अपने ही घर में पिछड़ रही है हिन्दी।

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हिन्दी दिवस

नीरज कृष्ण

आज मैं हिन्दी लिखने वालों की भीड़ में सबसे पीछे खड़ा हूँ, अगर भीड़ को पलट कर देखने के लिए मजबूर कर दिया, तो सबसे आगे मैं…. ही दिखूंगा।
“नीरज कृष्ण

आन हूँ शान हूँ। देश की पहचान हूँ। फिर भी अपने ही घर में अंग्रेजी से परेशान हूँ प्राचीन काल में मानव जंगलों में निवास करते थे। समय के साथ धीरे-धीरे उसने समाज में मिलजुल कर रहना प्रारम्भ किया और सुरक्षा की दृष्टि से समूह में रहना उपयुक्त समझा जाने लगा । कालांतर में इन्ही समूहों से कबीलों का, फिर नगर का, राज्यों का और फिर देश का विकास हुआ। देखे तो राष्ट्रवाद की अवधारणा का विकास मध्यकाल से माना गया है। विदेशी विचारक भारत में राष्ट्रवाद के उदय का कारण अंग्रेजी शासन को मानते हैं, किन्तु यह कथन सर्वसम्मत नहीं है। वस्तुतः भारत में राष्ट्रवाद की भावना उतनी ही प्राचीन है जितना कि यहाँ का इतिहास हमेशा से यहाँ चक्रवती सम्राट बनकर सम्पूर्ण भारत पर शासन करना हमारे देश के प्राचीन कालीन राजाओं का सपना हुआ करता था। प्राचीन काल में हमारे यहाँ संचार के साधनों का अभाव होने के कारण लम्बे राजनीतिक एकता की बात न की जाय तो हम पाते हैं कि सांस्कृतिक एकता हमेशा से ही भारत में विद्यमान रही है। यहाँ के लोग हिमालय और हिंदमहासागर के मध्य स्थित इस भूमि को अपनी मातृभूमि मानते रहे हैं। शंकरचार्य ने देश के चारो कोनों पर चार मठों की स्थापना करके धार्मिक रूप से इस देश की एकता को मजबूत करने का कारण दे दिया। पर पिछले 74 वर्षों में राजनीतिक इच्छा शक्ति के अभाव के कारण भारत में कोई एक भाषा सम्पूर्ण राष्ट्र की भाषा न बन सकी है। किसी भी भाषा को विकसित होने के लिए राजनीतिक समर्थन की आवश्यकता होती और यह समर्थन हमारे देश में या तो कभी किसी भाषा को मिला ही नहीं या ऐसी भाषाओं को मिला जो जनसाधारण द्वारा प्रयोग में नहीं लाई जाती है। अंग्रेजी शासन ने प्रारम्भ में भारत के सांस्कृतिक और भाषाई मामलों में हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा लेकिन मैकाले की शिक्षा पद्धति ने जो प्रभाव छोड़े उनको हम आजतक झेल रहे है। भाषा का किसी देश की संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ता है यह हम भारतवासियों की अपेक्षा कौन अधिक जानता है ? अंग्रेजी भाषा की शिक्षा प्रणाली ने हमारे देश की संस्कृति को हमेशा ही नष्ट करना चाहा और हम पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगते गए । पश्चिमी संस्कृति ने चाहे लाख कोशिश की हो, चाहे महमूद गजनवी कितने ही बार भारत को लूटा हो पर हमारी सांस्कृतिक धरोहरों को वह लूट न सका। आज भी हमारे आदर्श पुरुष राम और कृष्ण ही हैं, आज भी आदर्श नारी सीता और सावित्री है। इस अमिट संस्कृति को भला इकबाल की इन पंक्तियों से बेहतर कौन परिलक्षित कर सकता है। “यूनानों मिश्र, रोम सब मिट गए जहाँ से / बाकी अभी तलक है, नामोनिशां हमारा / कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी / सदियों रहा है दुश्मन, दौर ए जहाँ हमारा”

