आखिर परवरिश तो हमारी ही है…

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राहुल गोस्वामी “अचेतन

आपके पास तो समय ही नहीं है,,जो थोड़ा समय मिलता है उसमें आप बच्चों के दोस्त होते हैं, हँसी खुशी रहने के नाम पर आप उनकी फ़िजूल की बातें सुनते हैं,खर्चे के नाम पर पैसे पूछते हैं कितने चाहिए,कभी हिसाब मांगा..? जेब खर्ची कहाँ जा रही है..? पढ़ाई में क्या चल रहा है ..?

बेटा बिगड़ गया अथवा बेटी कहना नहीं मानती… कितनी आसान सी पंक्तियां हैं कह दिया पल भर में और हो गए मुक्त अपनी परेशानियों से बस इतना ही..?
कभी सोचा है क्यों नहीं मानते वो आपकी बातें या क्यों ऐसी हरकतें करने लगे हैं जिसे आप बिगड़ना कहते हैं..?
ऐसे बहुत से परिवार हैं और शहरों में तो लगभग 90% परिवार ऐसे हैं जहाँ परिवार नहीं दोस्त रहते हैं
हाँ वही बाप बेटा दोस्त माँ की दोस्त बेटी और इससे भी उपर पूरे परिवार में कुछ भी कहने सुनने की आज़ादी कुछ का मतलब कुछ भी प्रेमी प्रेमिका से मिलने की पूरी कहानी तक दोस्त रूपी माँ बाप को पता होती है। कईं परिवार तो ऐसे हो गए हैं जहाँ दारू तक सार्वजिनक रूप बाप बेटा बैठकर पीते हैं और भद्दे शब्दों का प्रयोग करके किसी विषय पर चर्चा करते हैं।
अब दोस्त है तो समान्य बात है जो शब्द दोस्तों के बीच प्रयोग होते हैं वही प्रयोग किये जाएंगे लेकिन इसमें माँ बाप का जो सम्मान होता है बच्चों में वो तो गया क्योंकि आपकी इज्जत आपके बच्चे ऐसी स्थिति में तबतक करेंगे जबतक आप उनके मित्रता पूर्वक व्यवहार रखेंगे
जहाँ आपका अचानक माँ-बाप वाला व्यक्तित्व जगा बस हो गया इज्जत का बंटाधार उस स्थिति में उन्हें आपकी कही हर बात बंदिश लगेगी आप उनकी नजरों में केवल उनके विरोधी लगोगे
ऐसा क्यों होगा भला ..?
क्योंकि आपने अपने बच्चों को कभी माँ बाप वाला रूप दिखाया ही नहीं ,सही गलत की पहचान कभी करवाई ही नहीं,जिद ना करने की सीख कभी दी ही नहीं, जिम्मेदारियों का आभास कभी करवाया ही नहीं, उन्हें उनकी मनमर्जी से कभी रोक ही नहीं, किसी राजा की तरह पाला है बच्चों को, बस बच्चों का हर समय साथ दिया केवल साथ, चाहें वो पैसे से हो या मौखिक रूप से, आजकल तो बच्चे जो 20 साल के हैं उनके मुँह से सुनने को मिल रहा है कि मेरे बाप ने कभी डांटा तक नहीं मुझे
ये आश्चर्यजनक है दो दशक में कभी आपने अपने बच्चों को उनकी गलतियों से अवगत नहीं करवाया.?? करवाएंगे भी कैसे .? आपके पास तो समय ही नहीं है,,जो थोड़ा समय मिलता है उसमें आप बच्चों के दोस्त होते हैं, हँसी खुशी रहने के नाम पर आप उनकी फ़िजूल की बातें सुनते हैं,खर्चे के नाम पर पैसे पूछते हैं कितने चाहिए
कभी हिसाब मांगा..? जेब खर्ची कहाँ जा रही है..? पढ़ाई में क्या चल रहा है ..?

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माँ बाप बनकर पूछिये बच्चों से ,,दोस्तों को सिर्फ वही बातें बताई जाती हैं जो मजेदार हों, जिन्हें सुनकर सब हँस सकें उनसे वो बातें पूछिये जिसमें उनकी गलती निकल कर आये
किसी लड़की का पीछा करते हुए उसके साथ रिलेशनशिप में आने की बात भी माँ बाप मजेदार तरीके से चटकारे लेकर सुनते हैं ये माँ बाप की खुशी नहीं आपके संस्कारों की तिलांजलि है। रिश्तों का महत्व समझाइए, दोस्तों की तरह आपने भी कभी किसी लड़की की इज्जत करना सिखाया ही नहीं होगा क्योंकि ये बहुत मामूली सी बात है जो आज की पीढ़ी के समझ में नहीं आती क्योंकि आसमान में उड़ते दिमाग को चींटी जितना विचार कैसे अनुभव करेगा,

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फिर यही माँ बाप बच्चों के चालीस साल के होने पर और अपने बुढ़ापे में अनुभव करते हैं कि बच्चे उन्हें भाव नहीं दे रहे वास्तविकता ये है आज आपका बच्चा बढ़िया कमा खा रहा है जब वो आपसे बात करता था मिलता था जब आपका दोस्त होता था तब वो आपको इसलिए पूछता था क्योंकि उसके पास धन का साधन केवल आप थे और ये मानवीय स्वभाव है इंसान मित्र अपनी औकदानुसार बनाता है बाहरी और घरेलू दोस्तों में कोई फर्क उस वक्त था ही नहीं , माँ बाप उनसे कभी मिले ही नहीं तो दोस्त तो बदलना स्वाभाविक था और अब तो अपने पैरों पर खड़ा भी है ऐसे में अब वो आपके उस स्तर पर है जहाँ समय की कमी के कारण कभी आपने अपने बच्चों का दोस्त बनने की सोची थी अब वो भी यही दोहराएंगे अपने बच्चों के साथ और आप कहाँ गए..?

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आपने भी तो यही किया था अपने बच्चों का दोस्त बनते समय अपने माँ बाप को नजरंदाज बस वही हो रहा है
वही घूम फिर कर चलता रहता है, प्रकृति का नियम है माँ-बाप माँ और बाप ही होते हैं आपके दोस्त नहीं और दोस्त बनोगे तो एकदिन रास्ते अलग हो ही जाने हैं स्वाभाविक रूप से
रिश्तों का महत्व बनाकर रखिये रिश्ते के अनुसार आचरण कीजिये रिश्ता आपको सम्मान दिलाएगा यदि आप लकीर से हटे तो सब कुछ भटक जाएगा। फिर ढूंढते रहना रेगिस्तान में पानी।।।

।।।।।।

अचेतन