भारतीय संस्कृति के ध्वजवाहक स्वामी विवेकानंद।

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नीरज कृष्ण

159वें जयंती पर आदरांजली समेत सादर नमन …..

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबाधत। क्षुरस्थ धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति ।। अर्थात- उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो। कठोपनिषद के इस सूत्र वाक्य का प्रयाग स्वामी विवेकानंद ने सदेव युवाओं को जागृत करने के लिए किया।

नव भारत का उदय होने दो। उसका उदय हल चलाने वाले किसानों की कुटिया से, मछुए, मोचियों और मेहतरों की झापड़ियों से हो, बनिये की दुकान से, रोटी बेचने वाले की भट्टी के पास से प्रकट हो। कारखानों, हाटों और बाजारों से वह निकले। वह नव भारत अमराइयों और जंगलों से, पहाड़ों और पर्वतों से प्रकट हो। विवेकानन्द, इस प्रकार नव भारत का उदय चाहते थे।

ओ ! युवा भारत !
क्या आप यह हृदयभेदी आहवान सुन रहे हैं? “उठो, जागो”!

यह वही ध्वनि है, जिसकी इस राष्ट्र को कब से प्रतीक्षा थी। यह वही ध्वनि है जिसने इस घोर राष्ट्र को घोर निद्रा से जगाया।

19 वीं सदी के उत्तरकाल में भौतिकवाद, व्यक्तिवाद, एकेश्वरवाद (‘मेरा भगवान् ही सच्चा है’ की मानसिकता जिसने लोगों को मत परिवर्तन करने के लिए बाध्य किया), अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए दूसरों का शोषण अपने चरम सीमा पर था। ऐसा लगता था, मानो परस्परावलंबन, संवेदनशीलता और आध्यात्मिकता जैसे मूल्य अपना आधार खोते जा रहे थे।

भारतभूमि जिसने इनको अपने राष्ट्रीय जीवन में उतारा था, ऐसा लगने लगा था कि इन सदिओं पुराने मूल्यों पर अविश्वास के कारण स्वयं गहरे संकट में है। परन्तु, चुनौतियों से सामना करने का इस चिरंतन राष्ट्र का अपमन ही मार्ग रहा है। भारत की ऐसी पृष्ठभूमि पर, श्रीरामकृष्ण परमहंस और उनके श्रेष्ठ शिष्य स्वामी विवेकानंद का प्रादुर्भाव हुआ।

स्वामी विवेकानंद ऐसे संन्यासी हैं, जिन्होंने हिमालय की कंदराओं में जाकर स्वयं के मोक्ष के प्रयास नहीं किये बल्कि भारत के उत्थान के लिए अपना जीवन खपा दिया। विश्व धर्म सम्मेलन के मंच से दुनिया को भारत के ‘स्व’ से परिचित कराने का सामर्थ्य स्वामी विवेकानंद में ही था, क्योंकि विवेकानंद अपनी मातृभूमि भारत से असीम प्रेम करते थे। भारत और उसकी उदात्त संस्कृति के प्रति उनकी अनन्य श्रद्धा थी। समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जो स्वामी जी या फिर अन्य महान आत्माओं के जीवन से प्रेरणा लेकर भारत की सेवा का संकल्प लेते हैं।

स्वामी विवेकानंद भारत माता के ऐसे ही बेटे थे, जो उनके एक-एक धूलि कण को चंदन की तरह माथे पर लपेटते थे। उनके लिए भारत का कंकर-कंकर शंकर था। उन्होंने स्वयं कहा है- ‘पश्चिम में आने से पहले मैं भारत से केवल प्रेम करता था, परंतु अब (विदेश से लौटते समय) मुझे प्रतीत होता है कि भारत की धूलि तक मेरे लिए पवित्र है, भारत की हवा तक मेरे लिए पावन है, भारत अब मेरे लिए पुण्यभूमि है, तीर्थ स्थान है।’

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भारत के बाहर जब स्वामी विवेकानंद ने अपना महत्वपूर्ण समय बिताया तब उन्होंने दुनिया की नजर से भारत को देखा, दुनिया की नजर में भारत को देखा। भारत के बारे में बनाई गई मिथ्या प्रतिमा खंड-खंड हो गईं। भारत का अप्रतिम सौंदर्य उनके सामने प्रकट हुआ। दुनिया की संस्कृतियों के उथलेपन ने उन्हें सिन्धु सागर की अथाह गहराई दिखा दी। एक महान आत्मा ही लोकप्रियता और आकर्षण के सर्वोच्च शिखर पर बैठकर भी विनग्रता से अपनी गलती को स्वीकार कर सकती है।

