“अस्वीकार”

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आलेख

[राघवेंद्र चतुर्वेदी]

“इंसान बनना सीखिए सर्वप्रथम और ग़लत को ग़लत और सही को सही कहना सीखिए। लेखक का काम नकारात्मक विचारों को फैलाना या कुंठित मानसिकता को अग्रसर कर आगे बढ़ाना नहीं होता है।जिस तरह लोगों में, अलग अलग संस्थाओं में, सरकारी दफ्तरों में और चाहे कोई भी हो आप उनकी कमियां खामियां और गलतियां बताकर स्वयं को गौरवान्वित कर रहे हैं ये आपकी ओछी मानसिकता की प्रसिद्धि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।”

गलती स्वीकार किए हैं आप कभी?आप से ही कह रहे हैं? जी आप ही जो जो इसे पढ़ रहे‌ हैं? अपने भीतर झांक कर देखिए कि क्या आपने अपनी ग़लतियों‌‌ को सीधे तौर पर जीवन में स्वीकार किया है?तो आपको उत्तर सदैव “नहीं” में ही मिलेगा।

बइंसान जानवर से भी गया गुजरा गलतियों का पुलिंदा ही नहीं बल्कि महासागर बन चुका है। प्रायः आप स्वयं में परिवार में, आसपास दोस्तों में , रिश्तेदारों में , बाजार में दुकान में, दुकानदार में, सरकार में ,बस में ,ट्रेन में ,स्टेशन में ,बैंक में ,होटल में ,सड़क पर ,धर्म के नाम पर , पहाड़ों पर ,सरकारी दफ्तरों में ,निजी दफ्तरों में, पड़ोसियों में और न जाने कितनी ऐसी जगह और लोगों को देखकर सीधा उसमें खामियां और दोष निकालकर रख देते हैं कि फलाने व्यक्ति और फलां आफिस तो ऐसा ही है । यकीनन आप सत्य भी होते हैं पर क्या सिक्के का दोनों पहलू बस खामियों से भरा होता है?

दूसरे में कमियां गिनने और गिनाने का अधिकार आप तभी रखते हैं जब आप पूर्णतया खामियां रहित हों जब आपके भीतर कोई कमी न हो ! लेकिन क्या ये संभव है? दरअसल इंसान की प्रवृत्ति इतनी निम्न दर्जे की ओछी हो गई है कि वो जब बात दूसरे की हो तब न्यायाधीश बन फैसला सुना देता है लेकिन जब बात स्वयं की हो तब एक अच्छे वकील की भांति जिरह करना शुरू कर देता है। क्यों? क्योंकि आपको दूसरों में गलतियां दिखती हैं और उन्हें उनकी गलतियां बताने में परमानन्द की प्राप्ति होती है। कुछ हद तक ये सही भी है। आलोचनाओं का होना भी आवश्यक है पर जब बात स्वयं की हो तब आप तुरंत अस्वीकार कर देते हैं! क्यों? क्योंकि आप तो जीवन में कुछ ग़लत करते नहीं और आपके भीतर तो खामियां हैं ही नहीं? आप तो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ घोषित कर चुके हैं?..

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आपने देखा होगा रिश्तेदारों की प्रजाति सबसे बदनाम है इस मामले में लोग बोलते भी रहते हैं मेरे रिश्तेदार ऐसे हैं तो वैसे हैं ईश्वर न करे ऐसे रिश्तेदार किसी को मिले ।पर आप भूल जाते हैं आप भी किसी के रिश्तेदार हैं वो भी आपके लिए यही सोचते होंगे तब आपको बुरा लग जाएगा फिर तो आप अपनी उपलब्धियों को गिनवाना शुरू कर देते हैं। क्योंकि आपसे अपनी गलतियां स्वीकार नहीं होती हैं।

धर्म के नाम पर भी आए दिन गलतफहमियां पैदा की जाती रही है जो इनके प्रति विश्वास को और कम करती गई और लोगों ने उन गलतफहमियों को दूर करने का प्रयत्न नहीं किया बल्कि एक धर्म वाला व्यक्ति सदैव दूसरे धर्म में कमियां निकालते हुए मिलता है।वो व्यक्ति आप भी हो सकते हैं या आपके आसपास ये अब आम बात हो चुकी है। पर क्या उतनी कमियां हैं भी? या आप जिस धर्म के हैं वो कमियों और खामियों से मुक्त है? सिर्फ आलोचना करना ही सीखा है ? या उसके अलावा और कुछ भी दिखता है? पर आपको स्वीकार नहीं करना होता है। क्योंकि आप सदैव सामने वाले से अपेक्षा रखते हैं कि वो ग़लत है तो वो झुके।

सरकारी दफ्तरों की शिकायत लगभग सभी करते हैं पर क्या वाकई में उसके ज़िम्मेदार वहीं लोग हैं या उनकी गलतियों में आपका भी योगदान है? रिश्वत मांगे जाने पर आप स्वयं ही सामने से पैसे देते हैं ताकि आपका कार्य जल्द हो जाए और बिना रिश्वत दिए आपको सिस्टम से लड़ना होगा जिसका सामना आप करते नहीं क्योंकि आपके पास समय नहीं है या आप सक्षम नहीं हैं और इसे फालतू बोलकर निकल जाते हैं पर कभी ये जानने का प्रयास किया है कि वे कितना दबाव में कार्य करते हैं? जरुरी नहीं है कि पूरे दफ्तर के लोग ग़लत है यदि ऐसा होता तो काम होते ही नहीं? वहां सही और काबिल लोग भी होते हैं पर आपको क्या है आपको तो बस खामियां निकालनी है स्वयं की कोई गलती नहीं?!

