महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू।

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नीरज कृष्ण

यह भारत ही है जहां महिलाओं को देवियों के रूप में देखा जाता है और संस्कारों की जननी का महत्व भी महिलाओं के नाम है। संभवतः इसीलिए भारतीय नारी को शक्तिपुंज के रूप में देखा जाता है। अध्यात्य जगत में नारी अनेक रूपों में शक्ति की पहचान के तहत भगवान के नाम से पूजी गई है। यह सिक्के का एक पहलू हो सकता है। लेकिन अगर व्यावहारिक जगत में या जमीनी स्तर पर अथवा आज के लोकतंत्र की बात की जाये और भारत की वंचित तबके की नारी का देश की राष्ट्रपति बनना समूची नारी जाति के लिए और भारत के लिए एक गौरव की बात है।

द्रौपदी मुर्मू आज देश की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेंगी। मुर्मू राष्ट्रपति बनने वाली दूसरी महिला और पहली आदिवासी हैं। राष्ट्रपति के रूप में माननीय दौपदी मुर्मु के निर्वाचन पर पूरे देश में अभूतपूर्व प्रतिक्रियाएं देखने व सुनने को मिल रही हैं। आज तक राष्ट्रपति पद के चुनावों के प्रति आम आदमी की रुचि लगभग शून्य होती थी। इसके विपरीत विगत कुछ वर्षों से देश की आम जनता का इस तरह अपनी रुचि दिखाना स्वागत योग्य बदलाव है। पिछले दो-तीन सप्ताहों से सोशल मीडिआ पर भी देश का मूड देखने को मिला।

वह एक अदभुत क्षण होगा जब द्रौपदी मुर्मू देश के राष्ट्रपति का पद सम्भालेंगी। द्रौपदी मुर्मू का झोपड़ी से 340 कमरों वाले राष्ट्रपति भवन का सफर हमारे लोकतंत्र का जश्न है कि एक आदिवासी महिला जिसने दुनिया भर का अन्याय सहा, अत्यन्त गरीबी देखी, समाज का तिरस्कार सहा, निजी त्रासदी सही, वह देश की प्रथम नागरिक बनने जा रही हैं।

सच्चाई यह हैं कि इस समय एक वो बेटी, जो एक बड़ी उम्र तक घर के बाहर शौच जाने के लिए अभिशप्त थी.. अब भारत की ‘राष्ट्रपति’ बनने जा रही हैं। एक यह लड़की जो पढ़ना सिर्फ इसलिए चाहती थी कि परिवार के लिए रोटी कमा सके। वो अब भारत की राष्ट्रपति बनने जा रही हैं। कल तक यही मुर्मू, जो बिना वेतन के शिक्षक के तौर पर काम कर रही थीं, वो अब भारत की ‘राष्ट्रपति’ बनने जा रही हैं। वो महिला, जिसे जब ये लगा कि पढ़ने-लिखने के बाद आदिवासी महिलाएं उससे थोड़ा दूर हो गई हैं तो वो खुद सबके घर जा कर ‘खाने को दे’ कह के बैठने लगीं…. वो अब भारत की ‘राष्ट्रपति’ बनने जा रही हैं।

वह संथाल आदिवासी समुदाय से आती हैं। गाँड़ और भील के बाद संथाल देश का तीसरा सबसे बड़ा आदिवासी समुदाय है। संथाल को संताल भी कहा जाता है। सांथा का मतलब काम और आला का मतलब मैन होता हैं। यानी शांत व्यक्ति।

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द्रौपदी मुर्मू जिस इलाके से निकलकर देश के विस्तृत फलक पर निकल कर आयी हैं वहां कल्पना भी नहीं कर सकते कि द्रौपदी जी को बचपन में कैसे-कैसे अभाव, कठिनाइयां झेलनी पड़ी होगी। आज की नई पीढ़ी कल्पना भी नहीं कर सकती कि पढ़ाई के लिए देश के दसियों लाख बच्चों को क्या-क्या करना पड़ता है। कोई नदी-नाले पार करके जाता है तो कोई जीवन को जोखिम में डालकर क्षतिग्रस्त पुलों को पार करके जाता है। दौपदी जी ने अपने गांव में जब पांचवीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली तो आगे की पढ़ाई के लिए उनके गांव में स्कूल नहीं था। अतः पास के शहर में जाना पड़ा। एक तो आदिवासी समुदाय से दूसरे गरीब और तीसरा लड़की आप कल्पना कीजिए कि उन्होंने कैसे-कैसे संघर्षों का सामना ही नहीं किया, बल्कि उन पर विजय भी पाई।

आज जब वह राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगी तो देश की सबसे कम उम्र वाली राष्ट्रपति होगी। उनका जन्म 20 जून 1958 को हुआ था। उन्होंने उड़ीसा के आदिवासी परिवार में जन्म लिया, येजुएशन की और कमाल देखिए उड़ीसा के ही राज्य सचिवालय में एक क्लर्क के तौर पर नौकरी शुरू की और अब वह राष्ट्रपति भवन में सुशोभित होकर देश का गौरव बढ़ायेगी। महिला को अबला कहकर अपनी रचनाएं लिखने वाले कवियों को आज समझ लेना चाहिए कि हमारी महिला अब सबला है अर्थात बहुत शक्तिशाली है। वे न केवल साइकिल, स्कूटर, कार या टैंक या लड़ाकू विमान, मॅट्री ही नहीं चला सकती बल्कि अंतरिक्ष में भी अपनी पहचान बना चुकी है। कॉरपोरेट सेक्टर को शानदार ढंग से संचालित करने वाली महिलाएं आज राष्ट्रपति बनकर देश के सामने एक उदाहरण बन सकती है।