स्वामी विवेकानंद लिखते हैं- ‘हम सभी भारत के पतन के बारे में काफी कुछ सुनते हैं। कभी मैं भी इस पर विश्वास करता था। मगर आज अनुभव की हृढ़ भूमि पर खड़े होकर दृष्टि को पूर्वाग्रहों से मुक्त करके और सर्वोपरि अन्य देशों के अतिरंजित चित्रों को प्रत्यक्ष रूप से उचित प्रकाश तथा छयाओं में देखकर, मैं विनग्रता के साथ स्वीकार करता हूं कि मैं गलत था।

हे आर्यों के पावन देश! तू कभी पतित नहीं हुआ। राजदंड टूटते रहे और फेंके जाते रहे, शक्ति की गेंद एक हाथ से दूसरे में उछलती रही, पर भारत में दरबारों तथा राजाओं का प्रभाव सदा अल्प लोगों को ही छू सका- उच्चतम से निम्नतम तक जनता की विशाल राशि अपनी अनिवायं जीवनधारा का अनुसरण करने के लिए मुक्त रही है।

देशाटन के काल में नरेन्द्रनाथ ने भारत दशा का सभी तरह से प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया। सर्वत्र पुरातन भारत का गौरव, चाहे वह राजनीतिक, सांस्कृतिक, या आध्यात्मिक हो, उन्हें अपनी आँखों के सामने प्रबलता से दिखाई दिया। इस महान शिक्षा के चलते भारतीय समुदाय की दुर्गति की पीड़ा उनके मन में छा गई। जिससे उनकी यह इक्षा प्रबल हो गयी कि भारत की अवनति से सम्बंधित परेशानियो के उपशमन के लिए कुछ करना होगा। इस दिशा में संबल जुटाने के लिए वे एक रियासत से दूसरी रियासत में घूमते रहे।

भारत भ्रमण करके नरेन्द्रनाथ को पता चला कि धर्म ही भारत की शक्ति और सम्पदा है। अपने देश के प्रति प्रेम होने पर भी विवेकानन्द ने उसकी गलतियों को अनदेखा नहीं किया। लोगों की गरीबी, शिक्षा का अभाव और स्त्रियों की दुर्गति पर उनका ध्यान गया।
कन्याकुमारी में, वे अपनी यात्रा के अंतिम चरण में पहुंचे। अपने करोड़ों देश वासियों के दुःख से व्यथित ह्रदय लेकर, वे उस विराट समुद्र की लहरों को चिर कर दक्षिण सागर तट से कुछ दूर स्थित शिला पर बैठ कर पूरी रात गहरे ध्यान में मग्न हो गए। तीन दिन एवं तीन रात तक चला यह ध्यान ईश्वर के प्रति नहीं, अपितु उसी भारतमाता के प्रति था, जो स्वामी विवेकानंद के लिए भगवती दुर्गा की अवतार थी। तीन दिन व तीन रात 25, 26, 27 दिसम्बर 1892 को उस गहन ध्यान के पश्चात उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य खोज लिया। नरेन्द्रनाथ भविष्य में स्वामी विवेकानंद के रूप में परिवर्तित हुए।

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वास्तव में शिकागो की धर्म संसद में स्वामी जी की उपस्थिति भारत के इतिहास की महत्वपूर्ण घटना रही। श्री अरविन्द कहते हैं, “ विवेकानंद का (पश्चिम में) जाना… विश्व के सामने पहला जीता-जागता संकेत था कि भारत जाग उठा है… न केवल जीवित रहने के लिए बल्कि विजयी होने के लिए।” स्वामी विवेकानंद का स्वदेश लौटे विजयी वीर की तरह जय-ध्वनि के साथ स्वागत हुआ। यह किसी व्यक्ति की मात्र स्वदेश वापसी नहीं थी। यह तो भारत की आत्मा की वापसी थी।
शिकागो से लौटकर चेन्नई में दिए गये उनके प्रसिद्ध भाषण से एक अंश उद्धृत कर रहा हूँ………..