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रेलवे स्टेशन पर तो लगभग सभी लोग गये होंगे । बहुत कमियां निकालते हैं ट्रेन समय से नहीं चल रही , स्टेशन गंदा है, बदबू आ रही , तो भीड़ बहुत है , पंखा नहीं चल रहा और ये सब चर्चा करते हुए अपनी पानी की खाली बोतल और चिप्स या जो भी हो उसका खाली पैकेट वहीं फेंक देते हैं तो वो आपकी गलती नहीं है वो भी रेलवे की गलती है?है ना! कुछ खामियां सामने हैं तो कुछ आपके भीतर भी हैं पर आप स्वीकार नहीं करना चाहते।

प्रायः लाखों लोगों को देखते हैं टीवी के माध्यम से,मोबाइल के माध्यम से,और व्यक्तिगत रूप से बाहरी दुनिया में तो हर कोई अपने धर्म और मजहब का बखान किए जा रहा है कि उसका धर्म और मजहब सबसे महान है बाकी तो भ्रम है पर ठहरिए ये जो लोग ये सब कर रहे हैं न यही अपवाद हैं । कायदे से देखेंगे और पढ़ेंगे तो सभी धर्मों में और उनके इतिहास में करोड़ों कमियां गलतियां और छल कपट छुपे हुए हैं और जब कोई उसे बताएगा तो बिना सोचे समझे लोग उस पर बरस पड़ते हैं। कभी दो पल बैठ कर धर्म को पढ़ा नहीं होगा लेकिन भेड़ चाल में चलना सबको है । कौन सा धर्म सिखाता है कि दूसरों में सिर्फ आलोचनाओं को ढूंढते रहिए ? किस कक्षा की किताब में पढ़ा है आपने कि किसी व्यक्ति में सिर्फ खामियां ही खामियां होती है। और उसके द्वारा की गई हजारों अच्छाईयां उसकी चंद गलतियों की वजह से व्यर्थ हो गई?

जीवन में आप 99 अच्छे कार्य कर लीजिए और एक ग़लत कार्य कीजिए लोग आपको आपके 99 अच्छे काम से नहीं बल्कि आपकी प्रसिद्धि उस एक ग़लत काम से इस कदर बढ़ा देंगे कि आप स्वयं भी सोच में पड़ जाते हैं कि क्या आप वाकई ग़लत है और इतने बुरे हैं?

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ये सब बस उदाहरण मात्र हैं ! रोजमर्रा के जीवन में आप जो भोजन खाते हैं उसमें भी कुछ फायदे और नुकसान होते हैं पर फिर भी आप उसे स्वीकार कर खाते हैं क्योंकि उसमें आपको अपनी खुशी का स्वाद भरा स्वार्थ दिखता है पर पर व्यक्ति या चीजें आपको परफेक्ट चाहिए होती हैं उसमें गलती हुई तो वे तिरस्कार के पात्र हो जाते हैं जबकि सही तो आप भी नहीं होते ये बात आप जानते हैं।ऐसे अनगिनत बातें हैं जो आपके भीतर आपकी आंखों के सामने चलते रहते हैं पर आप सिर्फ उनकी आलोचना करते हुए निकल जाते हैं क्योंकि आपको स्वयं की गलती स्वीकार नहीं होती।

हर व्यक्ति हर धर्म हर जगह हर वो जीव जो धरती पर अवतरित हुआ है वो सिर्फ़ और सिर्फ़ खामियां लेकर पैदा नहीं हुआ है। सिक्के के दोनों पहलुओं को देखना सीखिए । नकारात्मक विचार और राष्ट्रवादी सोच की ढाल लेकर उसकी आड़ में स्वयं के व्यक्तिगत मन की जो भड़ास निकाल रहे हैं न उसके दुष्परिणाम आपके पास ही लौटकर आएंगे।

इंसान बनना सीखिए सर्वप्रथम और ग़लत को ग़लत और सही को सही कहना सीखिए। लेखक का काम नकारात्मक विचारों को फैलाना या कुंठित मानसिकता को अग्रसर कर आगे बढ़ाना नहीं होता है ! जिस तरह लोगों में, अलग अलग संस्थाओं में, सरकारी दफ्तरों में और चाहे कोई भी हो आप उनकी कमियां खामियां और गलतियां बताकर स्वयं को गौरवान्वित कर रहे हैं ये आपकी ओछी मानसिकता की प्रसिद्धि के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। स्वयं की गलतियों को खोजिए सर्वप्रथम और आंकलन कीजिए और स्वीकार कीजिए इस बात को कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। अच्छाई और बुराई दोनों साथ-साथ चलते हैं तो महत्व दोनों का बराबर होना चाहिए ना कि सिर्फ बुराई और नकारात्मक विचारों को बढ़ावा देना चाहिए!किसी को भी उसके व्यक्तित्व के साथ स्वीकार कीजिए चाहे सजीव हो या निर्जीव। सकारात्मक बनिए और सकारात्मक विचारों को अग्रसर कर अपना योगदान दीजिए मानव जाति को सद्बुद्धि प्रदान करने में। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए ।

राघवेन्द्र चतुर्वेदी(बनारस)

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