भला इस संस्कृति के पीछे ऐसा क्या है ? जो इसे इतने हमलों के बाद भी अक्षुण्ण एवं जीवित रखे हुए है। इस संस्कृति के पीछे हमारी संस्कृत भाषा है जो स्वयं मिटकर भी जीवित है। यदि संस्कृत को राजनीतिक समर्थन मिलता रहता तो हम आज यह निबंध संस्कृत में लिख रहे होते। किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा न हो सका। किसी भी देश की एकता और प्रगति के लिए उस देश की एक राष्ट्रभाषा का होना अति आवश्यक हैं जो देश के बहुसंख्यक लोगों द्वारा बोली और समझी जाती हो। भारत के संदर्भ में देखा जाय तो कोई ऐसी भाषा नहीं है जिसे देश के सभी नागरिक बोलते और समझते हो। पर इस स्थिति में हमें ऐसी भाषा को राष्ट्रभाषा के किए चुनना होगा जिसे सर्वाधिक लोग बोलते और समझते हैं। निर्विवाद रूप से यह भाषा हिन्दी ही हो सकती है। हमारे राजनीतिज्ञों ने स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान ही राष्ट्रभाषा की आवश्यकता को महसूस कर लिया था। उन्होने हिन्दी के महत्व को भी भली-भांति पहचान लिया था। यही कारण था कि उन्होंने हिन्दी को ही स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों के लिए संपर्क भाषा के तौर पर प्रोत्साहित किया।

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आजादी के बाद हमारी संविधान सभा ने 14 सितम्बर 1949 में हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया था और अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी को व्यावहारिक रूप से अपनाने पर बल दिया गया था। लेकिन दुर्भाग्य से हिन्दी राजनीति के जाल में ऐसी फंसी कि आज तक नहीं निकल सकी है। आज राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए देश हित को ताक पर रखकर हिन्दी को विवादों में घसीट लिया है। कुछ मुट्ठी भर कुटिल राजनेताओं ने विशाल भारत के जनसमूह को पथभ्रमित कर रखा है, भोली-भाली जनता को तरह-तरह से गुमराह करके भाषा के नाम पर लड़ा रहे हैं। अंग्रेजी को बढ़ावा देकर उसे जबरन थोपा जा रहा है जबकि मातृभाषा के रूप में यह भाषा नगण्य भारतीय नागरिक ही बोलते हैं। अन्य लोग इसे विवश होकर सीखते है, उनका कहना है कि अंग्रेजी नहीं सीखेंगे तो रोजगार नहीं मिलेगा, विदेशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में और यहाँ तक कि अपने देश में बहुत सी जगहों पर बिना अंग्रेजी के काम करना मुश्किल है।

भाषा केवल सम्प्रेषण का माध्यम भर नहीं संस्कृति की वाहक भी होती है। परम्पराओं का प्रभाव भाषा पर पड़ना स्वाभाविक भी है। संस्कृति और सभ्यता का प्रवाह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में भाषा के द्वारा ही होता रहता है। कहावतें, लोकोक्तियाँ और मुहावरे विकसित होते रहते हैं। ये किसी भी भाषा की अमूल्य धरोहर होते हैं। भाषा जहाँ पर विकसित होती है वहाँ की सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और रीतिरिवाजों का प्रभाव उसमें परिलक्षित होता है। एक प्रकार से कहें तो यह भारत की मातृभाषा है। जिस व्यक्ति को अपनी मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने और अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिलता है वही अपनी प्रतिभा को व्यक्त कर पता है। यदि किसी समाज को परिस्थितियोंवश अपनी भाषा को छोडकर विदेशी भाषा को अपने कामकाज की भाषा बनाने पर विवश होना पड़े तो मातृभाषा की अवनति के साथ-साथ भाषा में संचित वहाँ की सांस्कृतिक धरोहर भी नष्ट होने लगती है। वे जिस भाषा को बोलते हैं उसी के साहित्य, संस्कृति और सभ्यता को श्रेष्ठ समझकर लोग उसके पथ पर बढ़ते जाते हैं।

अंग्रेजी को सभ्यता की पहचान समझ लिया गया है, अंग्रेजी भाषा यूरोप में विकसित हुई है और हिन्दी भाषा भारत में अंग्रेजी एक विदेशी भाषा है इस भाषा का साहित्य विदेशी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिखा गया है। जबकि हिन्दी भारत के बहुसंख्यक लोगों की मातृभाषा है। यह अहिंदी भाषी भारतियों के लिए भी उतनी अपरिचित भाषा नहीं है जितनी कि अंग्रेजी और सभी भारतियों के लिए इसे राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करना बहुत आसान है।

