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वैज्ञानिक गणना का पर्व है मकर संक्रांति।

आलेख

वैज्ञानिक गणना का पर्व है मकर संक्रांति।

नीरज कृष्ण

ॐ सूर्याय नमः च शिवाय नमः

“मकर संक्रांति” दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है, “मकर,” जिसका अर्थ है मकर राशि, और “संक्रांति,” जिसका अर्थ है संक्रमण। यानी कि सूर्य के एक राशि से दूसरे राशि यानी मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रांति कहा जाता है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश का हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है।

हमारा देश भारत उत्तरी गोलार्ध में स्थित है, इसलिए तमसो मा ज्योतिर्गमय का उद्घोष करने वाली भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतवर्ष के लोग इस दिन सूर्यदेव की आराधना एवं पूजन कर, उसके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।

मकर संक्रांति का महत्त्व सूर्य के उत्तरायण हो जाने के कारण है। शीत काल जब समाप्त होने लगता है तो सूर्य मकर रेखा का संक्रमण करते (काटते) हुए उत्तर दिशा की ओर अभिमुख हो जाता है, इसे ही उत्तरायण कहा जाता है। एक वर्ष में कुल 12 संक्रांतियां आती हैं। इनमे से मकर संक्रांति का महत्त्व सर्वाधिक है, क्योंकि यहीं से उत्तरायण पुण्य काल (पवित्र/शुभ काल) आरम्भ होता है। उत्तरायण को देवताओं के काल के रूप में पूजा जाता है।

संक्रांति वह घटना है जब (पृथ्वी से देखने पर) सूर्य किसी राशि प्रवेश करते हैं। इस तरह 12 संक्रांति होती है। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते है तो मकर संक्रांति होती है। इसी दिन सूर्य राशि का भी आरम्भ होता है। यह बहुप्रचलित भ्रान्ति है कि मकर संक्रांति को सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण होते है। जबकि सूर्य के उत्तरायण होने का दिन 22 दिसंबर है। पृथ्वी अपनी धुरी पर झुकी है। सूर्य की परिक्रमा के दौरान, सूर्य की और इस झुकाव की दिशा में बदलाव आता है। इस बदलाव के कारण मौसम होते है और दिन रात की लम्बाई में बदलाव आते है। कहा जाता है कि मकर संक्रांति के बाद से दिन लंबे होने लगते हैं और रातें छोटी। सूर्यास्त का समय धीरे-धीरे आगे खिसकने का मतलब है कि सर्दियां कम होंगी और गर्मी बढ़ेगी।

संक्रांति का मतलब है सूर्य का एक राशी से दुसरी राशी में गमन करना। मकर संक्रांति के दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि के अंदर प्रवेश करता है। इसी वजह से इस संक्रांति को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। इसी दिन सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण की अवधि को देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा जाता है।

सौर संवत्सर में मकर संक्रांति में सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण तक का सफर अत्यंत महत्वपूर्ण है। वैज्ञानिकों के अनुसार 21-22 दिसंबर के आसपास से ही दिन का बढ़ना शुरू होता हैं। इसलिए वास्तविक शीतकालीन संक्रांति 21 -दिसंबर या 22 दिसंबर जब उष्णकटिबंधीय रवि मकर राशि में प्रवेश करती है इसलिए वास्तविक उत्तरायण 21 दिसंबर को होता है। यही मकर संक्रांति की वास्तविक तारीख भी थी। एक हजार साल पहले मकर संक्रांति 31 दिसंबर को मनाया गया था। वर्तमान समय में साधारणतया 14 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाती है। वैज्ञानिक गणनाओं के अनुसार पांच हजार साल बाद मकर संक्रांति का पर्व फरवरी के अंत तक हो सकता है, जबकि 9000 वर्षों बाद में यह जून में आ जाएगा।

खगोलीय अवधारणा के मुताबिक सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने को मकर संक्रांति कहा जाता है। दरअसल हर साल सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट की देरी से होता है। इस 20 मिनट के अन्तर के कारण मकर संक्राति की स्थिति उत्तरायण से दूर होती जा रही है। करीब 1440 वर्ष पूर्व उत्तरायण व मकर संक्राति एक ही दिन अर्थात 22 दिसम्बर को ही होते थे। और संभवतः इसी समय यह भ्रान्ति आरम्भ हो गयी होगी। इस तरह हर तीन साल के बाद सूर्य एक घंटे बाद और हर 72 साल एक दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है।

इस तरह 2080 के बाद मकर संक्रांति 16 जनवरी को पड़ेगी। इसी संदर्भ यह उल्लेखनीय है कि राजा हर्षवर्धन के समय में यह पर्व 24 दिसंबर को पड़ा था। मुगल बादशाह अकबर के शासन काल में 10 जनवरी को मकर संक्रांति थी। शिवाजी के जीवन काल में यह त्योहार 11 जनवरी को पड़ा था।

विश्व की 90% आबादी पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में ही निवास करती है अतः मकर संक्रांति पर्व न केवल भारत के लिए बल्कि लगभग पूरी मानव जाति के लिए उल्लास का दिन है। भारत की सांस्कृतिक विरासत यूँ ही इतनी विविधताओं से आच्छादित नहीं है। इन सबके पीछे छिपा है जीवन का सनातन सिद्धांत। मकर संक्रांति सम्पूर्ण मानवता के उल्लास का पर्व है पर इसका उत्सव केवल हिन्दु समाज मनाता है क्योंकि विश्व बंधुत्व, विश्व कल्याण और सर्वे भवन्तु सुखिनः की उदात्त भावना केवल भारतीय संस्कृति की विशेषता है।

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