भूस्खलन में होने वाली तबाही से बचाव हेतु पहाड़ी क्षेत्रों के लिये अलग रणनीति जरुरी।

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दीपशिखा गुसाईं

भू कटाव की वजह से उन जगहों पर मिट्टी और पहाड़ नर्म होते जाते और निरंतर हर बार इस तरह की आपदा सामने आने लगती है…यह हिमालयी क्षेत्र बेहद संवेदनशील है,,जरुरत इस पर अधिक ध्यान देने की, साथ ही खास नजरिये की भी जरूरत, जरुरी है इस क्षेत्र के लिए कुछ भी सोचने और करने के लिए विशेष संवेदनशील होने की जरूरत है ।

संवादसूत्र : बरसात आते ही हर जगह पहाड़ों में तबाही का मंजर शुरू हो जाता है,, कुछ तो हमारी गलतियां और कुछ सरकार की लचर ब्यवस्था तबाही को अधिक खौफनाक बना देती है, और पहले से नाकाफी ब्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है।

अक्सर देखा गया है कि ये क्षेत्र बहुत संवेदनशील या कह लें कि क्षणभंगुर होते हैं। इनके अपक्षय से मलबा जल्दी बनते हैं। लिहाजा ज्यादा बारिश या बर्फ़बारी से ये पूरा भूभाग नीचे घाटी की तरफ खिसक जाता है। लगातार होने वाले इस भू कटाव की वजह से उन जगहों पर मिट्टी और पहाड़ नर्म होते जाते और निरंतर हर बार इस तरह की आपदा सामने आने लगती है…
यह हिमालयी क्षेत्र बेहद संवेदनशील है,,जरुरत इस पर अधिक ध्यान देने की, साथ ही खास नजरिये की भी जरूरत, इस क्षेत्र के लिए कुछ भी सोचने और करने के लिए विशेष संवेदनशील होने की भी आवश्यकता है । यह क्षेत्र सिर्फ यहां के निवासियों के लिए नहीं, सम्पूर्ण देश और विश्व के नजरिये से भी संरक्षित सुरक्षित रखे जाने की जरूरत है । यह जितनी जल्दी समझा जाएगा उतना ही अच्छा होगा।

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कल रात 9 बजे के करीब जोशीमठ के सामने के पहाड़ हाथी पर्वत पर भूस्खलन हुआ । जो लगभग 5 मिनट तक चलता रहा । पहाड़ से पत्थर बोल्डर नीचे लुढ़कते चले गए । इसी तरह का घटनाक्रम 28 जून को भी ठीक इसी स्थान पर हुआ था । तब भी हाथी पहाड़ से टूटकर पत्थर बोल्डर नीचे आये थे ।

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और साथ ही कल रात रात दो बजे जोशीमठ के नजदीक 5 किलोमीटर पहले सेलङ्ग गांव में जहां एनटीपीसी की परियोजना का पावर हाउस है, भूस्खलन होने से एनटीपीसी की मुख्य सुरंग का मुहाना ढंक गया । पास का एक होटल भी इसकी जद में आया है ।

सुरंग का शुरुआती हिस्सा जो कि चट्टान ही था ढह गया है । आशंका है कि सुरंग के भीतर भी नुकसान हुआ हो । कुछ मशीन व रेल ट्रैक जो सुरंग में प्रवेश करने हेतु बना था डैमेज हुआ है । मलवा भी ज्यादातर पत्थर बोल्डर ही गिरा है । यदि अंदरुनी भाग भी डैमेज हुआ हो तो यह और भी चिंताजनक बात होगी । यह होना यह भी दर्शाता है कि परियोजना की शुरुआत में सर्वे के नाम पर जो भूगर्भीय सर्वे कर इस क्षेत्र को सुरक्षित बताया गया वह सिर्फ बहकावा ही था।और ऐसे ही बहकावों के आधारों पर परियोजनाओं की स्वीकृति ली जाती है । जिसकी कीमत फिर जनता को ही चुकानी पड़ती है आर्थिक तौर पर भी और अपनी जान देकर भी ।

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जोशीमठ बद्रीनाथ मार्ग कल शाम से बंद है । उस मार्ग पर भूस्खलन के कई नए क्षेत्र विकसित हो गए हैं । उत्तरकाशी में दो दिन पूर्व ही एक गांव तबाही का शिकार हुआ है । मुख्यमंत्री जी ने उसके विस्थापन के आदेश दिए सही है पर ऐसे ही कई अन्य क्षेत्रों को भूल गए हैं। सभी आपदा प्रभावित गांव का विस्थापन पुनर्वास किया जाना चाहिए ।

उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्र के लिए अलग से सोचने की जरूरत है । इसके सम्पूर्ण विकास के व इस क्षेत्र के संरक्षण के लिए अलग से आयोग का गठन जरुरी है,, जिससे इस और विशेष ध्यान दिया जाये और भविष्य में होने वाली इस तरह की विपदाओं से हिमालयी क्षेत्र और आने वाली पीढ़ी को इसके खतरों से बचाया जा सके।..

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