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कविता

हरदेव नेगी

कुछ उल्झे हुए सवाल हैं,
जिनका उत्तर ढूँढता हूँ किताबों में,
वास्तविक जीवन में नहीं मिलता उनका अर्थ..!
बार -बार सोचकर भी खाली हाथ लौट आता हूँ…!

सोचता हूँ क्या कभी कोई लिखने वाला
ऐंसी उल्झन में फंसा है?
अगर फंसा है तो कैंसे हल किया उसने उन मुश्किल सवालों?

अंको व तर्कों के हल तो शायद मिल जाते हैं कहीं भी,
हृदय से निकले भावों का अर्थ कहाँ से ढूंढा जाए,
अभी और कितने पन्ने पलटने होंगे
ये सब समझने के लिए?

कितना खर्च करना होगा खुद को व समय को
क्या यह सब जानने की शक्ति रहेगी तब तक?
या सवाल फिल मन में ही सिमट कर रह जायेंगे.,,,

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मन के सवालों का भँवर
नदियों के भँवर से गहरा होता है, तो
हिमालय की चोटियों से भी ऊँचा,

नदी के सवालों को तो
हिमालय समझ जाता है,
तो क्या मन के उल्झे सवालों
को कोई किताब समझ पायेगी..,

हरदेव नेगी गुप्तकाशी (रुद्रप्रयाग)