……रिश्तों की कमजोर कड़ी खुद हम ही हैं।

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(टैडी डे पर विशेष)

नीरज कृष्ण

कई बार सोचते हैं कि एक कामयाब रिश्ते के लिए क्या कोई निश्चित नुस्खा (फॉर्मूला) हो सकता है? शायद नहीं… शायद हो। रिश्ता कोई भी हो; हर रिश्ता दोनों तरफ से निभाया जाता है और हर रिश्ते की अपनी एक सीमाएं होती है।। रिश्ता.. जिसमें दो लोग ऐसा क्या करें कि पूरी उम्र एक-दूसरे की ख्वाहिश हर कमी को पूरा करें एक दूसरे का हाथ थामे रहे।शुरू से हमें दुनियादारी में कुछ ऐसा गणित सिखाया जाता है कि हम हर बात में बोल-मोल करते हैं। इसके विपरीत रिश्तों में ये चालू रवैया सफल नहीं होता।

रिश्तों में परस्पर व्यवहार ऐसी दुनियादारी से अलग होता है और ज्यादा गहरा होता है। पुरानी कहावत है कि मोहब्बत करने वाले गणित में अकसर कमजोर होते हैं। रिश्ते में दोस्ती का भाव निहित हो तो रिश्ता जीवन के किसी भी पड़ाव पर बोझ नहीं लगेगा दोस्ती का रिश्ता हर रिश्ते से ऊपर होता है।

कामयाब रिश्ते के लिए दो लोग ऐसा क्या करें कि वे एक-दूसरे को खुशी और पूर्णता दे सके। क्योंकि दो अधूरे अलग-अलग विचारों, मानसिकता के लोग मिलकर ही जिंदगी को पूर्णता और सार्थकता दे सकते हैं। इसी तरह ईटी-सीमेंट से बने मकान को घर में तबदील कर सकते हैं। पुरानी कहावत है कि ताली दोनों हाथों से ही बजती है। रिश्तों को निभाने में कोई शर्त नहीं होती। इसमें वह बेमानी है कि मैंने तुमसे इतना प्यार किया, बदले में तुमने कितना किया। रिश्ते वहीं गहरे होते हैं जहां न मांग होती है और न ही सर्व साहिर के शेर को याद कीजिए मैंने क्यों प्यार किया, तुमने ना क्यों प्यार किया। इन परेशां सवालात की फितरत क्या है” सबसे गहरे और स्थायी रिश्ते वही होते हैं, जिसमें बदले में किसी भी तरह की कामना नहीं होती। आप अपनी तरफ से भरपूर दीजिए से और समझिए की सामने वाला भी आपको अपनी तरफ से भरपूर दे रहा है। स्वाभाविक है कि आपके और उसके ‘भरपूर’ में कभी भी कितना भी असंतुलन हो सकता है, लेकिन उसे गौण रखें और संबंधों को आगे बढ़ाएं।

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दुनिया में दुःखों की जड़ है एक दूसरे से अपेक्षा करना निराशा तभी होती है जब आप किसी से उम्मीद करते हैं। गहरे रिश्तों के लिए इस तरह की सोच त्याज्य है। एक-दूसरे को संभालते रहना, बार-बार उसे याद दिलाना कि आप उन्हें प्यार करते हैं ऐसे भाव रखने से रिश्तों में गहराई और स्थायित्व नहीं आ पाता। अक्सर अच्छे रिश्तों के लिए किसी एक पक्ष को भी दोनों का दायित्व निभाना पड़ सकता है। पहले किसी से रूठना और फिर दोनों के बीच एक बुद्ध विराम जैसी स्थिति का बार बार पैदा होना रिश्तों के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। देनों पक्षों को परिपक्व होना सीखना पड़ेगा।सफल रिश्ता वही होता है जहां एक छोटी-छोटी बातों को अनदेखा किया जाए। फिर भी यदि सामने वाले की नाराजगी दूर करने के लिए ‘सॉरी’ बोलना पड़े तो इसमें हर्ज ही क्या है, लेकिन समय के साथ हमें प्यार इतनी समझ देता है कि हम ही अपने में नाराजगी पैदा होने ही न दें।

जब दो व्यक्ति परस्पर रिश्ता स्थापित करते हैं तो उन्हें एक दूसरे की आदत भी नहीं बनना है और जरूरत भी नहीं आदत और जरूरतें समय के साथ-साथ बदलती रहती हैं, लेकिन भावनात्मक बंधन आपको ऐसे बदलावों से अछूता रखता है। भीड़ में किसी समारोह में, काम की जद्दोजहद, जिंदगी की भागदौड़ के बीच आपको उसका’ ख्याल आते ही चेहरे पर मुस्कान आए थकान दूर हो जाए, दिल को सुकून मिले तो समझिए आपके बीच का रिश्ता मजबूत है। उससे ज्यादा प्यारी बात यह है कि हम इस भ्रम को न पालें कि उसने मुझे 10 प्रतिशत दिया था मैंने 90 प्रतिशत बात यह है कि दोनों के बीच सौ प्रतिशत गहरा और सच्चा गहरा रिश्ता है। आप अपने आस-पास कई ऐसे परिवार देखेंगे जहां कोई एक लख गाड़ी चला रहा होता है और उनकी रिश्ते की डोर एकदम मस्त ट्रेक पर ठीक है क्योंकि कोई ऐसा खुशहाल घर तो है जहां किसी एक के गाड़ी चलाने से सब सही रहता है। जिंदगी का असल मजा तो तब आए जब दोनों बराबर के साथी हों। स्टेयरिंग किसी एक के हाथ में नहीं, बल्कि दो अलग-अलग हाथों से नियंत्रित की जाए। क्या खूबसूरत नजारा हो तब उसका भी अपना ही मजा है।

