हाथी भाटा….

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जहां एक लाख वर्ष पहले भी मानव कारीगर था जबरदस्त वाला।।

उपेंद्र शर्मा

जिला टोंक( राजस्थान) में यह एक स्थान है हाथी भाटा…चौंकिएगा मत यह हाथी एक ही चट्टान को काट कर निखार कर बनाया गया है…कोई टुकड़ा यहां वहां से जोड़ा नहीं गया है…इसकी प्राचीनता के विषय में विवाद है लेकिन समकालीन कला के जानकार इसे 1500-2000 वर्ष पुराना तो बताते ही हैं। इस पर हिन्दू प्रभाव (घंटी का शृंगार, गले में कंठी और दांत पर कड़े) स्पष्टतः देखने को मिल रहा है।
इससे भी बढ़कर बात यह है कि इस हाथी के आस-पास एक लाख वर्ष पहले तक भी मानव बस्ती थी और उस दौर के लोगों ने वहां चट्टानों में खोद खोद कर (Engraving) चित्र बनाए हुए हैं बिना किसी रंग और ब्रश के…फ़िर जब मनुष्य आग से भी परिचित नहीं था तब के पत्थरों के औजार भी मौजूद हैं…फ़िर 5000 वर्ष पुरानी समाधियां, आटा-मसाले आदि पीसने की चाक-घट्टी भी यहां हैं। 5000 से 15000 वर्ष पहले के रंग वाले शैल चित्र भी देखे जा सकते हैं।

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एक ही स्थान पर अलग-अलग कालखंड में मानव बस्तियों की उपस्थिति एक बहुत बड़ा प्रमाण है 2000 वर्ष से पीछे वाले इतिहास को समझने के लिए…खासकर उन ज़ाहिलों के लिए जो दुनिया की शुरुआत सिर्फ 1500-2000 साल पहले से ही जबरन मानना व मनवाना चाहते हैं और कहते हैं कि भारत तो 500-700 साल पहले अंधेरे में डूबा हुआ था…और कोई इरफानुद्दीन व हजारी प्रसाद तो 400-500 साल पहले की किसी कला के अस्तित्व को ही नहीं मानते…वाह रे “फंडिंग” पर पलने वालों…
एक ही पत्थर पर बना यह हाथी इस बात का भी साक्षी है कि भारतीय पुरखे कितने समृद्ध कारीगर थे कि जब यूरोप, अरब, अमेरिका व अफ्रीका में लोग ढंग से झौंपड़ी भी बनाना नहीं जानते थे तब उनके पास इतनी विकसित इंजिनियरिंग का ज्ञान था…कि वे दुर्गम स्थलों पर भी महल, किले, मंदिर, सरोवर, बावड़ी, कुंड आदि बनाते थे….
एक अन्य महत्वपूर्ण बात यह भी कि राजस्थान में हाथी की परम्परा केरल-कर्नाटक-असम-झारखंड जैसी नहीं है, फ़िर भी यहां उस दौर में रहने वाले लोगों द्वारा “हाथी ही” बनाना इस बात का भी द्योतक है कि उनका सम्पर्क निश्चित ही यहां से 2000-2500 किलोमीटर दूर स्थित लोगों, कलाकारों, विज्ञान, कला, इन्जीनियरिंग आदि से भी था…उनकी यात्राएं और सम्पर्क बिना किसी सड़क-रेल-मोबाइल के भी कितने व्यापक व समृद्ध थे…
गर्व है मुझे उन असंख्य बाबोसा-काकोसा पर जो सही मायने में दुनिया को दिखा गए कि भारत से ज्ञान का प्रकाश संसार में गया है…संसार आज उसी प्रकाश से चमत्कृत है…

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उपेंद्र शर्मा, जयपुर(राजस्थान)

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