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“बघ्वा”

आलेख

“बघ्वा”

अंतराष्ट्रीय बाघ संरक्षण दिवस

प्रतिभा की कलम से

[संस्मरण]

” वाकई तेंदुए की ख़ुशबू हवा में है। ये ख़ुशबू उस डर को भी भगा ले जाती है कि जंगली जानवर है,कहीं उसने हम पर ही हमला कर दिया तो !अचानक सामने आ गए जानवर को दोबारा देखने की बलवती इच्छा ! जैसे जानवर की अपने शिकार को दबोचने की तीक्ष्ण चाहत। “

“काफी देर हो गई है। हमने अभी तक सिर्फ एक हाथी देखा है”। तो क्या इसी को बड़ी बात मानकर हम संतोष कर लें ?
नहीं ! यहां तो सांभर हमारे इंतजार में है। मुंह से लार टपकाता, उसी समय कुछ खाकर निकला था शायद।
हयै ! कैसे खड़ा था वह ! बदन पर तो डर का कोई नामो-निशान नहीं, मगर आंखों में गजब की हया थी। हम सब मंत्रमुग्ध से उसे देख रहे हैं। वह भी हमें देख रहा है, इस तरह कि पत्तियों का कोई आंचल ही मिल जाए तो डाल ले आंखों पर पर्दा। शरमाता हुआ कभी आगे बढ़ता तो कभी पीछे होता भरपूर तस्वीरें खिंचवा कर धीरे-धीरे जंगल में गुम होता हुआ। वह बाईं तरफ से आंखों से ओझल हुआ था। उधर दाईं तरफ ऊपर की ओर जाती हुए सड़क पर एक और सांभर है। गाइड ने बताया- ‘यह मादा सांभर है क्योंकि इसके सिर पर सींग नहीं है’ । वह एक जगह पर खड़ी एकटक निहार रही है अपने गुम हुए साथी की राह को। उसने हमसे तस्वीरें खिंचवाने में कोई रुचि नहीं दिखाई तो हमने भी उसे छेड़ना उचित नहीं समझा। अब बारी पानी पीते हिरनों की है । पानी तो नजर नहीं आया,लेकिन उनके गर्दन झुकाने-उठाने के अंदाज से पता चल रहा है कि वह वास्तव में कुछ पी रहे हैं।


“इनके बाद अब और कौन सा जानवर मिलेगा” ! का रोमांच और रास्ते की रोचकता बनाए रखने के लिए गाइड सड़क पर बाघ के पैरों के निशान दिखाते हुए कहता है कि आगे हमें बाघ भी दिख सकता है । जैसे ही हम एक मचान के पास पहुंचते हैं, गाइड के उपजाए रोमांच की पुष्टि एक सांभर की पुकार करती है। सांभर जल्दी-जल्दी पुकार रहा है । ड्राइवर और उसका साथी कहते हैं कि बाघ शायद पास ही है। बाघ वाली संजीदगी हवा से गायब होने भी न पाई थी कि एक तेंदुआ सामने से गुजर गया। लेकिन यह क्या ?
जब वह गुजर गया तब एहसास होता है – अरे! हमारा दिल धड़कना चाहिए था डर से, बदन कांपना चाहिए था रोमांच से । तो अब क्या हो ? दृश्य दोहराने की चाह में हमने ड्राइवर से जिप्सी फिर पीछे करवा ली।
ड्राइवर ने दूसरी जिप्सी के साथी ड्राइवर को भी इशारा कर दिया वहीं रुकने का। चुप रहने का इशारा पाकर बताने की जरूरत नहीं कि हमने कुछ बड़ा देखा है। कोई किसी से न कुछ बोल रहा, न देख रहा है एक दूसरे की तरफ। सबको इंतजार है एक बार फिर से उसके दिख जाने का। सांस रोके सब उसी तरफ देख रहे हैं जिधर वह गया है।
वाकई तेंदुए की ख़ुशबू हवा में है। ये ख़ुशबू उस डर को भी भगा ले जाती है कि जंगली जानवर है,कहीं उसने हम पर ही हमला कर दिया तो !अचानक सामने आ गए जानवर को दोबारा देखने की बलवती इच्छा ! जैसे जानवर की अपने शिकार को दबोचने की तीक्ष्ण चाहत।
विद्यासागर नौटियाल जी का “झुंड से बिछड़ा” उपन्यास आंखों में सिमट आया कि “कई लोगों को बाघ के दिखाई देने पर, या कहीं आस-पास से उसके शरीर से निकलने वाली तीखी, नाक के रास्ते प्रवेश कर पूरे शरीर को फाड़ने, पस्त कर देने वाली दुर्गंध को सूंघते ही बघ्वा लग जाता है। कई बार देखा गया कि बघ्वा-प्रभावित आदमी मस्त चाल से चल रहे बाघ से सम्मोहित हो खुद ही उसके पीछे-पीछे दौड़ लगा रहा है ।
हम समझ गए हैं कि तेंदुआ आसपास ही है लेकिन ज्यादा लोगों को देखकर वह सामने नहीं आ रहा। इसलिए अब गाड़ी आगे बढ़ा दी है।
हिरण, सांभर, चीतल, काकड़ और खूबसूरत मोरों को हाथ हिलाते-हिलाते अब हम जंगल से बाहर लौट रहे हैं। सड़क से थोड़ी दूर वन विभाग का गेस्टहाउस है । गेस्टहाउस में रुकने का प्रस्ताव अच्छा लगा कि सुबह जब आप उठें, और आपके आंगन में हिरण विचर रहे हों, और रात को उसी आंगन में लेपर्ड घूमता हुआ दिखाई दे। है ना मजेदार !
वन्य जीवन के ऐसे रोमांचक अनुभवों का बघ्वा लगने के कारण ही मशहूर शिकारी जिम कॉर्बेट आदमखोर बाघों के मारने के बहाने से जंगलों की खाक छाना फिरा करते हों शायद। हिमाचल और मध्य प्रदेश के जंगलों को करीब से देखने,जानने, समझने में जीवन का महत्त्वपूर्ण वक्त देने की बदौलत ही रुडयार्ड किपलिंग ने “जंगल बुक” में मोगली की मासूम कहानी से दुनिया को रू-ब-रू करवा दिया
राजाजी नेशनल पार्क (उत्तराखंड) के हरे-भरे जंगल की ताज़ी सैर के ख़ूबसूरत एहसासात की ये मीठी गिलोरियां सहेज कर रख ली हैं मैंने अब यादों में घुलाने के लिए।

प्रतिभा नैथानी (देहरादून)

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