थाली का वो आखिरी ग्रास

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संस्मरण

श्रीमती एम जोशी हिमानी

अब गांव के गांव वीरान पड़े हैं. इंसानों ने पहाड़ों से पलायन कर लिया है लेकिन कुत्ते बेचारे कहां जायं, किस शहर में जाकर बस जाएं वे? यूं भी अब पहाड़ के शहरियों के बीच विदेशी नस्ल के कुत्ते पालने का क्रेज बहुत बढ़ गया है. ऐसे में स्थानीय कुत्तों को कौन पूछे?

अलो कल्वा!
अलो मोतिया!
अपना खाना ख़त्म करने के बाद थाली में आखिरी ग्रास घर के पालतू कुत्तों के लिए बचाकर उनको अपने सामने बुलाकर खिलाने की कितनी सुंदर परंपरा थी हमारे पहाड़ों में.
घर की महिलाएं चूल्हे से पहली रोटी गाय के लिए उतारती थीं और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए. यही कारण था कि गांव भर के कुत्ते भी उन दिनों भरपेट भोजन पा जाते थे. जितनी थालियों में भोजन परोसा जाता था, उतने गस्से कुत्तों के हिस्से के आने निश्चित थे. कुत्ते भी तो कितने समझदार, ठीक भोजन के समय दूर खेतों में घूमकर सीधे देली (देहरी) में पूंछ हिलाते हुए चुपचाप बैठ जाते थे.
मुझे नैनी (अपनी जन्मभूमि) की सभी बातों के साथ वहां के तीन परिवारों के बीच पले दो कुत्तों कालू और मोती की भी बहुत याद आती है. भोटिया प्रजाति के वे दोनों नर कुत्तों के भौंकने की आवाज भर से गुन-बानर खेतों से दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते थे. इंसानों के बीच भी उनका बहुत खौफ था. नैनी उन दिनों संतरा, नारंगी ,चूख ,अखरोट, काफल, आड़ू, नासपाती, दाडिम आदि फलों से लदे पेड़ों के लिए प्रसिद्ध थी. फल चुराने वालों की उन दिनों भी कमी नहीं थी. फिर नैनी की जनसंख्या गिनती में थी, ऊपर से नैनी जंगल के बीच में बसा अन्य गांवों से बहुत दूर. मतलब तमाम खतरों से घिरी बेचारी नन्ही नैनी. कालू, मोती जैसे वफादार कुत्ते नैनी की ताकत थे.
कई बार शाम के धुंधलके में बाघ उन पर घात लगाए आसपास छुपा रहता था. एक बार मोती को बाघ ने दबोच लिया था. कालू ने जो प्रहार किया बाघ पर कि वह मोती को अधमरा करके भाग खड़ा हुआ.
नैनी के सभी लोगों ने मिलकर घायल
मोती की बहुत सेवा की. उसके घावों पर तमाम लेप लगाये. उसके लिए तमाम तरह की जड़ी बूटियां खोजी गईं. लेकिन मोती फिर पहले जैसा नहीं हो पाया. वह घर के आसपास ही पड़ा रहता था. खेतों तक जा पाने में वह असमर्थ था. उसी हालत में कुछ महीनों बाद उसने दम तोड़ दिया था. पूरा नैनी उस दिन उदास था. कालू की आंखों से आंसू गिर रहे थे. वह अपनी गर्दन जमीन पर रखे मोती के लिए गमगीन पड़ा था. सच तो यह था कि मोती के घायल होने के बाद से कालू का जोर-जोर से भौंकना, उछल-कूद करना बहुत सीमित हो गया था.
बहुत जल्दी हमारे दूसरे बड़बाज्यू
कालू के साथ के लिए दूर के गांव से
एक छोटा सा भोटिया प्रजाति का ही छौना ले आए थे, जिसका नाम मोती ही रखा गया था ताकि मोती की कमी जल्द दूर हो जाए.
अब गांव के गांव वीरान पड़े हैं. इंसानों ने पहाड़ों से पलायन कर लिया है लेकिन कुत्ते बेचारे कहां जायं, किस शहर में जाकर बस जाएं वे? यूं भी अब पहाड़ के शहरियों के बीच विदेशी नस्ल के कुत्ते पालने का क्रेज बहुत बढ़ गया है. ऐसे में स्थानीय कुत्तों को कौन पूछे?
थाली के वे आखिरी ग्रास अब उनके भाग में कहां?
शहरों की तरह ही पहाड़ों में भी अब मरियल, कुपोषित कुत्तों की फौज जगह-जगह देखी जा सकती है.

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परिचय : एम जोशी हिमानी,
लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक
पूर्व सहायक निदेशक, सूचना एवं जनसंपर्क, विभाग, उत्तर प्रदेश, लखनऊ
प्रकाशित कृतियां-'पिनड्राप साइलेंस'
'ट्यूलिप के फूल' कहानी संग्रह
'हंसा आएगी जरुर'- उपन्यास
'कसक'- कविता संग्रह
संस्मरणात्मक पुस्तक 'वो लड़की गांव की' लिख रही हूं.
कुमाऊनी कविता संग्रह- 'द्वी आंखर'
का प्रकाशन विचाराधीन.
देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां-कविताएं प्रकाशित
संप्रति-स्वतंत्र लेखन

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