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द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना भाजपा की दलगत राजनीति से भी बड़ा है। यह संकेत हैं कि हमारे लोकतंत्र में खुद को सही करने की क्षमता है। अहसास है कि लुटियंस की दिल्ली ही भारत नहीं है। एक आदिवासी महिला का राष्ट्रपति बनना शानदार है। जागृत जनता ही श्रेष्ठ राष्ट्र का श्रेष्ठ भारत का निर्माण कर सकती है. ऐतरेय ब्राह्मण में सदियों पूर्व लिख दिया गया था राष्ट्रवाणि वैविशः अर्थात् जनता ही राष्ट्र को बनाती है। द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना समस्त आदिवासी और महिला समाज के भाल पर गौरव तिलक लगाने की तरह है। हमें अभी तक उपेक्षित और शोषित रहे वर्ग को समर्थ तथा सशक्त बनाना है। एक आदिवासी महिला का राष्ट्रपति बनना सामाजिक सोच को अंधकार से निकालकर प्रकाश में प्रवेश करना है।

द्रौपदी मुर्मू की जीत कई मायनों में हम 140 करोड़ लोगों के लिए अविस्मरणीय और अद्भुत घटना है। यह दिवस भारत के इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा जाएगा। ऐसा नहीं है कि द्रौपदी मुर्मु की तरह देश के अन्य लाखों लोगों ने ऐसी ही या इससे भी अधिक त्रासद स्थितियों को न झेला हो लेकिन उन्होंने द्रौपदी जी की तरह संकल्प शक्ति, धैर्य और जिजीविषा के अंशों को नहीं त्यागा। द्रौपदी मुर्मू के जीवन के बारे में आप जितना ज्यादा जानेंगे आपके भीतर उतना ही अधिक आत्मविश्वास जगेगा। यदि आप पूरी संवेदनशीलता के साथ द्रौपदी जी के संघर्षो की गाथा को पढ़ेंगे, देखेंगे, सुनेगे तो आप निश्चित रूप से पहले से ज्यादा बेहतरीन पहले से ज्यादा आत्मविश्वासी और पहले से ज्यादा बेहतर इंसान बनेंगे।

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राष्ट्रपति केवल संविधान के संरक्षक ही नहीं, वह सशस्त्र सेनाओं के कमांडर इन चीफ तथा केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के विजिटर भी हैं। राष्ट्रपति रबर स्टैम्प नहीं है। उनकी शपथ ही उन्हें विशिष्ट बनाती हैं। जहां मंत्री और सांसद भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा की शपथ लेते हैं राष्ट्रति, और केवल राष्ट्रपति, संविधान और विधि के परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण की शपथ लेते हैं। अर्थात् बाकी उस संविधान की शपथ लेते हैं जिसके संरक्षक राष्ट्रपति हैं।

राष्ट्रपति पद केवल 330 एकड़ के विशाल भूभाग में फैले, 70 करोड़ ईटों से निर्मित 340 कमरे, ढाई किलोमीटर लम्बे गलियारों वाले परिसर में रहने के लिए नहीं होती बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारियां निभाने के लिए होती है। उम्मीद है कि महामहिम राष्ट्रपति महोदया द्रौपदी मुर्मू जी का कार्यकाल जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतरेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनकी जीत का यह उजाला देश के बेहद पिछड़े व दूर-दराज के वन क्षेत्रों में रहने वालों के जीवन में नयी आशा का संचार करे।

राष्ट्रपति बनने के बाद इस समुदाय को उनसे बहुत उम्मीद है। कितना कर पाएंगे ये तो वक्त ही बताएगा, लेकिन उनकी जीत पर समूचा आदीवासी समाज गदगद है, खुशी से झूम रहा है। साथ ही अभी से खुद को विकास को मुख्यधारा से जुड़ा देख रहा है। द्रौपदी मुर्मू उनकी आखिरी उम्मीद हैं, अगर वह भी कुछ नहीं कर सकी, तो यही से उनकी आखिरी ख्वाहिशे दम तोड़ देगी उम्मीद हैं ऐसा ना हो, नई महामहिम अपने समुदाय के लिए कुछ करें, उनके सुर्दर्घ सामाजिक, राजनीतिक, सार्वजनिक जीवन के अनुभव का लाभ लेने की प्रतीक्षा में हैं उनका अपना मूल समुदाय।

उड़ीसा के आदिवासी समाज से संबंध रखने वाली द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने पर सारा देश खासकर महिलाये और पूरा आदिवासी और दलित वंचित समाज प्रसन्न हुआ है। वो देश की 135 करोड़ जनता को अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से और भी गौरवान्वित कर सकती हैं उनसे ऐसी ही अपेक्षा देश करता है।

नीरज कृष्ण
एडवोकेट पटना हाई कोर्ट
पटना (बिहार)

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