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पर्यावरण और गढ़वाली भाषाओं के गीतों को संरक्षित करने को लगातार प्रयासरत एक शख्सियत अंजली कपिला से पर्यावरण दिवस के अवसर पर संवादसूत्र की विस्तृत वार्ता के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं,, गंगा को निर्मल एवं स्वच्छ बनाए रखने के लिए लेडी इरविन कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) की सेवानिवृत्त प्रोफेसर अंजली कपिला आगे आई हैं।

प्रो. कपिला विश्वविद्यालय की छात्राओं के साथ “गोमुख से हरिद्वार तक गंगा की आवाज” को गीतों के माध्यम से समेटने का प्रयास कर रही हैं। गढ़वाली समेत अन्य भाषाओं में रचित गीतों के माध्यम से वह युवा पीढ़ी को गंगा एवं पर्यावरण संरक्षण की मुहिम से जोड़ने में जुटी हैं। अंजली कपिला से बातचीत के अंश…

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“आपको क्या है मेरे गीत से”
यह वाक्य किसी की जिंदगी बदल गए और एक सम्पन्न विलुप्त संस्कृति और लोकगीतों को संरक्षित करने का माध्यम बने,,,उन्होंने यह बात समझी कि अगर किसी भी पहाड़ी स्त्री को समझना है तो उसका माध्यम उनके गीत ही हैं।
जी हां कुछ लोग होते हैं जो उस बोली भाषा से अंजान होकर भी वहां की संस्कृति में रम जाते हैं,, और उसे संवारने को अपना सम्पूर्ण जीवन लगा देते,,हम यहां बात कर रहे एक ऐसी शख्सियत की,,जिनके बारे में हम जल्द पूरे विस्तार से परिचय देंगे,,आज पर्यावरण दिवस के दिन उंसके एक संछिप्त वार्ता में उनके विशाल ब्यक्तित्व का परिचय मिला,,,परिचय की मोहताज नही अंजली कपिला जी,,गैर पहाड़ी होने के बावजूद यहां की बोली भाषा को आत्मसात कर यहीं पहाड़ में कुछ वर्ष बिताकर उन्होंने पहाडी महिलाओं के गाए गीतों को सहेजना शुरू किया,,और अपने रीसर्च का विषय बनाकर उस पर काम किया,,उनका कहना कि हम ज्ञान सिर्फ किताबो से,tv या फिर प्रचार के अन्य माध्यम से मिलता,,पर उस वक़्त इस तरह के कोई मद्ध्यम न होने के बाद भी उन कम पढ़े लिखे लोगों के लिए ज्ञान का सोर्स आखिर क्या था,,,यह सोचनीय था उनके लिए,,
उन्होंने अब तक 4 किताबे भी लिखी,जिनमे “अ रिवर सिंग्स द गंगा गंगोत्री टू हरिद्वार” और “गुनगुनाती गंगा” शामिल हैं,,इन किताबों पर विस्तार से बातें होंगी।। उंसके बाद उन्होंने संकल्प लिया वो पहाड़ी महिलाओं की जिंदगी को गीतों के माध्यम से जानने की कोशिश करेंगी,,और इस कोशिश में कई पर्यावरणविद और पहाड़ी संस्कृति पर काम कर रहे कई बुद्धिजीवियों से मिलने का मौका मिला और उन्होंने इस काम मे उनकी मदद भी की।
संवादसूत्र से एक संछिप्त वार्ता में भावुक होते हुए कहने लगी,,साक्षात सरस्वती मां का आशीष उन पर रहा,, सरस्वती नदी का स्पर्श उन्हें एक नई ऊर्जा दे गई,,और यहां की महिलाओं के भावुक गीत उन्हें झकझोर कर गए,,
उनसे बातचीत के कुछ अंश,,इस वीडियो के जरिये,,रख रही हूं,,
आगे भी जारी रहेगी उंससे बातचीत के अंश,,

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