“भँवरों के देश सावन न बरसा कभी”

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“प्रतिभा की कलम से”

कहानी

सिहर उठा बाग का पत्ता – पत्ता तितली के शोक में .
अड़हुल ने ठंडी आह भर एक आंसू ढ़ुलकाया तितली की कब्र पर .
आह की तासीर निकली बहुत गर्म !

हिमालय की तलहटी में प्राकृतिक रूप से खिला हुआ एक बाग था .उस बाग में अनेक रूप – रंग के छोटे – बड़े फूल थे . सैकड़ों रंगीन तितलियों का उसमें आना- जाना था.तितलियों एक फूल से दूसरे फूल पर डोलती रहतीं .इठलातीं खूब अपने रूप पर.उन्हीं में वो लाल पंखो वाली तितली भी थी ,जो शोख और चंचल थी बहुत , मगर उसका दिल उतना ही सादा .हर फूल पर बैठती , बात करती. पूरा बाग उस पर फ़िदा था .हर कली उसकी दीवानी .दिन मस्तीभरे थे .
एक दिन दूर देश से एक श्यामल भँवरा उस बाग में आया . वो दिन – भर फूलों का पराग चूसता और गुंजन करता .लाल तितली को उसका गीत बहुत भाता और वो एक अड़हुल के पौधे पर बैठ उसके गाने का इन्तजार करती . भँवरा पराग चूसने में मगन बीच – बीच में उसे ताकता .फिर धीरे – धीरे वो भी उस अड़फूल के फूलों पर बैठकर तितली को निहारने लगा .
कहा किसी ने कुछ नहीं !
बस भँवरे की निहार और तितली का इन्तजार ही उन दोनों के बीच प्यार का इक़रार था.हिमालय का वो बसंत यादगार हो गया बाग के लिए . डालियां फूलों से लकदक टूट – टूट कर गिर पड़ती थीं . दिन धूप से चटकीले ,रात चांदनी में नहायी जान पड़ती थीं
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मौसम अब करवट चाहता था .वो बदलने लगा .फूलों का खिलना कम हुआ . भँवरे का आना भी कम होने लगा बाग में ,मगर तितली का भँवरे के लिए इंतजार बढ़ता गया .
तन्हाई से टूटकर एक दिन तितली ने मूक आंखो में पूछ ही लिया भँवरे से – ‘क्या तुम्हें अब मुझसे प्यार नहीं’ ??
भँवरा चीखकर बोला – नहीं !
‘मैं उकता गया हूं तुम्हारी शोखियों से .ये चमकीले पंख चुभते हैं मेरी आंखो में .मेरा काम है नित – नये फूलों पे मंडराना .मैं जा रहा हूं अब इस बाग से’ .
और वो उड़ चला अपने देश .
तितली का रोम – रोम घायल हो गया भँवरे की कांटे सी चुभती सच्चाई सुनकर.
वो रातभर रोती रही अड़हुल के फूल पर बैठकर .
नन्हीं सी तितली के थोड़े से आँसुओं से भीगकर भारी हो गये उसके हल्के से पंख .सुबह फूल में बंद उसकी निष्प्राण देह मिल गई मिट्टी में .
सिहर उठा बाग का पत्ता – पत्ता तितली के शोक में .
अड़हुल ने ठंडी आह भर एक आंसू ढ़ुलकाया तितली की कब्र पर .
आह की तासीर निकली बहुत गर्म !

सुनते हैं , उस बरस भँवरे के देश में सावन नहीं बरसा.

प्रतिभा नैथानी

                                    

1 thought on ““भँवरों के देश सावन न बरसा कभी”

  1. बहुत-बहुत शुक्रिया “संवाद सूत्र”।

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