“ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं”

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सिनेमा

प्रतिभा की कलम से

सिनेमा, साहित्य,कला,विज्ञान, शिक्षा .. कौन सा ऐसा क्षेत्र है जहाँ के स्थापित चेहरों ने कभी न कभी उत्तराखंड में दिन न गुजारे हों ?
सूची बहुत लंबी है, लेकिन मौके के मुताबिक हम कदम बढ़ायेंगे सिर्फ नृत्य और थिएटर और सिनेमा की जानी-मानी हस्ती ज़ोहरा सहगल की ओर । जन्म तो उनका सहारनपुर में हुआ था लेकिन देहरादून में उनके मामूजान की हवेली ‘नसरीन’ और चकराता में अपना पुश्तैनी घर होने के कारण बचपन से ही इन वादियों में आना-जाना लगा रहा उनका । चकराता वाले घर का तो अब नामोनिशान नहीं , लेकिन ‘नसरीन’ हवेली अब विश्व विख्यात वेल्हम गर्ल्स स्कूल है।
जानते हैं उनकी माँ ने उनका नाम ज़ोहरा क्यों रखा था ?
ज़ोहरा का मतलब होता है – ‘हुनरमंद लड़की’ । वास्तव में हुनरमंद निकली अपने ज़माने की वो पहली मुस्लिम लड़की थी जो नृत्य सीखने विदेश गयी थी। उच्च शिक्षा के लिए जब उन्हें लाहौर के क्वींस मैरी कॉलेज में भेजा गया मगर मुस्लिम लड़कियों के लिए पर्दा करना अनिवार्य होने के कारण नृत्य जैसी उन्मुक्त विधा में कुछ खास कर पाना वहां आसान न था। उनके एक और मामूजान उन दिनों जर्मनी में थे। उन्होंने ज़ोहरा सहगल का दाखिला मैरी विगमैन बैले स्कूल में करवा दिया। तीन साल तक आधुनिक नृत्य की शिक्षा लेते हुए ही उनकी मुलाकात प्रसिद्ध नर्तक उदय शंकर जी से हो गयी। उदय शंकर जी समझ गए कि जो़हरा के दिल में अपनी कला के प्रति वाकई एक ज़ुनून है, एक आग है। उन्होंने उन्हें अपने ग्रुप में शामिल कर लिया। यूरोप के कई देशों में बेहतरीन नाट्य प्रदर्शन के बाद अब पूरी नृत्य मंडली भारत आ गयी। एक बार फिर ज़ोहरा सहगल उत्तराखंड के अल्मोड़ा शहर में थीं। वहां वह नृत्य की शिक्षा देने लगी। वहीं मुलाकात हुई उनकी कामेश्वर सहगल नामक एक युवा वैज्ञानिक से। प्रेम हुआ और फिर विवाह भी। लेकिन शादी के पहले के हालात क्या थे कि जैसे भारत-पाकिस्तान बंटवारे पर हिंदू-मुसलमानों के दंगे। मगर जैसा कि वह हार मानने वालों में से तो थी नहीं, आखिरकार उन्होंने कामेश्वर से शादी करके ही दम लिया। कुछ समय तो ठीक रहा लेकिन फिर जाने क्या बात हुई कि कामेश्वर ने आत्महत्या कर ली । झटका बड़ा था लेकिन जो़हरा ने अब भी हार नहीं मानी। बच्चों की परवरिश के लिए उन्होंने पृथ्वी थिएटर ज्वाइन कर लिया। हुनर में तो जो़हरा का कोई सानी नहीं था लेकिन हुस्न में उनकी बहन उज़रा बट्ट हमेशा बाजी मार ले जाती थी और पृथ्वी थिएटर के हर नाटक की लीड रोल में हीरोइन उजरा ही रहती थी। साइड रोल की हताशा और शारीरिक बनावट पर अभद्र उपनामों से पुकारे जाने पर भी ज़ोहरा ने कभी बुरा नहीं माना । वो खुद दूसरों को बतातीं कि पीठ पीछे लोग उन्हें क्या कहकर बुलाते हैं ? उनके यही ठहाके और जिंदादिली उन्हें खूबसूरत बनाते थे । आर्थिक मजबूरियां बड़ा मसला था फिर भी मात्र इसे ही मकसद न बनाते हुए उन्होंने तब लंदन का रूख़ किया । वहाँ ‘रेड बिंदी'(red bindi) नेवर से डाइ( never say die) तंदूरी नाइट्स (tandoori nights) पार्टीशन (partition) जैसी कई फिल्मों और नाटकों ने उनकी ज़िंदगी को नये सोपान दिये । वहाँ शानदार काम करते हुए जब भारत वापसी की तो यहाँ भी फिल्मों में काम करने प्रस्तावों ने उनका जोरदार स्वागत किया । भारत ने अपनी पहली पारी में वो चेतन आनंद के “नीचा नगर” में काम कर ही चुकी थीं, जो कांस फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार हासिल करने वाली पहली भारतीय फिल्म भी बनी। इसके अलावा आवारा फिल्म में राज कपूर के लिए कुछ गीतों के कोरियोग्राफी भी उन्होंने की। क्योंकि थिएटर तो खून में बस चुका था, इसलिए “इप्टा” भी ज्वाइन कर लिया। यहां से संबंध बने शौकत आज़मी और बलराज साहनी जैसे महान कलाकारों से भी। ख़्वाजा अहमद अब्बास ने भी इप्टा में उनकी सक्रिय और समर्पित भागीदारी को देखते हुए अपनी पहली फिल्म “धरती का लाल” में उन्हें नायिका बनाया । सांवरिया, चीनी कम, वीर-जारा, हम दिल दे चुके सनम, चिकन टिक्का मसाला,साया …में उन्होंने ढ़ल चुकी उम्र में भी अदाकारी के नये जलवे बिखेरे । ‘दिल से’ फिल्म में ‘जिया जले जाँ जले’ गीत में अठासी बरस की ज़ोहरा सहगल का थिरकना कौन भूल सकता है भला ? प्रीति जिंटा से भी ज्यादा कमसिन तो वही लग रही हैं !
पद्म विभूषण,पद्म भूषण, पद्म श्री, संगीत नाटक अकादमी,कालिदास सम्मान से सुशोभित सौ बरस की उम्र तक वो नृत्य, थियेटर और फिल्मों में अपने सफल सफर का आनंद लेती रहीं । अपनी इन्हीं शानदार उपलब्धियों के बदौलत जोहरा सहगल को भारत की इजाडोरा डंकन कहा जाता था । बताना ना होगा कि आधुनिक नृत्य में पश्चिमी सभ्यता की सबसे नामी डांसर हुई हैं इजाडोरा डंकन ।
नब्बे वर्ष की उम्र में कैंसर की शिकार हुईं ज़ोहरा सहगल, लेकिन जल्द ही उबर भी गईं । 10 जुलाई 2014 में एक सौ दो बरस लंबी जिंदगी की अपनी आखिरी सांस के साथ ही थिएटर की दुनिया में भी वो कभी ना भरी जा सकने वाली एक खाली जगह छोड़ गईं।
आज उन्हें याद करना इसलिए भी जरूरी लगा कि जाना जाये आखिर ज़िंदगी कहते किसको हैं ? और ये लंबी होकर भी शानदार किस तरह बनी रह सकती है ।

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प्रतिभा नैथानी(देहरादून)

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