यह सिर्फ पुस्तक नहीं बल्कि उत्तराखण्ड के विगत दो शताब्दियों के तमाम आंदोलनों, संघर्षों की समग्रता का एक दस्तावेज है: कविता भट्ट।

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गजेन्द्र रौतेला की पुस्तक “उत्तराखण्ड के जनान्दोलन” पर कविता मैठाणी की समीक्षा।

किसी भी समाज में संघर्ष/प्रतिरोध उस समाज की जागरूकता, जिम्मेदारी चेतनाशीलता और जीवंतता का प्रमाण हैं। प्रतिरोध के बिना मानव विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
उत्तराखण्ड एक ऐसा विषम भू भाग है जहां का हर नागरिक रोजमर्रा के जीवन में निरंतर विकट व विषम परिस्थितियों से जूझते हुए अपने अस्तित्व को बचाये रखने हेतु संघर्षरत है। रोजमर्रा के जीवन में इन तमाम संघर्षों के बावजूद भी उत्तराखण्डी समाज में प्रकृति प्रदत्त संसाधनों व प्राकृतिक सौंदर्य की परिपूर्णता में स्वच्छंद जीवन यापन करने व आत्मनिर्भर बने रहने की कुशल क्षमता रही है। किंतु कुछ बाहरी तत्वों और सत्ता ने सदैव उत्तराखण्ड समाज की इस क्षमता को कमजोर करने का कार्य किया । जिससे प्रतिरोध के स्वर मुखरित होना लाजमी था। नतीजतन सिर्फ रोजमर्रा के जीवन में ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन में भी उत्तराखण्डी समाज ने निरंतर संघर्ष व प्रतिरोध के जरिये ही तमाम विकट परिस्थितियों से जूझते हुए अपने अस्तित्व को बचाया और स्वयं को आगे बढ़ाया है । विभिन्न समयों मे उत्तराखण्ड में समाज की बेहतरी व अपने संसाधनों की सुरक्षा हेतु प्रतिरोध के स्वर मुखरित हुए हैं । प्रतिरोध के इन स्वरों के कारण ही उत्तराखण्ड में जन आन्दोलनों की एक वृहद व समृद्ध परंपरा रही है। बिना संघर्ष व प्रतिरोध के यहां कभी भी कुछ भी नहीं मिला है।यहां तक कि उत्तराखण्ड राज्य भी एक वृहद जनान्दोलन की ही देन है । इसलिए उत्तराखण्ड को जनान्दोलनों की भूमि कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी। उत्तराखण्ड के समाज को आगे ले जाने में इन आन्दोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

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जब भी उत्तराखण्ड के जनान्दोलनों का जिक्र होता है तो सामान्यतया एकमात्र उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन का ही नाम सबके जेहन में आता है। क्योंकि जन संघर्षों और जनसरोकारों की इस समृद्ध विरासत को न तो पाठ्य पुस्तकों में ही कहीं स्थान मिला है और न ही प्रतियोगी परीक्षाओं में। जबकि आंदोलनों की इस भूमि में 19वीं शताब्दी से और वर्तमान समय तक सतत् जनान्दोलनों की एक लम्बी फेहरिस्त है।
जल, जंगल, जमीन, बिजली, सड़क, गाड़ी, बीज……..आज जो कुछ भी है वो सब हमें यूं ही नहीं मिला है इसके लिए हमारे पुरखों ने संघर्ष किया है, जानें गंवाई हैं। हमारे पुरखों के जन संघर्षों की तपिश को नयी पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए उत्तराखण्ड के इन जनसंघर्षों और समृद्ध आन्दोलनकारी इतिहास को एक पुस्तक के रूप में प्रस्तुत करना वास्तव में एक श्रमसाध्य कार्य है, और यह दुष्कर कार्य किया है बहुआयामी प्रतिभा के धनी, रचनाधर्मी शिक्षक साथी श्री गजेन्द्र रौतेला जी ने। गजेन्द्र जी शिक्षक होने के साथ साथ विभिन्न सामाजिक सांस्कृतिक, साहित्यिक गतिविधियों में भी सक्रिय हैं।
उत्तराखण्ड के जनान्दोलनों की सारगर्भित रूप में जानकारी देने, युवा पीढ़ी को अपनी समृद्ध विरासत से परिचित करवाने और अपने ऊर्जावान पुरखों के संघर्षशील जीवन से रूबरू करवाने वाली इस पुस्तक का नाम है “उत्तराखण्ड के जनान्दोलन” ,जो संस्कृति प्रकाशन अगस्त्यमुनि (केदारघाटी) द्वारा प्रकाशित है। यह सिर्फ पुस्तक नहीं बल्कि उत्तराखण्ड के विगत दो शताब्दियों के तमाम आंदोलनों, संघर्षों की समग्रता का एक दस्तावेज है।
पुस्तक का आगाज होता है प्रमुख इतिहासकार प्रो.शेखर पाठक के शानदार, ज्ञानवर्धक प्राक्कथन और जनमुद्दों के लिए सदैव संघर्षरत भाई इन्द्रेश मैखुरी के ऊर्जित शुभकामना संदेश से।पुस्तक का यह शानदार आगाज पाठकों को आकर्षित भी करता है और पुस्तक पढ़ने के लिए आमंत्रित भी करता है।
आजादी के आन्दोलन में उत्तराखण्ड की भूमिका(1857) से लेकर लोकभाषा आंदोलन(2005) तक कुल 29 जनान्दोलनों को लेखक व संपादक श्री गजेन्द्र रौतेला ने पुस्तक में समाहित किया है ।
पुस्तक में वर्णित 29 आन्दोलनों में से लगभग 21 आन्दोलनों के बारे में उन आन्दोलनों से जुड़े या जानकारी रखने वाले संघर्षशील व्यक्तित्व, पत्रकार, सामाजिक चिंतक, साहित्यकारों के लेखों को लेखक द्वारा संपादित किया गया है । जिनमें आजादी के आन्दोलन में उत्तराखण्ड(ललित मोहन कोठियाल), वन आन्दोलन(तरुण जोशी),कुली बेगार आन्दोलन(इन्द्र सिंह रजवार),तिलाड़ी आन्दोलन(विद्यासागर नौटियाल), श्रमदान आन्दोलन( अनुसूया प्रसाद घायल), सर्वोदयी आन्दोलन(अनुसूया प्रसाद मलासी), बीज बचाओ आन्दोलन(विजय जड़धारी), विश्वविद्यालय आन्दोलन( जयप्रकाश पंवार), चिपको आन्दोलन (रमेश पहाड़ी), पाणी राखो आन्दोलन(अनुसूया प्रसाद मलासी), सांस्कृतिक आन्दोलन(डा०अतुल शर्मा), गौरीकुण्ड मजदूर आन्दोलन(गंगाधर नौटियाल), बलिप्रथा विरोधी आन्दोलन(लखपत राणा), नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन( नैनीताल समाचार), पत्रकार आन्दोलन(रमेश पहाड़ी), उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन( इन्द्रेश मैखुरी), मैती आन्दोलन(प्रीतम अपछ्याण), फलेण्डा आन्दोलन(त्रेपन सिंह चौहान), झपटो- छीनो आन्दोलन(धन सिंह राणा), नदी बचाओ आन्दोलन(जगमोहन रौतेला), लोकभाषा आन्दोलन(दीपक बैंजवाल) आदि आन्दोलन शामिल हैं।

