दुनिया को भारत की देन हैं जीसस।

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(आज क्रिसमस पर विशेष)

ध्रुव गुप्त

विश्व इतिहास के महानतम व्यक्तित्वों में एक जीसस या ईसा के जीवन का एक बड़ा कालखंड ऐसा है जिसके बारे में बाइबिल सहित किसी प्राचीन ग्रन्थ में कोई ज़िक्र नहीं है। 12 वर्ष की आयु तक उनकी गतिविधियों का उल्लेख बाइबिल में मिलता है। उन्हें यरुशलम में पूजास्थलों में उपदेशकों के बीच में बैठे, उनकी सुनते और उनसे प्रश्न करते हुए पाया गया। उनकी अनंत जिज्ञासाओं से वहां पुजारी भी अचंभित हुए थे। उनकी दिव्यता और नए विचारों की चर्चा फैली तो रूढ़िवादियों की नज़र उनपर गड़ने लगी। उनकी जान को खतरा देख उनके पिता जोसेफ उन्हें अपने साथ नाजरथ ले गए जहां जीसस ने पिता के बढ़ईगिरी के काम में कुछ अरसे तक हाथ बंटाया। इसके बाद तेरह से उनतीस साल के जीसस के जीवन के बारे में कहीं कोई उल्लेख नहीं मिलता। जीसस के जीवन के इन रहस्यमय वर्षों को ईसाई जगत में साइलेंट इयर्स, लॉस्ट इयर्स या मिसिंग इयर्स कहा जाता है। उसके बाद जीसस ने सीधे तीस वर्ष की उम्र में येरुशलम लौटकर यूहन्ना से दीक्षा ली और चालीस दिनों के उपवास के बाद लोगों को धार्मिक शिक्षा देने लगे। उन्होंने कहा कि ईश्वर एक है, प्रेमरूप है, वे स्वयं ईश्वर के पुत्र और स्वर्ग और मुक्ति का मार्ग हैं। कर्मकांडी और बलिप्रेमी यहूदियों को उनकी लीक से हटकर शिक्षायें रास नहीं आईं और उन्होंने जीसस को तैतीस साल की उम्र में क्रूस पर लटका दिया।

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जीसस के लॉस्ट इयर्स की खोज पहली बार1887 ई में एक रुसी खोजकर्ता नोटोविच ने की। प्रमाणों के साथ उन्होंने और इस रहस्यमय कालखंड में जीसस के भारत में रहने का रहस्योद्घाटन किया। कश्मीर भ्रमण के दौरान जोजीला दर्रे के समीप एक बौद्धमठ में नोटोविच की मुलाक़ात एक बौद्ध भिक्षु से हुई थी जिसने उन्हें बोधिसत्व प्राप्त एक ऐसे संत के बारे में बताया जिसका नाम ईसा था। भिक्षु से हासिल विस्तृत जानकारी के बाद नोटोविच ने ईसा और जीसस के जीवन में कई समानताएं रेखांकित की। उसने लद्दाख के लेह मार्ग पर स्थि‍त प्राचीन हेमिस बौद्घ आश्रम में रखी कई पुस्तकों के अध्ययन के बाद ‘द लाइफ ऑफ संत ईसा’ नामक एक पुस्तक लिखी। इस चर्चित किताब के अनुसार इस्राएल के राजा सुलेमान के समय से ही भारत और इजराइल के बीच घनिष्ठ व्यापार-संबंध थे। भारत से लौटने वाले व्यापारियों ने भारत के ज्ञान की प्रसिद्धि के किस्से दूर-दूर तक फैलाए थे। इन किस्सों से प्रभावित होकर जीसस ज्ञान प्राप्त करने के उद्धेश्य से बिना किसी को बताये सिल्क रूट से भारत आए और सिल्क रूट पर स्थित इस आश्रम में तेरह से उनतीस वर्ष की उम्र तक रहकर बौद्घ धर्म, वेदों तथा संस्कृत और पाली भाषाओं की शिक्षा ली। उन्होंने संस्कृत में अपना नाम ईशा रख लिया था जो यजुर्वेद के मंत्र 40:1 में ईश्वर का प्रतीक शब्द है। यहां से शिक्षा लेकर वे येरूसलम लौट गए थे।

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जीसस के भारत आने का एक प्रमाण हिन्दू धर्मग्रन्थ ‘भविष्य पुराण’ में भी मिलता है जिसमें ज़िक्र है कि कुषाण राजा शालिवाहन की मुलाकात हिमालय क्षेत्र में सुनहरे बालों वाले एक ऐसे ऋषि से होती है जो अपना नाम ईसा और अपना जन्म एक कुंवारी मां के गर्भ से बताता है। लद्दाख की कई जनश्रुतियों में भी ईसा के बौद्ध मठ में रहने के उल्लेख मिलते हैं। विश्वप्रसिद्ध स्वामी परमहंस योगानंद की किताब ‘द सेकंड कमिंग ऑफ क्राइस्ट: द रिसरेक्शन ऑफ क्राइस्ट विदिन यू’ में यह दावा किया गया है कि ईसा ने भारत में कई वर्ष रहकर भारतीय ज्ञान दर्शन और योग का गहन अध्ययन और अभ्यास किया था। स्वामी जी के इस शोध पर ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ और ‘द गार्जियन’ ने लंबी रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसकी चर्चा दुनिया भर में हुई। इयान कोल्डवेल की एक किताब ‘फिफ्त गॉस्पल’ जीसस की जिन्दगी के रहस्यमय पहलुओं की खोज करती है। इस किताब का भी यही मानना है कि तेरह से उनतीस वर्ष की उम्र तक ईसा भारत में रहे।

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कई शोधकर्ताओं ने इस आधार पर भी ईसा के लंबे अरसे तक भारत में रहने को विश्वसनीय माना है कि जीसस और बुद्ध की शिक्षाओं में काफी हद तक समानता देखने को मिलती है। अहिंसा, प्रेम, त्याग, सेवा और क्षमा हिन्दू-बौद्ध दर्शन के मूल तत्व थे, जो समकालीन दूसरे धर्मों में देखने को नहीं मिलते।.जीसस में सबसे बड़ी बात उनकी पवित्र आत्मा की अवधारणा है। जीवात्मा का सिद्धांत भारतीय दर्शन का हिस्सा है। ईसा से पहले आत्मा की अवधारणा पश्चिम में नहीं थी। ईसा ने इसे परमेश्वर के अभिन्न अंग के रूप में स्वीकार किया, जिसे चित्रों में सफ़ेद कबूतर के रूप में दर्शाया जाता है।

अबतक की खोजों से दुनिया भर में शोधकर्ताओं के एक बड़े हिस्से द्वारा माना जाने लगा है कि जीसस के लॉस्ट इयर्स के सुराग भारत में ही मिलते हैं। उनकी जड़ें भारतीय धर्म और दर्शन में हैं। भारत ने ही उनके मानस को गढ़ा और उन्हें जीसस से जीसस क्राइस्ट बनाया।

ध्रुव गुप्त,
पटना(बिहार),
पूर्व आईपीएस अधिकारी।

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