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(ब्यंग)

हरदेव नेगी

किसी ने अपनी व्यथा क्योँ सुनानी तुरंत पहाड़ के लोगों के हृदय से एक बात निकलती है “हरयाँ देबो” उसके दुख में सम्मिलित हो ही जाता है, राजनीतिज्ञ व्यक्ति की तरह नहीं होता पहाड़ वासियों का बकळा दिल (कठोर दिल), जो दूसरे की पीड़ा में संवेदना व्यक्त कर सके,, संवेदना व्यक्त करने वाला दिल राजनीति करने वालों के होता है..

उत्तराखण्ड में पहाड़ के वासियों का दिल बहुत ही मैलुख होता है, इतना मैलुख जैंसे घी और बटर की तरह, घाम या आग की झौळ (तेज आग / गर्मी) लगी नहीं और पिघला नहीं, किसी ने अपनी व्यथा क्योँ सुनानी तुरंत पहाड़ के लोगों के हृदय से एक बात निकलती है “हरयाँ देबो” उसके दुख में सम्मिलित हो ही जाता है, राजनीतिज्ञ व्यक्ति की तरह नहीं होता पहाड़ वासियों का बकळा दिल (कठोर दिल), जो दूसरे की पीड़ा में संवेदना व्यक्त कर सके,, संवेदना व्यक्त करने वाला दिल राजनीति करने वालों के होता है,.. पिछले एक महीने में यह मैलुख दिल काफी हद तक यहाँ के उर्जावान युवाओं में भी देखा गया, उनके हृदय में भी “सबका साथ सबका विकास व सबका विश्वास” वाली बात जाग उठी,,, जहाँ पिछले एक महीने में विकास रूपी महिला व पुरुष जनता के उज्ज्वल भविष्य के लिए गिच्चा फाड़ रही थी / रहा था, वैंसे में बेरोजगारी में नंबर वन उत्तराखण्ड के युवाओं ने भी एैंसे प्रत्याशीयों के प्रति अपनी जी जान लगा रखी थी,,, शायद उनको अपना भविष्य उज्जवल होता दिखाई दे रहा था,,,
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लेकिन आजकल युवाओं के साथ – साथ प्रत्यशियों को भी अपने उज्ज्वल भविष्य भी चिंता पड़ी थी, एैंसा चुनाव के समय ही होता है जब बेरोजगारों और सरकार बनाने वालों का भविष्य एक साथ ढगमगा रहा हो, कुछ प्रत्यशियों ने अपने भविष्य के प्रति मंच से आँसू बहाये तो, किसी ने कहा मेरा आखिरी ट्रायल है,।वही एैंसे में एक नेता एैंसे भी थे कि अगर मैं हार गया बल “उसके बाद मेरा पस्तौ” देने आ जाना बल, एैंसी – एैंसी हृदयविदारक घटना देखने को मिली, जो जनता से सांत्वना ले सके और जीत सके.
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अब जब गाँव के बेराजगार युवाओं की खीसी नौकरी का फौरम भरने व फोन का इंटरनेट पुगाने व गोल्डन चबाने के चक्कर में खाली हो गई हो तो वैंसे में चुनाव के टैम प्रचार करना ही एक मात्र विकल्प बच जाता है, फुंड त्वेब द्वी पैंसा तो आयेंगे बल खिसा में, गाँव के युवाओं के पास जो भी नेता अपड़ा दुःख सुनाता, वो अगले दिन उसको जिताने के चक्कर में प्रचार प्रसार में लग जाता, उससे भी उसका दुःख नहीं देखा गया “निरभगी मैलुख दिल”, पर इस दुःख की भी एक कीमत होती है जो कि प्रत्याशी को दिन ध्याड़ी के रूप में चुकानी पड़ती है, अब जब तक राजनीति में फौलोवर्स न हो और होड़ा – होड़ी न मचे तो पता कैंसे लगे कि इसको कितने चाहते हैं,,
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आजकल युवा भी तेज हैं प्रत्यशियों की चाल ढाल सब समझते हैं, उनके पास जो भी प्रत्याशी आया उन्होंने उसका प्रचार प्रसार किया, युवाओं ने किसी भी नेता का दिल नहीं दुखाया, सबके हित के लिए लड़ते रहे, जो भी नेता आया उसके पोस्टर लगाये, थौड़ा धै -धवड़ी लगाई और अपनी ध्याड़ी ली, वही युवा कभी कांग्रेस के प्रचारक, तो कभी बीजेपी, तो कभी आप,। तो कभी निरदलयी तो कभी यूकेडी. गाँव की औरतें, चाची बौडी बोल रही थी कि आज इसका प्रचार कर रहे कल किसी और का, कुछ इकमात नहीं इन छ्वोरों का भी, तभी तो ई नौत्या भी बिग्च गये बल, और प्रत्यशियों को लग रहा था कि यहाँ के युवा मेरे फेवर में हैं, जबकि वो नहीं जानते कि युवा बेरोजगार हैं,तभी तो आजकल इनके भी महँगे तेवर हैं, फ्री में क्या होता है बल,,, अगले द्वी तीन महीनों का खर्च भी तो निकालना ही है युवाओं को,,, ! हारने जीतने के बाद नेताओं ने दिखना नहीं, इसलिए यही मौका है।

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हरदेव नेगी,गुप्तकाशी(रुद्रप्रयाग)

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