मासिक धर्म: एक नेचुरल प्रोसेस

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“28 मई मासिक धर्म स्वच्छता दिवस”

दीपशिखा गुसाईं

“हाँ मुझे एक बात की तसल्ली जरूर है कि अब कुछ जगह विद्यालयों में बच्चियों के लिए अलग क्लासेज लगाकर पीरियड्स के बारे में जानकारी दी जाती है,, और उनके लिए अचानक ऐसी स्थिति में स्कूल में पैड्स की ब्यवस्था भी की जाती है,, पर सोचती अलग क्लासेज क्यों,,?? क्यूंकि इन सबके बारे में लड़कों को भी सम्पूर्ण जानकारी साथ में देनी चाहिए। “

यह शब्द हम यूँ आज कह रहे,, बात कर रहे इसके बारे में,, पर अभी भी हम जब औरते इसके बारे में बातें करती तो आवाज धीमी कर देती या फिर इशारों में बात करती मतलब अभी तक यह विषय टेबू ही है,, बात हमारे धर्म की करें तो बहुत सी वर्जनाएं हैं और मैं इस बारे में बात भी नहीं करुँगी क्यूंकि हर कोई जानता है आज कि कौन कौन सी कठिनाइयों से गुजरना पड़ता एक औरत को उस वक़्त, , कई आदिवासी जगह तो आज भी सेनेट्री पेड्स की उपलब्धता न होने की वजह से उन्हें कपडे, रेत, राख और पेड़ की पत्तियों का इत्तेमाल करती हैं जो सेहत के लिए कितना हानिकारक सभी जानते,,
आज भी जब हम किशोरवय की और बढ़ती अपनी बेटियों को इस बारे में बताने पर भी हिचकते हैं,,जबकि उनको सबसे ज्यादा जरुरत इस बारे में बताने की और साथ ही ऐसे वक़्त पर उनकी एक्स्ट्रा केयर की भी,,, हाँ मुझे एक बात की तसल्ली जरूर है कि अब कुछ जगह विद्द्यालयो में बच्चियों के लिए अलग क्लासेज लगाकर पीरियड्स के बारे में जानकारी दी जाती है,, और उनके लिए अचानक ऐसी स्थिति में स्कूल में पैड्स कि ब्यवस्था कि जाती है,, पर सोचती अलग क्लासेज क्यों,, क्यूंकि इन सबके बारे में लड़कों को भी सम्पूर्ण जानकारी साथ में देनी चाहिए जिससे वो इस अहम् बात का मज़ाक न उड़ाए या लड़की को अपमानित न करे,एक धब्बा क्या लगा कि लगे हँसने,,वो लड़की भी कोसने लगती खुद को लड़की होने पर,, ऐसा कभी न करें,,,
एक लड़की के मानसिक विकास के लिए बेहद जरुरी कि वो अपने शरीर और उससे जुड़े परिवर्तनों के लिए जागरूक हो,,पर दुःखद ऐसा हमारा समाज सोच ही नहीं पाता,,
मैं कई बार सोचती थी शायद सिर्फ हमारे ही धर्म में ऐसा या फिर हम भारतीय ही इतने संकीर्ण विचार रखते पर जब पढ़ने बैठी तो देख दुनियां में सभी जगह यह विषय ही ऐसा कि उस औरत को ही हेय समझा जाता जो इन 5 दिनों से होकर गुजर रही होती,, हाँ पुराने वक़्त में जो प्रतिबंध लगाए गये थे वो उनके स्वास्थ्य और उनके उस वक़्त नाजुक हालात कि वजह उनकी केयर के लिए थे, , पर यह समय के साथ विकृत होने लगा,,
आज पढ़ रही थी कहीं कि जॉन्सन एंड जॉन्सन ने ब्राज़ील, भारत, दक्षिण अफ़्रीका, अर्जेंटीना और फिलीपींस में ये अध्ययन किया.इस अध्ययन में सामने आया कि महिलाएं सेनिटरी नैपकिन ख़रीदने में शर्म महसूस करती हैं. इसके साथ ही पीरियड के दौरान महिलाएं अपनी सीट से उठने में भी शर्म महसूस करती हैं.फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ़ बहिया से जुड़ीं 71 साल की समाज मानव विज्ञानी सेसिला सार्डेनबर्ग बताती हैं कि उन्हें अपना पहला पीरियड उस दौर में हुआ था जब लोग मुश्किल से ही इस बारे में बात करते थे.वह कहती हैं कि इस विषय से जुड़ी शर्म को दूर करने के लिए ज़रूरी है कि महिलाएं इस बारे में बात करें और आजकल की महिलाएं अपनी माहवारी को लेकर शर्मसार नहीं दिखती हैं.मतलब कि दुनियां के हर कोने में इसे टैबू ही माना गया,,
हाँ शायद अब कुछ कुछ बदलाव आ रहे हैं और हम बात कर रहे हैं बेझिझक,, होना भी चाहिए ये जरुरत हैं आज की और अगर आप ऐसे वक़्त में महिलाओं को हेय समझेंगे तो समझो महिला का सम्मान भी उतना ही निरर्थक है आपके लिए,, फिर महिला सम्मान का डंका न बजाइये।।

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“दीप “

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