इतिहास गवाह है कि आजतक कोई भी समाज या व्यक्ति किसी की नकल करके महान नहीं बन सका बल्कि अपनी मौलिकता के कारण ही वे महान हुए हैं। अंग्रेजी भाषा के जाल में भारत कुछ इस तरह फंस गया है कि यहाँ की मातृभाषाओं की स्थिति चिंताजनक होने लगी है। मैकाले ने जिस शिक्षा पद्धति को भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की जड़े जमाने के लिए शुरू किया था आज भी हम उसको स्वयं ही अपने कंधों पर ढोने को मजबूर हैं। भारत में एक ऐसे वर्ग का विकास हो गया है जो संख्या में मामूली होते हुए भी अपने निजी स्वार्थ के लिए बहुसंख्यक लोगों को अंग्रेजी अपनाने पर विवश कर रहे हैं और तर्क दिया जाता है कि अंग्रेजी विश्वभाषा है। अंग्रेजी पढ़कर हम दुनिया भर में कहीं भी रोजगार पा सकते हैं।

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अंग्रेजी भाषा को सीखना बुरा नहीं है, अंग्रेजी से परहेज नहीं होना चाहिए। लेकिन राष्ट्रिय स्वाभिमान को ताक पर रखकर ऐसा नहीं होना चाहिए। हद तो तब पार होती हुई लगती है, जब उन्हे जबरन अंग्रेजी बोलने पर मजबूर किया जाता है। अंग्रेजी सीखकर हम विदेशों में नौकरी कर लेते हैं। आखिर हम विदेशों में नौकरी करने जाते ही क्यों हैं ? क्यों नहीं विदेशी लोग हमारे यहाँ नौकरी करते ? हम अपनी प्रतिभा को भूलकर सिर्फ नौकरी पर केन्द्रित हो गए हैं। यदि शिक्षा का माध्यम हिन्दी हो तो अवश्य ही भारतीय छात्रों की प्रतिभा निखर कर सामने आएगी। हम नौकरी देने वाले तभी बन सकते हैं जब हिन्दी को शिक्षा का माध्यम बनाएँ। हमारे यहाँ चीन की अपेक्षा कई गुना अधिक अंग्रेजी पढे लिखे लोग हैं, फिर भी हम चीन से आर्थिक और विज्ञान क्षेत्र में पिछड़ते जा रहे हैं। चीन अपने राष्ट्र भाषा को लेकर आज विश्व समृद्ध देशों में दूसरे पायदान पर है। हम क्यों पिछड़ रहे हैं ? यह क्यों हो रहा है ? जिस समाज की अपनी कोई राष्ट्रभाषा नहीं, जो विदेशी भाषा पर निर्भर है वह भला पिछड़ेगा नहीं तो और क्या करेगा ? तर्क दिया जाता है कि उच्चकोटी का ज्ञान अन्य भाषाओं में है। तो ठीक है इसके लिए उन उच्चकोटी के पुस्तकों का अनुवाद करके जनता ..की भाषा में उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जनता को उस भाषा को सीखने के लिए मजबूर करना ठीक नहीं। उच्चकोटीका ज्ञान हिन्दी भी हो सकता था पर नहीं हुआ क्योंकि हमने अपनी भाषा हिन्दी को उपेक्षित छोड़ दिया।

भाषा स्वयं ज्ञान पैदा नहीं करती, ज्ञान तो इसको बोलने वाले पैदा करते हैं। भाषा तभी समृद्ध होती है जब उसे कामकाज की भाषा बनाया जाय। अतीत में भारत विश्वगुरु था, यहाँ सोने की चिडिया रहती थी। अब ये उपाधियाँ मजाक लगती है। जिन लोगों ने अपनी भाषा को सम्मान दिया उन्होने संसार में अपनी विजय पताका फहराई। वे आज हमे नौकरी देते है, हम नौकरी मांगते हैं। जिन्होंने अपनी भाषा को सम्मान दिया उन्होंने विश्व का अनगिनत आविष्कारों के उपहार दिए। इसीलिए आज उनका बोलबाला है। आज विदेशों में हमारी बात को भी तभी सुना जाता है जब उसमें उनका फायदा हो। आज विश्व में हमें सम्मान क्यों मिले ? हमने विश्व को दिया ही क्या है सिवाय “शून्य” उसी को गा लेते हैं “जब जीरो दिया मेरे भारत ने” ।

