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राघवेंद्र चतुर्वेदी

कहानी

…..सिक्का देते वक्त सरजू उसके हाथों के स्पर्श को पाकर मानों भीतर से खिल गया हो । फिर सरजू ने उनके समक्ष ही उस सिक्के को नदी के जल में प्रवाहित कर मानों मन ही मन कोई वरदान मांग लिया हो ! ये दृश्य देख उस लड़की ने पूछा पर सरजू मुस्कुराहट से उसे देखते हुए फिर कभी आइएगा तो मुलाकात होगी कहकर अपनी नाव लेकर वापस नदी की तरफ चल पड़ा ! दरअसल वो उस लड़की को वापस जाते हुए नहीं देखना चाहता था….

मल्लाह अर्थात नाविक जो नाव को खेवता है या चलाता है! सरजू एक मल्लाह परिवार में जन्म लेने वाला बालक था जिसने बचपन से अपने पिता को नदी में नाव चलाते हुए और खुद उस पर बैठ पानी में खेलते हुए देखा था।वो जब भी किसी व्यक्ति को देखता तो उसकी तरह बनने की कोशिश करता और जब किसी बच्चे को खिलौने से खेलते हुए देखता तो भावुक हो अपनी आतुरता को मन के भीतर दबा लेता क्यूंकि उसे पता था कि पिता सक्षम नहीं उस खर्च के लिए..! धीरे धीरे वर्ष बीत गए सरजू बीस वर्ष की आयु का हो गया और उसी बीच पिता के देहांत ने उसे आर्थिक और मानसिक दोनों रूपों में तोड़ दिया। फिर उसने पिता की नाव को ही अपना लिया और अब वो रोज यात्रियों और पर्यटकों को नदी की सैर कराने लगा और उन्हें खुश देखते हुए स्वयं को भी खुशी मन से सांत्वना देने लगा ।

ऐसे ही कई दिन गुज़र गये फिर आया एक ऐसा दिन जो सरजू की कल्पना से परे था…रोज की तरह वो नदी किनारे यात्रियों की प्रतीक्षा कर रहा था तभी एक खूबसूरत लड़की एक पुरुष के साथ उसके निकट आई और पूछी कि आज पूरे दिन के लिए वे दोनों सरजू की नाव बुक कर घूमना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने सरजू से दिन भर का किराया पूछा पर सरजू बेचारा तो एक टक उस लड़की को देखे जा रहा था फिर उसने चुटकी बजाकर पूछा कि कहां खो गए! किराया बताइए ? सरजू बोल पड़ा जो उचित लगे वो आप खुशी से दे दीजिएगा।
वे दोनों नाव पर सवार हुए और सरजू नाव चलाने लगा पर चप्पू चलाते हुए आज उसकी निगाहें बस उस खूबसूरत लड़की पर ही थी जैसे मानो उसे उसकी काल्पनिक सुंदरी मिल गई हो !

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वक्त बीतता गया वे दोनों आपस में बात करते हुए घूम रहे थे सरजू बस ये दृश्य देखते हुए नौका विहार करवा रहा था । सरजू उसे अपना सा मानने लगा भीतर ही भीतर यूं जैसे उसे स्नेह सा होने लगा उस लड़की से …तभी अचानक उस लड़की के पैरों में कुछ चुभ गया (पुरानी नाव की लकड़ी अक्सर अस्त व्यस्त होती हैं) और हल्की सी खरोंच आ गई सरजू झटके से उठा उसे संभालने के लिए लेकिन लड़की के साथ आए उस पुरुष ने पहले ही उसे संभाल लिया और रूमाल निकाल उसकी खरोंच पर बांध दिया । पर इतनी छोटी सी बात के लिए भी सरजू भीतर ही भीतर बेचैन हो रहा था, वो कुछ करना चाहता था उसके लिए तभी उसके मन में एक विचार आया वो उन्हें नदी के दूसरी तरफ ले गया जहां किनारे पर ही एक खूबसूरत फूलों का बागीचा था ! वहां पहुंच सरजू ने उनसे कहा कि वो इस खूबसूरती का आनंद लें कुछ पल फिर वे लोग बागीचे में घूमने के लिए कुछ पल को उतरे तब सरजू ने उसी बागीचे से ढ़ेर सारे फूल तोड़ अपनी नाव में बिछा दिया।

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जब वे वापस आए तो ये देख उनका मन मंत्रमुग्ध हो उठा और वो लड़की उत्सुकता वश पूछ उठी ये क्या किया! तब सरजू ने कहा अब आपको कोई तकलीफ़ नहीं होगी। खैर! फिर वो लड़की और पुरुष नाव में सवार हुए और फिर नौका चल पड़ी पर इस बार कहीं न कहीं उस लड़की का ध्यान भी सरजू के चमकते चेहरे की मुस्कुराहट पर था जो सुबह से नाव चला रहा था फिर भी ज़रा भी थकान उसके माथे के भाव पर नहीं थे । सरजू मन ही मन उसकी तरफ खिंचाव सा महसूस कर रहा था …अब जैसे जैसे शाम ढल रही थी सरजू ने नाव की रफ़्तार कम कर दी , वो नहीं चाह रहा था कि ये सफ़र कभी ख़त्म हो पर अंततः किनारा आ ही गया सफर पूरा हुआ और वे दोनों नाव से उतर बेहद खुश नजर आ रहे थे ! उन्होंने सरजू को बहुत धन्यवाद किया ये कहते हुए कि इतना प्रेम से नौका विहार उन्होंने आज तक नहीं किया जैसे सरजू ने करवाया था। फिर उन्होंने किराया पूछा पर सरजू तो मन ही मन स्तब्ध था वो समझ नहीं पा रहा था कि क्या करें ..उसके लब हिल नहीं रहे थे बस मन में उथल-पुथल सी मची थी ।

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उस पुरुष ने सरजू से बड़े प्यार और सम्मान से पूछा कि जो भी वो किराया कहेगा वे देंगे क्यूंकि आज वो बहुत खुश हैं। सरजू हल्की सी मुस्कान के साथ और आंखों में पानी लिए बोल पड़ा बस एक रूपया दे दीजिए! वे दोनों भौंचक्के रह गए उन्हे लगा या तो ये नाराज हो गया या मजाक कर रहा पर सरजू ने उस लड़की से हाथ जोड़कर स्नेहिल भाव से कहा बस आप एक रूपया दे दीजिए। फिर उस उस लड़की ने अपने पर्स से एक रूपये का सिक्का निकाल कर सरजू के हाथों पर रख दिया … सिक्का देते वक्त सरजू उसके हाथों के स्पर्श को पाकर मानों भीतर से खिल गया हो । फिर सरजू ने उनके समक्ष ही उस सिक्के को नदी के जल में प्रवाहित कर मानों मन ही मन कोई वरदान मांग लिया हो ! ये दृश्य देख उस लड़की ने पूछा पर सरजू मुस्कुराहट से उसे देखते हुए फिर कभी आइएगा तो मुलाकात होगी कहकर अपनी नाव लेकर वापस नदी की तरफ चल पड़ा ! दरअसल वो उस लड़की को वापस जाते हुए नहीं देखना चाहता था….और वो दोनों भी सरजू द्वारा सिक्के को नदी में डालने वाले इस सवाल के साथ वापस लौट गए…!
सरजू आज भी राह तकता है उसी स्पर्श की …..

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राघवेन्द्र चतुर्वेदी (वाराणसी )

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