील अब भी अपनी आंखें किताब में ही गड़ाए रखते हुए बस यही कहा “हूं”।

लड़कों का ‘हूं’ और लड़कियों का ‘हम्म’ का उच्चारण अच्छे-अच्छे वक्ता को नतमस्तक कर देती है, और यही हुआ नील की ‘हम्म’ सुनते ही, नीलू जोर से किताब को बंद कर लाईब्रेरी से पैर पटकते हुए चली गई। वैसे यह स्थिति रोज-रोज की थी। कारण नीलू के यक्ष प्रश्न ‘तुम समझते क्यों नहीं’ को नील समझते हुए भी कुछ समय और ना समझ बने रहना चाहता था।

वैसे तो यक्ष प्रश्न का उत्तर हर बेरोजगार प्रेमी ‘रोजगार’ की तलाश को समय से खत्म कर” ही देना चाहता है, परन्तु बेरोजगार प्रेमी के जीवन में जो उतार चढ़ाव होता है उतना शायद ‘सागर की लहरों’ में भी नहीं होती।

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नील बेरोजगारी और अपने प्यार के प्रति लगाव के बीच सामंजस्य स्थापित करना चाहता था, पर वो पहले बेरोजगारी के पाप से मुक्ति चाहता था। वह जानता था कि दुनिया के सारे गुनाहों की सजा पूरी कर अपराधी निर्दोष साबित हो जाते हैं, परन्तु एक बेरोजगार समाज के हर पल ताने, बहिष्कार और उत्पीड़न को घूट-घूट महसूस करता हैं वह भी मात्र इस लिए कि ‘बेरोजगार’ था।

दिन, महीने, साल बीतते ही जा रहे थे, परन्तु नीलू अब भी प्रतिक्षा रत थी, वो जितने मन्नत मान सकती थी अपने इष्ट देव से वो मांग चुकी थी ..पर शायद उसकी मनोकामना अब भी अपूर्ण ही थी…और उसकी कामना थी बस किसी तरह उसकी मनोकामना पूर्ण हो।

पर शायद नियत को कुछ और ही मंज़ूर था, इस बार भी उम्मीद पर मानो से मौसम बरसात हो चुकी थी, रिजल्ट आ चुका था…पर नील इस बार भी।

हास्टल में जंगल की दोपहर सा सन्नाटा फैला हुआ था, नीलू तेजी से नील के कमरे की तरह तेजी से आई….

“सुनो”
बस इतना ही कहा कमरे के बाहर… दरवाजे की कुंडी खटखटाते हुए… पर कोई आवाज नहीं आ रही थी…।

हल्के धक्के लगाने से.. दरवाजा खुल गया, नील औंधे मुंह अपने बिस्तर पर निढाल निराश हो कर लेटा था, उसे अपने ऐसे रिजल्ट की उम्मीद कभी नहीं थी।

” कितनी बार कहा था, समझते क्यों नहीं’, पर शायद तुमने समझने की कभी कोशिश ही नहीं की” ..नीलू अब आप से तुम तक आ चुकी थी। मानो वह भी तंग हो चुकी थी इंतजार से, वो थक चुकी थी परिवार, समाज और उन तानों से जो उसने अब तक अनसुना किया था।

“अरे सुनो तो, पहले मुझे भी तो” नील बीच में टोकने की कोशिश की, परन्तु नीलू शायद अब तक सुने तानों को.. एक साथ नील को ही सुना देना चाहती थी।

अब मेरे घर वाले ज्यादा इंतजार नहीं कर सकते, और ना मैं। “कब की है शादी” नील ने नीलू की बात पूरी होने से पहले ही पूछ लिया।

“तुम जानते थे” शादी का कार्ड शायद गणेश जी को निमंत्रण देने के बाद पहला कार्ड नील के लिए ही लिखा था नीलू ने।

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‌’ तो, कब से थी तैयारी शादी की’ , नील ने अधखुले दरवाजे की कुंडी को देखते हुए अचानक पूछ लिया…
नीलू नीचे नजरें झुकाए..पैरों के नाखूनों को देखने की कोशिश के साथ साथ सगाई की अंगूठी को अपने दुपट्टे की कोर से लपेटने की कोशिश कर रही थी, पर आंखों में नमी आ चुकी थी, “मैं मजबूर हो गई थी, जो हुआ वो मेरी मर्जी के खिलाफ हुआ है”।
“पर सुना है, लहंगा तुम्हारी पसंद का हैं” नील की बातें आज शिकारी के तरकश से निकलने वाले तीर से चुभ रहे थे।

