इंतजार फिर तेरे आने का

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उठी बदन में फिर एक लहर । आसमाँ के हर चुम्बन पर कहती बार – बार – ‘मेरे कातिल’ ! तुमसे दिल लगाने मैं आऊंगी हजार बार ।”

प्रतिभा की कलम से

वो थी इस जमीं की । जहां फूल, तितली, जुगनू और परिंदों से उसे प्यार था । मगर इनमें से किसी को भी उससे नहीं । क्योंकि कोई न उसके हाथ पर खिलता था और ना कोई उसकी मुट्ठी में आता था। मखमल था उसका दिल। मगर कोई जो कभी दाखिल हो सके इतनी नाजुकी से कि सिलवटें न पड़ जायें दिल की मखमली चादर पर !
किसी वीरान मौसम में उसने एक बार घबराकर ताका आसमान की तरफ । साफ था आसमान । नीला । सूरज की रोशनी में बेहद खूबसूरत नजर आता हुआ। मन हुआ उसे कि वह अपनी काली पलकें रख दे इस नीले चेहरे पर । आसमान ने भी एतराज न किया । झुका सा जान पड़ता था वह भी, जब ये अपना चेहरा उठाकर अपलक उसे ताकती। कुछ फिर वह फूलों की कतर-ब्योंत में खोई । कुछ भागी तितलियों के पीछे । जुगनू वाली रातों में भूल गई आसमान की ओर देखना । कई दिन से कोई खत भी ना लिखा उसने परिंदों के ‘पर’ पर आसमां के नाम । मगर मजाल क्या कि एक बूंद प्यार भी कहीं कम हुआ हो उसके चाँद जैसे दिल में मौजूद मोहब्बत के कटोरे से । एक सुबह ओस पर नजर पड़ते ही सुलग उठे उसके गाल फिर से । याद आई बेइंतहा आसमां की । हुलस कर फिर उसने गर्दन उठाई । जुल्फें फैल गई पीठ पर । स्याह करती थी जो बदन को । उसी तरह आसमान भी घिरा हुआ जगह-जगह से भूरे-काले बादलों के बीच। वह बुरी तरह तलाश करती है आसमां के उस निर्मल चेहरे को । मगर नहीं ! उसमें उग आयी हैं डरावने बादलों की कई -कई आँखें । जो मांगती है कैफ़ियत ! आसमां की तरफ प्यार भरी नजर उठाने की ज़ुर्रत के बाबत। लड़की की आँखों में सावन-भादो तैर गए। मगर आसमाँ साफ ना हुआ । महीनों का सूखा पड़ा रहा फिर नेह की बरसात पर । ना आसमान झुका, और न वो नजर उठाने की हिमाकत कर सकी। एक परिंदा जो कभी खत ले जाता था ‘इसका’ ‘उसके’ नाम । गुजरा आज उसकी पलकों के तले-तले ।शरद पूर्णिमा की रात थी । आसमाँ ने थोड़ी चाँदनी छिड़क कर ‘प्यार’ लिख दिया था उसके पँखो पर विगत प्रेम के नाम । पढ़ा ‘इसने’ वो शीतल अफ़साना । तन – मन भीगने लगा ठंडी फुहार से।

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उम्मीद भरी निगाहों से आसमां की तरफ ताका उसने । साफ था वह भी पहले की तरह हँसता हुआ। फिर उसके कदमों में बिछने को तैयार। मिले फिर हवा में । लिपटे इस तरह कि ‘इसकी’ चूनर से ढक गया सिर से पैर तक आसमान । गुजरे सितम ‘इसकी’ आंखों से सैलाब बनके फूटा । शिकायतों के गुबार उठने लगे ‘उसके’ दिल में बहुत जोर से । दिलों की धड़कन मद्धम पड़ गई । घिर गया आसमान फिर से काले -भूरे बादलों के बीच । घबराकर छुड़ा लिया ‘इसने’ अपने आपको ‘उसके’ आगोश से । कट के रह गया दिल सोच के, कि वह जमीन की है उसे जमीं में ही रहना चाहिए । नहीं चाहिए कोई दिलदार। शुष्क मौसम की आहें आँसुओं की नमी में घुल भाप बनकर उड़ाने लगी ढेर सारा प्यार।
उठी बदन में फिर एक लहर । आसमाँ के हर चुम्बन पर कहती बार – बार – ‘मेरे कातिल’ ! तुमसे दिल लगाने मैं आऊंगी हजार बार ।

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प्रतिभा नैथानी

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