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“यादें बचपन की “

आलेख

“यादें बचपन की “

संस्मरण

दीपशिखा गुसाईं

बचपन कितना मासूम और जिद्दी भी होता है,,
आज जब बच्चों को देखती हूँ तो सोचती क्या ये वास्तव में स्वाभाविक बचपन जी रहे हैं,,नहीं उनका बचपन कहीं खो सा गया है, वक़्त कहाँ है उन्हें ये सब महसूस करने का,

“हम भी अगर बच्चे होते
नाम हमारा होता गबलू बबलू
खाने को मिलते लड्डू ,
और दुनिया कहती हैप्पी बर्थडे टू यू”…..
एक पुरानी फिल्म “दूर की आवाज” में जानी वाकर पर फिल्माया यह गीत शायद हर कोई अपने बच्चे को जरुर सुनाता होगा बच्चे को चुप करने या बिजी रखने के लिए , इस बहाने हम अपने दिल की बात भी कह जाते है काश कि फिर बचपन लौट आता,,
बच्चे की तोतली व भोली भाषा सबको लुभाती है। बड़े भी इसकी ही अपेक्षा करते हैं रेलगाड़ी को ‘लेलगाली’ व गाड़ी को ‘दाड़ी’ सुनकर किसका मन चहक नहीं उठता है? बड़े भी बच्चे के सुर में सुर मिलेकर तोतली भाषा में बात करके अपना मन बहलाते हैं। और अगर यही सब अकेले में शीशे के आगे करके देखो तो खुद पर हंसी आयेगी ,पर बच्चो के लिए बच्चा बनकर कितना खुश हो लेते है इसका अंदाजा तो हो ही जाता है,,
हम सभी को याद आती है अपने बचपन की,सभी ने जीया जिया है बचपन को , ,शायद ही कोई ऐसा हो जिसे अपना बचपन याद नहीं ,,
मुझे भी याद है वो सारी शरारतें ,,,बस आज यूँ ही बैठे संतरे खा रही थी तो कुछ यादें स स्मृतिपटल पर अंकित हो आई याद आया संतरे का पेड़ और दोस्तों की टोली संग चुराकर खाये संतरे ,,
बहुत छोटी थी फिर भी याद है स्कूल जाना मुझे बहुत पसंद था और स्कूल जाकर छोटे बच्चों संग बैठना कतई पसंद नहीं था ,, मुझे दीदी संग पांचवीं की क्लास में बैठना पसंद था ,,और लिखना भी उसी कॉपी में जो दीदी के पास और पेन भी वही चाहिए जिससे दीदी लिखेगी ,,घर आकर भी घर में तो टिकते ही नहीं थे अपनी टोली संग कभी किसी के तो कभी किसी के संतरे चुराकर नमक संग खाना ,,नमक की भी बारी लगाई होती कभी कोई तो कभी कोई लाएगा ,, बचपन में शरारती तो थी ही और हमेशा टोली को लीड करती थी,,
याद है मुझे कैसे छोटी साथ आने की जिद करती “उक उक में भी तलूंगी” और में बहाना बनाकर चुपके निकल लेती थी वजह मेरी की गई सारी शरारते उसके द्वारा घर में पता चल जाती थी,,और फिर मार पड़ती थी अच्छी वाली ,,ऐसे ही एक दिन किसी के संतरे चुराते हुए पेड़ में तो चढ़कर ढेरो संतरे तोड़ लिए बाकि सब नीचे रहकर समेटते थे ,,,उस दिन भी ऐसा ही हुआ पर अचानक पेड़ के मालिक का आना हुआ सब तो भाग गये और में जल्दबाजी में उल्टा लटक गई बस फिर क्या था गुरूजी की बेटी कहकर ड़ाट तो थोड़ा पड़ी पर घर में शिकायत पहुँच गई,,बस फिर जो मार पड़ी आज भी याद है,ऐसी ही कई यादें आज भी याद आती है तो बरबस ही चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है ,,बचपन कितना मासूम और जिद्दी भी होता है,,
आज जब बच्चों को देखती हूँ तो सोचती क्या ये वास्तव में स्वाभाविक बचपन जी रहे हैं,,नहीं उनका बचपन कहीं खो सा गया है, वक़्त कहाँ है उन्हें ये सब महसूस करने का, अपने बचपन को यादों का खूबसूरत पल देने का ,,बचपन को अपने स्मृतिपटल पर अमिट छाप छोड़ने का ,,जैसे हम याद कर रहे हैं क्या वो भी याद कर पाएंगे अपनी शरारतो को यूँ इस तरह से ,,,
अब जो बचपन बीत गया वो तो अगले जन्म में ही वापस आएगा ,,हाँ उसकी सुखद स्मृतियाँ जेहन में जीवनपर्यन्त बनी रहेंगी….

“दीप”

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