सवाल उठता है कि क्या अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी सभ्यता से हम अपनी सभ्यता, संस्कृति और भाषा को अछूते रख पाएंगे ? यदि हम ईमानदारी से प्रयास करे तो अवश्य ही हम यह कर सकते हैं। हिन्दी को उसका उचित स्थान और सम्मान देकर ही हम अपने देश की एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान कर सकते हैं और देश को प्रगति के पथ पर आगे ले जा सकते हैं। भारतेन्दु हरिश्चंद्र की पंक्तियाँ यहाँ प्रासंगिक हो जाती है “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को सूल” विश्व में जहां सभी देशो ने अपनी भाषा के लाभों को बहुत पहले ही समझ लिया वहाँ हम आजतक कैसे नासमझ बनकर अपनी प्यारी हिन्दी को त्याग कर बैठे है। आज हम संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को उसका हक मिलने की प्रतीक्षा में बैठे हैं। लेकिन हमारे अपने देश की संसद में एक नेता क्या भाषण दे रहा है एक आम आदमी नहीं समझ पाता है। हिन्दी विश्व में सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा चीनी के बाद दूसरे स्थान पर है फिर भी यह संयुक्त राष्ट्र संघ में उपेक्षित है तो इसका कारण केवल यही है कि यह अपने घर में ही उपेक्षित है। जबकि अरबी और स्पेनिश जैसी भाषाओं को संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है। भला हमें हमारी ही भाषा से क्या शत्रुता है ? क्यों हमें हिन्दी को बढ़ावा देने में संकोच होता है। क्यों हम हिन्दी दिवस और हिन्दी पखवाडा मानकर अपने कर्तव्य को पूरा समझ लेते हैं। अपनी भाषा, संस्कृति पर हर किसी को गौरव का अनुभव होना चाहिए।

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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सत्य ही कहा है “जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं, नर पशु नीरा है और मृतक समान है।”

कुछ समय पहले तक हिन्दी प्रेमियों को कम्प्युटर क्रांति से हिन्दी के लिए खतरा महसूस होता था, लगता था कि अंग्रेजी बाजी मार लेगी किन्तु आज की स्थिति यह है कि कम्प्यूटर और इन्टरनेट के कारण हिन्दी भारत में ही नहीं वरन सारी दुनिया में पैर पसार रही है। कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखना बहुत आसान हो गया है। मोबाइल फोन पर हिन्दी लिखना संभव हो रहा है। इन्टरनेट पर हिन्दी ब्लॉग पर, ई-मेल पर फेसबुक पर और ट्विटर पर लिखी जा रही है। आज हिन्दी साहित्य को इन्टरनेट पर अपलोड किया जा रहा है। प्रेमचंद, निराला, जयशंकर प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर जैसे रचनाकारों के अमूल्य साहित्य अब महज कुछ क्लिक की दूरी पर है। हिन्दी साहित्य को विभिन्न भाषाओं में अनुवादित करके विश्व भर में पढ़ा जा रहा है। इससे भारतीय संस्कृति विश्व में शामिल हो गई है। राष्ट्रिय एकता को मजबूती देने में हिन्दी का बहुत बड़ा हाथ है। आज देश के हर कोने में हिन्दी भाषा को बोलने और समझने वाले मिल जाते हैं। दक्षिण के राज्यों में भी, जहां हिन्दी का प्रसार अपेक्षाकृत कम है, बोलने और समझने वाले आसानी से मिल जाने हैं। हिन्दी की देवनागरी लिपि का अक्षर र ही रुपए का चिन्ह बना है। हर्ष का विषय यह भी है कि यह चिन्ह स्थान हम किसी हिन्दी भाषी प्रदेश से नहीं बल्कि अहिंदी भाषी प्रदेश तमिलनाडू से आया है।

आज हिन्दी अघोषित राष्ट्रभाषा बन चुकी है। हमारे राजनेता बेशक इसे राष्ट्रभाषा बनाने के मुद्दे पर राजनीति की रोटियाँ सेकते रहे हों परन्तु भारत की जनता इसे राष्ट्रभाषा मान चुकी है। आज अहिंदी भाषी लोग भी समझने लगे हैं कि हिन्दी न सीखने का अर्थ है स्वयं को एक दायरे में सीमित कर लेना ।

आज भी हिन्दी देश को वह दे रही है जो एक राष्ट्रभाषा किसी राष्ट्र को देती है भले ही हमने आधिकारिक रूप से इसे राष्ट्रभाषा घोषित न किया हो। हिन्दी में लचिलापन और विभिन्न भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करने की क्षमता के कारण लोकप्रिय हो रही है। अंत कहा जा सकता है कि हिन्दी देश की राष्ट्रभाषा का आधिकारिक दर्जा पाने की एकमात्र दावेदार है और यह सम्मान उसको मिलना ही चाहिए क्योंकि हिन्दी में वह सामर्थ्य है। हिन्दी ही भारत को एक सूत्र में पिरो सकती है।

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