आखिर धरती माँ का कब तक दोहन करेंगें हम ?

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(पृथ्वी दिवस 22 अप्रैल)

         “नीरज कृष्ण

दुनिया में सबसे पाक रिश्ता माँ और बच्चों का माना जाता है। अपनी संतान को जन्म देने के लिए माँ, जितने दुख सहती है और जितनी तकलीफें झेल कर वह अपने बच्चों का लालन-पालन करती है उसकी तुलना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि जब कभी माँ के मान-सम्मान की बात आती है, प्रत्येुक व्यक्ति का खून खौल उठता है। लेकिन आश्चर्य का विषय यह है कि हम अपनी जननी माँ के मान-सम्मान का तो बहुत ख्याल रखते हैं, पर धरती माँ के बारे में कुछ भी नहीं सोचते।

22 अप्रैल को दुनिया भर में पृथ्वी दिवस के रूप में मनाया जाता है। उपभोगवादी संस्कृति के वाहक आधुनिक इंसानों ने ऐशो-आराम के साधन जुटाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का निर्मम दोहन करके जलवायु परिवर्तन के भयावह दुष्परिणामों से न सिर्फ अपने बल्कि हरी भरी खूबसूरत पृथ्वी के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर दिया है।

अथर्ववेद के ‘पृथ्वी सूत्र’ में मंत्र है- ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्या’, यानी ये धरती हमारी माता है और हम इसके पुत्र है। यजुर्वेद के दसवें अध्याय में मातभमि की वंदना की गई है, ‘ पृथ्वी माता हिंसीर्मा अहं त्वाम’ यानी हे मातृभूमि ! न तू हमारी हिंसा कर और न हम तेरी हिंसा करें। सिर्फ वेदों की बात नहीं, सभी धर्मग्रंथों- बाइबल, कुरान आदि में मनुष्य के बुद्धिमान होने के कारण उसे पृथ्वी के प्रति जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित किया गया है। हर शिक्षा का सार यही है कि धरती सबकी (मनुष्य समेत सभी प्राणियों की) है। सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी होने के नाते ईश्वर ने इसकी देखरेख की जिम्मेदारी मनुष्य को सौंपी है। ऐसे में मनुष्य का कर्तव्य है कि वो इसमें बाधा खड़ी न करे।

पवित्र कुरान में कहा गया जमीन को उसने (अल्लाह ने) सब खिलकत (सृष्टि) के लिए बनाया है, दुनिया और ये धरती केवल मनुष्य के लिए नहीं, बल्कि उसकी पैदा की गई तमाम मख्लूकों (जीव-जंतुओं) के लिए है। साथ में ये भी बताया गया, ‘धरती पर बिगाड़ पैदा करने की कोशिश न कर, अल्लाह बिगाड़ पैदा करने वालों को पसंद नहीं करता।’ महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने भी सरलता से समझाया है – मनुष्य को पृथ्वी एक उत्तराधिकार के रूप में मिली है, जिसे उसको अगली पीढ़ी को इतनी सलाहों और सीखों के बावजूद, अफसोस की बात है- मनुष्य और पृथ्वी के बीच का रिश्ता सामान्य नहीं रहा जैसे- जैसे इंसान। विकसित होता गया, वो पृथ्वी और इसके संसाधनों का अधाधुंध दोहन करने लगा। स्वाभाविक ही था कि पर्यावरण में बदलाव हुए और दुष्परिणाम सामने आए। घने जंगल रेगिस्तान बन गए, समुद्री जलस्तर बढ़ा, बड़े-बड़े शहर पानी में डूब गए, नदियों ने रास्ता बदल लिया, कुछ नदियां हमेशा के लिए खो गईं, चंद नालों में तब्दील हो गईं, कई सभ्यताएं बिखर गईं या न जाने कहां गुम हो गईं। मानसून और बारिश का समय बदल गया, झील-तालाब सूखे कूड़ा पात्र में बदल गए। दिल दहला देने वाली बात है- पानी बोतलों में कैद एक जरूरी, लेकिन महंगा उत्पाद बन गया है। वायु प्रदूषण के ख़तरों की तो बात ही क्या करें!

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मनुष्य के अज्ञान और गैरजिम्मेदारी की पराकाष्ठा ये कि कई बार वो समझ तक नहीं सका कि इन आपदाओं का मुख्य कारण उसकी ही मनमानी है। हालांकि कुदरत से मोहब्बत करने वाले पर्यावरणविद् और वैज्ञानिकों ने आम लोगों को ये सुझाव देना भी जारी रखा कि पृथ्वी का सम्मान करना जरूरी है। पेड़ न काटने की सलाह, हरियाली को नष्ट न करने की सीख- धार्मिक रीति-रिवाज और लोक परम्परा में भी शामिल हुए। दुखद तथ्य है कि विकास की अंधी दौड़ ने धरती का सीना बार-बार छलनी किया।

उपभोगवादी संस्कृति के वाहक आधुनिक इंसानों ने ऐशो-आराम के साधन जुटाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का निर्मम दोहन करके जलवायु परिवर्तन के भयावह दुष्परिणामों से न सिर्फ अपने बल्कि हरी भरी खूबसूरत पृथ्वी के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर दिया है। धरती पर अंधाधुंध पेड़ों का कटाव, बढ़ता हुआ प्रदूषण और ग्रीन हाउस गैसों के कारण धरती मॉं का ऑंचल छिन्नप-भिन्न होता जा रहा है। आज आलम ये है कि पृथ्वी और पर्यावरण के संरक्षण की बात, महज उपदेश नहीं रह गई है, एक अनिवार्य जरूरत है। अगर अब भी नहीं चेते तो अस्तित्व न बचेगा। विश्वयुद्ध, आण्विक हथियार, परमाणवीय / रासायनिक दुर्घटनाएं और औद्योगीकरण की अंधी लहर ने पृथ्वी को विनाश के खतरनाक मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।