जानती हो नीलू, ‘बेरोजगार प्रेमी की प्रेमिका धान के पौधे की तरह होती है, प्रेमी के नौकरी न होने की दशा मे प्रेमिका को धान के पौधे की तरह जड़ सहित उखाड़ कर नये खेत यानि नये प्रेमी के साथ”..और यही हुआ है तुम्हारे साथ। नये खेत की बधाई …. नील, नीलू को समझना चाहा।

नील को महीनों से खबर हो चुकी थी कि नीलू की शादी कहीं और हो रही है, लड़का सरकारी नौकरी वाला था, और यही उसकी एकमात्र खासियत थी।

“अपना ख्याल रखना” टेबल पर शादी का कार्ड रखते हुए नीलू ने कहा… क्यों कि वो हिम्मत नहीं जुटा पाई नील का सामना कर सके।

नीलू कमरे से जा चुकी थी, नील को अनमोल_भेंट दे कर, बिना यह सोचे कि…अकेले लोगों को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए,वो और अकेला हो जाते हैं।

‘सर आपने देखा….सर’

हास्टल में सीनियर सीनियर होता है इसका ख्याल हर जूनियर रखता हैं..हर सिनियर छात्र सर होता है, और यह परम्परा पुरातन काल से चली आ रही है।
नील के कमरे के बाहर सुबह से भीड़ बढ़ती ही जा रही थी…
गुल बुल गुल बुल की आवाज से नील परेशान हो गया। वैसे भी वो सारी रात परेशानी में बिताने‌ के बात अधखुली नींद से जागते हुए। लगभग चिल्लाते हुए जोर से कमरे की सिटकिनी खोली, जो लगभग टूटते टूटते बची….”कौन हैं बे”.

“बधाई सर….आप” कमरे के बाहर लगभग सभी एक साथ बोले….।

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तभी एक ने अखबार नील के तरफ घुमाते हुए …खबर के तरफ इशारा किया… नील भौंचक्का हो अखबार की पहली पेज की खबर पढ़ भावनाओं में आ चुका था। खबर थी ही ऐसी वर्षों से लंबित रिजल्ट के बारे में…..”सत्य की जीत, फर्जी भर्तियों को निरस्त करने की संस्तुति” योग्य अभियार्थी को नियुक्ति और घूस देकर पेपर खरीदने वाला जालसाज गिरफ्तार” रिजल्ट नये सिरे से जारी”….नील का रुममेट एक सांस में सारी खबर पढ़ गया वो भी बिना कौमा, विराम, अल्प विराम के।

“सर की फोटो कितनी सुन्दर आई है” दुसरे ने कहा तो नील का ध्यान अपनी छपी तस्वीर पर गई, नील ने परीक्षा में टॉप किया था…. परन्तु तभी उसकी नज़र दुसरे छपे तस्वीर पर गई, जिसका नाम सुना सुना … लग रहा था। अचानक नील को कुछ याद आया….वो पलट कर कमरे में लौटा…टेबल पर रखे उस अनमोल भेंट को खोजने लगा, जिसे देख रात भर रोया था। आखिर कार्ड मिला…नीलू संग ….” वहीं नाम था जो अखबार में जालसाज के रूप में छपा था। वहीं नाम जिसने सारी रात नील को परेशान किया…वहीं नाम जिसने नीलू को नील से छिनने की कोशिश की थी..।

माहौल बदल चुका था नील के कमरे का…आज बहुत दिनों बाद उसने ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की थी… सुगंधित अगरबत्ती के साथ…वो ईश्वर को धन्यवाद कर रहा था…
नील नीलू को मन ही मन याद करना चाह रहा था जो शायद किसी दुसरी आकाश गंगा में जा चुकी थी अपना सौर्य मण्डल बनाने के लिए…..अगर नीलू साथ रहती तो वो हिम्मत करके जरूर कहता..”अगर तुम प्रतिक्षा नहीं कर सकते तो प्रेम तुम्हारे बस में नहीं है”।

नील आज अच्छी तरह से तैयार हो कर मन में एक नई उम्मीद के साथ नीलू के घर की तरफ तेजी कदमों से यह सोच कर बढ़ रहा था कि… चाहे कुछ भी हो जाए, नीलू को किसी और आकाश गंगा में सौर मंडल बनाने के लिए नहीं जाने देगा ….उसके एक मुट्ठी में अखबार की खबर थी , जो उसके लिए अनमोल भेंट थी, तो दूसरी मुट्ठी में उम्मीद …

✍️राजीव नयन पाण्डेय (देहरादून)

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