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असल में अनबन, रूठना मनाना, छोटा-मोटा लड़ाई-झगड़ा आपको हर रिश्ते में मिलेगा, क्योंकि दो बर्तन है तो आवाज तो आएगी ही और आनी भी चाहिए। तकलीफें गुस्सा, खराब समय ही वह दौर होता है जब आपके नकारात्मक विचारों से आपका साथी रूबरू होता है। रिश्तों में दोनों तरफ से हमेशा मिठास या सहमति रहे- जरूरी नहीं। अकसर हम अपनी व्यक्तिगत समस्याओं और उलझनों में घिर जाते हैं तो साथी का दायित्व है कि वह समझबूझ से काम लेकर उसे विपरीत स्थिति से उबारने में सहायक बने। यही बात दूसरे पक्ष पर भी लागू होती है।

सबसे जरूरी बात कि आप कितना जल्दी एक-दूसरे को मना लेते है। अब आप कहेंगे कि हर बार हम ही क्यों मनाएं… नहीं ऐसी बात नहीं है। बहुत आसान है किसी फिल्म या उपन्यास में लिखे वाक्यों पर भावुक हो जाना, जहां परस्पर प्यार और समझ इतनी सम्पूर्ण होती है कि यह मनाए या वह मनाए वह बेमानी हो जाता है। किसी एक की जिम्मेदारी नहीं है रिश्ता निभाना जितना जल्दी आपसी टकराव या झगड़े की उस चुप्पी को खत्म कर दिया जाए तो उतना ही बेहतर होगा दोनों में से किसी एक की चुप्पी ज्यादा समय तक कायम न रहे। आपकी परस्पर समझा तभी सार्थक है जब ऐसी स्थितियों से तुरत-फुरत बाहर निकला जाए। आप जगह देंगे तो कोई तीसरा जगह बना लेगा तो जगह मत दीजिए। मना लीजिए और आप मनाकर किसी अपने को ही अपने पास रखेंगे। निदा फाजली का एक शे’र बड़ा मौजू है ‘फासला नजरों का धोखा भी तो हो सकता है, वो मिले या ना मिले हाथ बढ़ाते रहिए।’

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जब दो जनों के बीच एक गहरा नाता है तो परस्पर एक दूसरे को झुकाना या झुकना बेमानी हो जाता है। असली प्यार वही होता है जो बिना किसी शर्त के स्थापित हो और फिर आगे पोषित हो। अतः मन से इस बचकाना विचार को त्याग दीजिए कि हमेशा में ही क्यों झुकू हमेशा में ही क्यों मनाऊं। आप झुककर अधिक बेहतर साथी बनते हैं।

परिस्थितियां ज्यादा ही बिगड़ जाएं तो भी अपने रिश्ते की वर्तमान परिस्थिति पर कोई भी निर्णय लेने से पहले अपने रिश्ते के बीते दिनों पर नजर दौड़ाएं। अपने रिश्ते के खुशनुमा दिनों को याद करें कि आप पहले भी अच्छे से से रहते आए हैं। आज अचानक ऐसा क्या हो गया कि आप अपने रिश्ते को खत्म करने या संदेह करने पर आमादा है। प्यार नहीं होता तो आप दो लोग एक साथ नहीं होते। प्यार तो है और प्यार रहेगा। सच्चे प्यार में रिश्ते बार-बार खत्म नहीं होते। थोड़ा धैर्य रखें, अपने साथी पर विश्वास रखें, उसकी बात सुने कि आखिर वह कहना क्या चाहता है। इससे ज्यादा नहीं तो कम से कम यह तो होगा कि मेरे साथी ने मेरी बात सुनी, मेरी बात को तवज्जोह दी हर रिश्ते में कुछ न कुछ उतार-चढ़ाव होते हैं और कोई भी रिश्ता अपने आप में सम्पूर्ण नहीं होता। बस रिश्ता चोझिल नहीं होना चाहिए। आपकी एक अनबन या झगड़ा आपके पूरे रिश्ते पर भारी नहीं पड़ना चाहिए।

कितना भी लड़ लें, झगड़ लें, एक-दूसरे को अपनी गलतियां गिनवा दें इन सबके बावजूद अमोल है परस्पर सम्मान की भावना। जब आप दोनों के बीच समझ और प्यार का गहरा भाव है तो आस-पास की शक्तियां उसे छू भी नहीं पाती।

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