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उक्त आन्दोलनों के अतिरिक्त डोला पालकी, गाड़ी सड़क,प्रजामण्डल, टिंचरी, टिहरी का शराब विरोधी आन्दोलन,टिहरी बांध विरोधी आन्दोलन,भूख हड़ताल ,चकबंदी व गैरसैण राजधानी आन्दोलन के साथ ही उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन सार संक्षेप को श्री गजेन्द्र रौतेला ने अपने गहन अध्ययन, जनसंघर्षों के मुद्दों पर‌ व्यापक पकड़ व विलक्षण प्रतिभा का परिचय देते हुए पाठकों के समक्ष रखा है।
जैसा कि पुस्तक के प्राक्कथन में प्रो०पाठक कहते हैं कि “जब तक हम अपनी लड़ाइयों, अपने संघर्षों की विरासत को नहीं समझेंगे तब तक आगे की लड़ाइयों और संघर्षों को नहीं बढ़ा सकते। इसी से आगे के लिए ऊर्जा और सूत्र प्राप्त हो सकेंगे।” प्रो० पाठक जी के इस कथन के आधार पर देखा जाय तो पुस्तक इसलिए भी महत्वपूर्ण बन पड़ी है कि यह नयी पीढ़ी को उत्तराखण्ड के तमाम ऐतिहासिक जनान्दोलनों के साथ साथ उन आन्दोलनों , जनसंघर्षों के संघर्षशील नायकों से भी परिचित करवाती है जिनका नाम उपेक्षित है या यूं कहें कि जानबूझकर उपेक्षित रखा गया है। जनान्दोलनों के साथ साथ उन अनाम नायकों का नयी पीढ़ी को परिचय देना लेखक का स्तुत्य प्रयास है।

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किसी भी आन्दोलन में जनगीतों और नारों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। ये जनगीत आन्दोलनकारियों के उत्साह में वृद्धि करके उनमें निरंतर ऊर्जा का संचार करते हैं । इस पुस्तक में भी जन चेतना को जगाने वाले, ऊर्जा का संचार करने वाले जनगीतों की कुछ सटीक पंक्तियों को सम्मिलित किया गया है, जो सराहनीय है। किंतु कई आन्दोलनों में इन जनगीतों का अभाव भी परिलक्षित होता है ।टिहरी के शराब विरोधी आन्दोलन में लोककवि घनश्याम सैलानी के जनगीतों का सिर्फ जिक्र हुआ है , इन जनगीतों की कुछ पंक्तियां भी अपेक्षित हैं।
आने वाले संस्करणों में वन , शराब विरोधी ,बलिप्रथा विरोधी , मैती, गैरसैण राजधानी, लोकभाषा आदि आन्दोलनों में भी प्रचलित जनगीतों, लोकगीतों की पंक्तियों को सम्मिलित किये जाने की अपेक्षा है।

अपने संघर्षपूर्ण गौरवशाली इतिहास को जानने समझने और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने हेतु यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण है। निजी एवं विद्यालयी पुस्तकालयों के लिए भी संदर्भ पुस्तक के रूप में यह पुस्तक उपयुक्त है। लेखक के समर्पित भाव से किये गये इस श्रमसाध्य कार्य से उनकी पहाड़ के सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट परिलक्षित होती है। निरंतर अध्ययन व सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले श्री गजेन्द्र रौतेला जी इस समर्पण व श्रमसाध्य कार्य हेतु बधाई के पात्र हैं।

कविता मैठाणी भट्ट, उखीमठ(रुद्रप्रयाग)

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