मोतीचूर के लड्डू

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(व्यंग्य)

राजीव नयन पाण्डेय

“यहाॅ का मौसम बड़ा हसीन है” रेडियो पर “मैने प्यार किया” का गाना सुनने में शुक्ला जी इतने खो गये थे की ध्यान ही नहीं रहा कि फोन पर अनगिनत छुटी काल याने ‘मिस काॅल’ पडी थी। वैसे तो शुक्ला जी हर आने वाले अंजान फोन को “बिछुड़ी हुई वो” का मान कर बड़े ही आशिकाना अंदाज मे पैर पर पैर चढा गहरी सास भर कहते “हैल्ल्ल्ल्लल्ल्ललो”………….. अंजान नम्बर से कई बार फोन आने से ‘काॅलेज के जमाने में जितनी हुआ करती थी’; सबको याद कर डाले पर इस कम्बखत “जियो” वालो के चक्कर मे अंदाजा लगाना मुश्किल था कि आखिर यह नम्बर किस जगह का है।
शुक्ला जी वैसे तो बड़े शालीन व सुदर्शन व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे पर चेहरा देख उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था………क्योकि सर के बाल ..”काॅरवा गुजर गया” के समान “बिछड़े सभी बारी बारी” एक एक बाल अलविदा कहते गये। जमाने की नजर मे टकला हो गये थे; फलतः काॅलेज में फस्ट ईयर मे ही रिसर्चर मान लिए गये पर शुक्ला जी “दिल तो बच्चा है जी” मानते रहे।
अखबार और सोशल मीडिया में रसभरे व मसालेदार खबर पड़ने की आदत और हर रस मे सिर्फ “श्रृंगार रस” खोजना तो शुक्ला जी की विशेषता थी। अखबार मे कभी खबर मिलती कि “बच्चो को छोड़ प्रेमिका के साथ फुर्र” “फेसबुक पर पनपा पुराना प्यार”; “शादी के मंडप से दुल्हन फरार”; “मिस काॅल से मिला नया प्रेमी” जैसी बे सिरपैर की खबर को बड़े चाव से पढते थे।
शुक्ला जी ने मन मे ख्याली पुलाव पकाते हुए फोन किया……..पर किसी ने न उठाया। अब तो शुक्लाजी का अंदाजा यकीन मे बदलने लगा था कि जरूर उसके आस पास कोई होगा इसी लिऐ नही उठा रही हो…….नम्बर फेसबुक से लिया हो……. मिलना चाहती हो..। फिर से मिलाया………इस देर मे तो नम्बर याद तक कर लिया……..पल पल बेचैनी सी हो रही थी …….साॅस रोके रोके .. ….बेचैनी सी होने लगी थी……पर उनको सास लेने की फिकर कहा.. ” हैलो” कड़कती आवाज सुन शुक्लाजी सन्न हो झट से काॅल कट कर दी। कुछ देर बाद फिर से उसी नम्बर से आती काॅल देख शुक्ला जी नर्भसाते हुए काॅल रिसीभ तो कि…पर कुछ सेंकेंड चुप हो अंदाजा लगाने लगे…”हैलो शुक्ला जी..हैलो हैलो शुल्का ..हैल्लो शुल्का ..कहते कहते……….का बे शुक्ला..सुनाई नही देरा है का बे….। शुक्ला जी अब ‘ “बे” सुनने पर समझ गये है “का बे मिसिर” बहुत दिन बाद……..याद किये.कईसन हो बे”।
काॅलेज के दिनो मे शुक्ला और मिसिर दोनो की अपनी अपनी गुटबाजी चलती थी…बाकिर मिसिर का कन्याओ मे बड़ी पकड़ होती थी…क्योकि मिसिर अपनी घनेरी जुल्फो में “रे-बईन” का ड्ब्ल्यू किट चश्मा लगा के सिटियाबाजी करते तो अईसा लगता जैसे कोई “मोतियाबिंद का ऑप्रेशन” करा के अस्पताल से आज ही आये हो, पर कुछ भी हो; वेअपने को कवनो हीरो से कम नहीं ऑकते थे……. तो बिन बालो वाले शुक्ला जी ऐसे उदास हो जाते जईसे सावन मे मोर अपने पैरो को देख कर दुखी हो जाता है।

