राजस्थान के पिरामिड…..

ख़बर शेयर कर सपोर्ट करें

उपेंद्र शर्मा

राजस्थान जिसे लोग सिर्फ रेगिस्तान के रूप में ही जानते हैं, जबकि रेगिस्तान तो यहां मूलतः सिर्फ 20-25 प्रतिशत हिस्से पर ही है। यहां जंगल हैं पहाड़ हैं। चम्बल व माही जैसी बारहमासी नदियां हैं। रेगिस्तान इस भूमि की अधुरी और एकांकी पहचान है।

संसार में जिस समय केवल अफ्रीका में मानव बस्तियाँ थीं उस दौर में राजस्थान उन चुनिन्दा जगहों में से था जहां मानव रहते थे। यह बात है करीब 6 से 10 लाख बरस पहले की…इसके प्रमाण भी मौजूद हैं। यहां 10 लाख बरस पुराने जीवाश्म (गैंडे और हाथी यहां तक कि समुद्री मछली व्हेल तक के) भी हैं…उस पर चर्चा फ़िर कभी करेंगे…

और पढ़ें  "ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं"

खैर आज बात मानव सभ्यता की…यह जो फोटो आप देख रहे हैं यह मूलतः अंतिम संस्कार स्थल (Megalithic) के हैं और वे भी 4 से 10 हजार वर्ष पहले के लोगों के। वे लोग हिन्दू थे या नहीं यह शोध का विषय है। दूसरे धर्मों-मज़हबों का उल्लेख इस लिए भी नहीं क्योंकि उस वक्त वे अस्तित्व में नहीं थे। उस समय लोग अपने परिजनों को भूमि में दफना कर उनके ऊपर इस तरह के पत्थर लगा देते थे। यह भी सम्भव है कि उन्हें जला कर उस स्थान विशेष पर यह कोई चिन्ह लगाते हों। इस तरह के पुरास्थल भारत में केरल, कर्नाटक, आंध्रा के जंगलों में पाए गये हैं। संभवतः मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात आदि में भी हों…उनकी भाषा आदि की भी जानकारी नहीं है, लेकिन ठीक ऐसे ही स्थल अफ्रीका में भी पाये गये है।

और पढ़ें  विश्व गौरैया दिवस !!

अफ्रीका के ही इजिप्ट (मिस्र) देश में तो शवों को सुरक्षित गाड़ने के बाद उन पर पिरामिड बनाये गये हैं। वहां पर्यटन के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं और करोड़ों-अरबों रुपयों का बाजार व रोजगार है।
लेकिन यह राजस्थान का दुर्भाग्य है कि यहां का कोई भी ऐसा दुर्लभ स्थल संरक्षित तक नहीं है। पुरातत्व और पर्यटन वाले साहब-लोग तो इनका रास्ता तक नहीं जानते..टोंक, भीलवाड़ा, बूंदी, चित्तौड़, कोटा आदि जिलों में यह बहुत जगहों पर मिले हैं। अगर इन्हें संरक्षित किया जाए तो मुर्दों के यह टीले राजस्थान में नई आर्थिक समृद्धि के द्वार खोल सकते हैं…दुख होता है कि इनके खोजकर्ता प्रोफेसर ओमप्रकाश कुक्की आज भी अपनी दुकान पर कचौरियां तल रहे हैं, जबकि वे तो भारत के “पद्म श्री” होने चाहिए…

और पढ़ें  आजादी का अमृत महोत्सव-कितना समीचीन?

मानव सभ्यताओं के जो पाठ स्कूल-कॉलेज की इतिहास वाली किताबों में पढ़ाए जाते हैं उन्हें पढ़कर यही लगता है कि सिन्धु घाटी हड़प्पा मोहन जोदड़ौ ही सबसे पुरानी सभ्यता-संस्कृति हैं जबकि वे तो बहुत आधुनिक हैं…उनसे कई बरस पहले की भी सभ्यता-संस्कृतियां हैं…और उनके व्यवस्थित व क्रमिक प्रमाण कहीं हैं तो वे राजस्थान में हैं…धरती के जन्म वाले पहले दिन से लेकर आज तक…किसी को पढ़ना हो इस मानव यात्रा को तो पढ़े राजस्थान की धरती को….

उपेंद्र शर्मा, जयपुर (राजस्थान)

Leave a Reply

Your email address will not be published.