……युगों से जनता को आत्मग्लानि का पाठ पढ़ाया गया है। उसे सिखाया गया है कि वह नगण्य है। संसार में सर्वत्र जनसाधारन को बताया गया है कि तुम मनुष्य नहीं हो। शताब्दियों तक वह इतना भीरु रहा है कि अब पशु-तुल्य हो गया है। कभी उसे अपने आत्मन का दर्शन करने नहीं दिया गया। उसे आत्मन को पहचानने दो– जानने दो कि अधमाधम जीव में भी आत्मन का निवास है– जो अनश्वर है, अजन्मा है– जिसे न शस्त्र छेद सकता है, न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकती है; जो अमर है, अनादि है, अनन्त उसी निर्वीकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी आत्मन को जानने दो…”

“हम उस धर्म के अन्वेषी हैं जो मनुष्य का उद्धार करे …. हम सर्वत्र उस शिक्षा का प्रसार चाहते हैं जो मनुष्य को मुक्त करे। मनुष्य का हित करें,ऐसे ही शास्त्र हम चाहते हैं। सत्य की कसौटी हाथ में लो… जो कुछ तुम्हें मन से, बुद्धि से, शरीर से निर्बल करे उसे विष के समान त्याग दो, उसमें जीवन नहीं है, वह मिथ्या है, सत्य हो ही नहीं सकता। सत्य शक्ति देता है। सत्य ही शुचि है, सत्य ही परम ज्ञान है… सत्य शक्तिकर होगा ही, कल्याणकर होगा ही, प्राणप्रद होगा ही…यह दैन्यकारक प्रमाद त्याग दो, शक्ति का वरण करो….कण-कण में ही तो सहज सत्य व्याप्त है – तुम्हारे अस्तित्व जैसा ही सहज है वह…उसे ग्रहण करो”।

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“मेरी परिकल्पना है, हमारे शास्त्रों का सत्य देश–देशान्तर में प्रचारित करने की योग्यता नवयुवकों को प्रदान करने वाले विद्यालय भारत में स्थापित हों। मुझे और कुछ नहीं चाहिए, साधन चाहिए; समर्थ, सजीव, हृदय से सच्चे नवयुवक मुझे दो, शेष सब आप ही प्रस्तुत हो जाएगा। सौ ऐसे युवक हों तो संसार में क्रांति हो जाए। आत्मबल सर्वोपरि है, वह सर्वजयी है क्योंकि वह परमात्मा का अंश है… निस्संशय तेजस्वी आत्मा ही सर्वशक्तिमान है …”

’दिक्‍कत ये है कि दक्षिणपंथी हों या वामपंथी सभी इन मुद्दों पर ध्‍यान देने से कतराते हैं, रही बात विवेकानंद का नाम लेकर दुकान चला रहे झंडाबरदारों की, तो वो सिर्फ उतनी ही बातें सामने लाते हैं जिनसे उनकी दुकान जारी रहे। उनके लिये विवेकानंद का जिक्र ’उत्तिष्‍ठ’ जागृत से शुरू होता है और शिकागो वाले सम्मेलन के जिक्र पर खत्‍म हो जाता है। बस।’

‘भारत को समझने के लिए चार बिंदुओं पर ध्यान देने की जरूरत है। सबसे पहले भारत को मानो, फिर भारत को जानो, उसके बाद भारत के बनो और सबसे आखिर में भारत को बनाओ।’

भारत के निर्माण में जो भी कोई अपना योगदान देना चाहता है, उसे पहले इन बातों को अपने जीवन में उतरना होगा। भारत को मानेंगे नहीं तो उसकी विरासत पर विश्वास और गौरव नहीं होगा। भारत को जानेंगे नहीं तों उसके लिए क्‍या करना है, क्‍या करने की आवश्यकता है, यह ध्यान ही नहीं आएगा। भारत के बनेंगे नहीं तो बाहरी मन से भारत को कैसे बना पाएंगे ? भारत को बनाना है तो भारत का भक्त बनना होगा। उसके प्रति अगाध श्रद्धा मन में उत्पन्न करनी होगी।

यूरोप भ्रमण के दौरान गुरुदेवरवीन्द्रनाथटैगौर ने प्रसिद्ध चिंतक साहित्यकार रोमारोलां से कहा कि यदि भारत कोजानना चाहते हो तो विवेकानंद को पढ़ो -समझो, वहाँ सब कुछ सकारात्मक है नाकरात्मक कुछ भी नहीं मिलेगा।

नीरज कृष्ण
एडवोकेट पटना हाई कोर्ट
पटना (बिहार)

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