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अच्छा ..शुक्ला जी आप तो जानते ही है कि जब से शादी हुई तब से व्यस्त रहने के कारण कही घुमने नही जा पाऐ..बहुत दिनो से आपकी भाभी कह रही थी…कही घुमने चलने के लिए । किसी तरह से समय निकाल अगले सप्ताह आ रहा हू …कह कर फोन कट हो गया।
‘इ मिसिर हमेशा मजाक उड़ाता था’..दाड़ी और बाल को एक ही ट्रिमर से ट्रिम कर ललाट के ऊपर तक फेस वास से रगड़ते हुए शुक्ला जी पुरानी यादो मे खो से गये थे… ..क्या कमी है इस सुंदर मुखड़े मे, शुक्ला जी ऑखो मे ऑखे डाले आत्मसलाघा मे डूबते ही जा रहे थे……….। शुक्ला जी को याद आने लगा जब मिसिर का वो लम्बी लम्बी जुल्फे जो संजय दत्त की ‘साजन’ की नकल करने की कोशिश थी……….इसी जुल्फ के लिए कंघी और पर्स के साथ रखने की इच्छा शुक्ला जी मूछो पर फेर कर पूरी करते थे।

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शुक्ला जी अपनी गाड़ी से मिसिर को सपरिवार ले कर चल दिए ।
समय का फेर कहे या शुक्ला जी की आंतरिक खुशी ..शुक्ला जी से रहा नही गया..”अरे मिश्रा जी कैसे हो गये है आप”..आपके बालो का क्या हुआ …क्या हुआ बताईऐ तो सही; ” शुक्ला जी अपनी चाॅद पर दूर तक हाथ फेरते हुए कहा..।
“कुछ नहीं शुक्ला जी..बस ऐसे ही.. ” मिश्रा जी बात पुरी करते तब तक पीछे से पूर्व परिचित मिसिराईन ही बोल पड़ी..जैसे जाने कब से भरी पड़ी हो.. “क्या कहे भाई साहब, आप को तो याद होगा ही कि इनकी घनेरी जुल्फो की दीवानगी के कारण मैने सब छोड़ इनसे शादी की। मती मारी गई थी..बुद्धी घास चरने गई थी। इस जुल्फ ने तो मेरी जिंदगी ही नरक कर दी ।


शहर घुमने के दौरान जब भी मौका मिलता शुक्ला जी….शुरू हो जाते.. “तो फिर क्या हुआ भाभी जी”; शुक्ला जी को भी मिसिर की कमजोर नस दबाने का मौका मिल ही गया था.. , और ..बताईऐ..फिर क्या भाई साहब…….
“सुबह के कई घंटे तो साहब शीशे के सामने ही गुजारते है, फिर बालो वाला जैल अलग से; कड़ा और मुलायम करने वाला अलग से; मेंहदी अलग से..और बालो को रंग रोगन करने के लिए कभी नेचुरल तो कभी बरगंड़ी..मुझे तो नफरत सी हो गई है..इस जुल्फ से।
“जी भाभी जी” शुक्ला जी हाॅ मे हाॅ मिलाते हुए कहे..’ देखिये मेरी तरफ, मै इन सब बातो से निवृत्त हो चुका हू। इतना शुकून और आराम मिलता है..समय बचता है, पैसे बचता है..और चेहरे पर चमक बनी रहती है।” शुक्ला जी ने अपनी तारीफ एक ही सास मे कर दी।
“जी भाई साहब” मिसिराईन शुक्ला जी से आत्मियता दिखाते हुए बोली..” आप सही कह रहे है..”इनके जुल्फो के रख रखाव मे आ रहे खर्चे को अब मै बरदास्त नही कर सकती…इस महगाई मे ।

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” मै समझ सकता हू” अपनी चमकती ललाट को साईड मिमर मे देख मंद मंद मुस्कुराते मन ही मन मोतीचूर के लड्डू के मीठास को महसूस करते हुए शुक्ला जी बोले।

मिसिर मन ही मन गुस्साऐ शुक्ला जी को घुरे जा रहे थे; पर मिसिराईनके कारण जबरी चुप थे।
” जिंदगी मे शुकून व शांति जितनी अब मिलती है , उतनी शायद ही कभी मिलती हो, मै तो कहू की एकाग्रता गंजे लोगो को ज्यादा होती है, तभी तो गंजे हर क्षेत्र मे आगे आगे है; ‘ है कि नहीं भाभी ‘; शुक्ला जी ने मिसिराईन को एक बार फिर से गंजा होने का फायदा ऐसे समझाने लगे; जैसे फिल्म शोले में वीरू का हाथ माँगने मौसी के पास जय जाता हैं..बुराइयों में अच्छाई खोजते हुऐ।

राजीव नयन पाण्डेय