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“मन की वेदना”

आलेख

“मन की वेदना”

राघवेंद्र चतुर्वेदी

“वो कहना चाहता है अपने मन की हर उस वेदना को किसी अपने से जो उसे समझ सके ..जो महसूस कर सकें कि कितना कष्ट है इसके भीतर! पर वो कह नहीं पाता! आखिर कहेगा भी तो किससे?कौन है जो सुनेगा?वो भी वेदना? पीड़ा? दुःख?किससे अपेक्षा की जा सकती है कि वो आपकी सिर्फ सुने ही नहीं बल्कि समझ कर आपको ये बोध भी कराए कि घबराओ मत ये सबके जीवन में होता है।

प्राय: सबके जीवन में बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ होता है जिसे वो भीतर ही भीतर समेटे हुए घुट रहा होता है।उन बातों को उन पीड़ाओं को जो उसके अंतर्मन को हर पल चीरती रहती हैं और दुःख देती हैं। वो कहना चाहता है अपने मन की हर उस वेदना को किसी अपने से जो उसे समझ सके ..जो महसूस कर सकें कि कितना कष्ट है इसके भीतर! पर वो कह नहीं पाता! आखिर कहेगा भी तो किससे?कौन है जो सुनेगा?वो भी वेदना? पीड़ा? दुःख?किससे अपेक्षा की जा सकती है कि वो आपकी सिर्फ सुने ही नहीं बल्कि समझ कर आपको ये बोध भी कराए कि घबराओ मत ये सबके जीवन में होता है। पर ये संभव नहीं हो पाता!
क्यूंकि हर कोई सिर्फ़ स्वार्थ की सिद्धि के लिए ही आपसे जुड़ाव रखता है। हर व्यक्ति जो आपके जीवन में आपसे जुड़ा है उसके जुड़ाव में उसका स्वार्थ है जो सिर्फ़ उन पलों तक सीमित है जब तक आप उसके लिए उपयोगी हैं और आपसे सिर्फ़ ख़ुशियों की बारिश हो रही है ।
पर एक शाश्वत सत्य है दुःख में पीड़ा में व्यक्ति अकेला होता है। उस वेदना को उस पीड़ा को जब व्यक्ति बाहर नहीं निकाल पाता तो वो भीतर ही भीतर कुंठित हो याद करने लगता है अपने अतीत को, जहां से उसने जीवन की शुरुआत की और धीरे धीरे उसके आसपास के लोग और अपने किस प्रकार से बदलने लगे।
यही सोचते-सोचते जब वो वर्तमान में वापस आता है तो पुनः अपने आप को उसी बिंदु पर पाता है कि वो यकीनन अकेला है और उसे समझने वाला कोई नहीं।
माता- पिता से अपनी वेदना कहे तो कहे कैसे? माता-पिता तो पहले ही अपने दुःख कष्ट और लाचारी का गुणगान उसके सामने कर चुके हैं और भाई बहन सिर्फ उपहास करेंगे। यदि रिश्तेदारों से कहे तो जीवनपर्यंत तक बस तानों के शूल चुभना तय है। फिर अंत में बचे मित्र तो आज के समय में मन की वेदना को सुनने वाला और समझने वाला मित्र मिलना असंभव सा है।
फिर धीरे-धीरे वो स्वयं में घुटने लगता है माता-पिता की लाचारी, भाई-बहन का उपहास और मित्रों रिश्तेदारों के स्वार्थीपन की वजह से!
और यूं ही बस बना लेता है अपनी काल्पनिक दुनिया और संजोता है कोई अनकहा अनसुना ख़्वाब .. फिर बना लेता है कलम को अपना दोस्त और शब्दों को सारथी और इस तरह बन जाता है लेखक ! जिसके मन की वेदना की गहराई को मापने की क्षमता का आंकलन करना भी असंभव है…!

राघवेन्द्र चतुर्वेदी, बनारस(उत्तरप्रदेश)

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