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आम लोग भले न सोचें कि वे अपनी मनमानी के चलते पृथ्वी को कितना नुक़सान पहुंचा रहे हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने ख़ास पहल कर सारी दुनिया को अंधेरे से बाहर निकालने की अच्छी कोशिश की है। 1970 में जब अमेरिका समेत पूरी दुनिया में पर्यावरण को लेकर चिंता और चिंतन का दौर जारी था, तब बहुत-सी चुनौतियां सामने मुंह बाए खड़ी थीं। 150 वर्षों तक चली औद्योगिक क्रांति के नकारात्मक प्रभाव झेलने पड़ रहे थे, धुएं से बना जानलेवा कोहरा डरा रहा था, प्रदूषण के चलते बच्चों के विकास में दिक्कतें पैदा हो गई थीं- इसी दौर में यूनाइटेड स्टेट्स के विस्कॉन्सिन के सीनेटर जेलोर्ड नेल्सन ने ‘अर्थ डे’  की परिकल्पना पेश की। नेल्सन ने 1969 में सेंटा बारबरा के भयानक तेल रिसाव और उसके दुष्परिणामों को भी देखा था। उन्होंने 22 अप्रैल को ‘पृथ्वी दिवस’ मनाने के लिए बिल पारित किया।

इस तारीख को चुनने के पीछे बहुत- से तर्क दिए जाते हैं, जैसे इस दौरान स्कूल-कॉलेज में छुट्टियां होती थीं, कोई बड़ा धार्मिक उत्सव या अवकाश न होता था, इसलिए ज्यादा लोगों की सहभागिता की उम्मीद और संभावना भी थी। सैन फ्रांसिस्को के एक शांति कार्यकर्ता जॉन मैककोनल के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस मुहिम को समर्थन दिया। 1970 से पूरी दुनिया में इसे अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। 2009 में जबसे संयुक्त राष्ट्र ने 22 अप्रैल को ‘अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी मां दिवस’ के रूप में मनाने की घोषणा की है, तबसे इसे धरती का बर्थ डे भी कहा जाने लगा है।

‘अंतरराष्ट्रीय पृथ्वी मां दिवस’ नाम ही बताता है कि पूरी धरती को अपनी मां न सिर्फ कहना, बल्कि मानना होगा। पृथ्वी पर हर जीव-जंतु के अस्तित्व का एक कारण है और वो संसार में अपनी भूमिका निभाता है। ऐसे में सबसे समझदार जीव मनुष्य की भूमिका क्या सिर्फ धन-संपदा इकट्ठा करने और एक दिन दुनिया छोड़ देने भर की है? सच तो ये है कि पृथ्वी के संरक्षण के प्रति हमारी जिम्मेदारी सृष्टि के बाकी जीवों की तुलना में ज्यादा बड़ी है। हम कई स्तर पर अपनी भूमिका निभा सकते हैं। मृत हो रही नदियों का संरक्षण, सूखते तालाबों / जलाशयों की देखभाल-सफाई, नियमित प्रबंधन, वृहद वृक्षारोपण, वन, प्रकृति आदि को नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाओं पर नियंत्रण, समुद्र तथा पर्वतों पर हो रहे प्रदूषण पर नियंत्रण जैसे कई काम हमें करने ही होंगे। आइए, उपहार में पौधे दें कागज पर प्रिंटआउट न लें, बाहर निकलें तो पानी की बोतल घर से लेकर चलें, शाकाहार करें, पेट्रोलियम पदार्थों को कम खर्च करें। गांधी जी ने कहा है – ‘ पृथ्वी के पास हमारी आवश्यकताओं के लिए ही पर्याप्त संपदा है, न कि हमारे लोभ के लिए।’ , इसलिए धरती को धन्यवाद कहें, उसे सुरक्षित रखें और खुद से प्रण करें- हैं तैयार हम!

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मनुष्य के मन में जब इच्छाएं जन्म लेती हैं, तो वह नहीं जानता कि वे उसके लिए हितकर है या नहीं। किंतु प्रकृति जानती है। इसलिए वह मनुष्य की इच्छाएं पूरी नहीं करती। तब मनुष्य प्रकृति से रुष्ट होकर स्वयं कार्य करता है। कर्म का फल प्रकृति रोक नहीं सकती…..तब अपने अहित का दायित्व भी मनुष्य के अपने कन्धों पर ही होता है। प्रकृति का न्याय तो सीधा है, पानी में दूध मिलाया जायेगा, तो वह उसमें मिलकर अपना अस्तित्व खो देगा। मक्खन को पानी में मिलाया जायेगा, तो वह उसके ऊपर तैरता रहेगा, न उसमें मिलेगा, न विलीन होगा, न अपना अस्तित्व खोएगा। यदि आज हम अपने बच्चों को धरती की उपादेयता की महत्ता को नहीं समझायेंगे तो कल हम-और-वे सिर्फ इसके परिणामों को भोगने के लिए अभिसप्त होंगे।

नीरज कृष्ण
एडवोकेट पटना हाई कोर्ट
पटना (बिहार)

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