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भगत सिंह से अनजान युवा पीढ़ी।

आलेख

भगत सिंह से अनजान युवा पीढ़ी।

23 मार्च: शहीद दिवस

नीरज कृष्ण

‘अमृत’ अर्थात जो मरा नहीं है, जीवित और प्राणवान है। हम सभी भारतवासी देश की स्वतंत्रता की कामना करते हैं और उसकी अमरता का स्वप्न देखते हैं, पर हम अक्सर स्वतंत्रता को काल के आयाम में एक बिन्दु के रूप में देखते हैं और भूल जाते हैं कि वह असंख्य भारतीयों की कुर्बानी का फल है। यह साम्राज्यवादी अंग्रेजों के साथ हुए बहु आयामी, लम्बे और जटिल संघर्ष की परिणति थी।

तीनों की मित्रता इसलिए सुदृढ़ और मजबूत थी क्योंकि उनकी विचारधारा एक थी। ये तीनों अद्भुत क्रांतिकारी विचारधारा के अनुयायी थे। तभी तो तो फांसी लगने से कुछ क्षण पहले तक भगत सिंह एक मार्क्सवादी पुस्तक पढ़ रहे थे, सुखदेव कुछ गीत गुनगुना रहे थे एवं राजगुरु वेद मंत्रों का गान कर रहे थे। जीवन की मस्ती इन्हें डी. ए.बी.कालेज लाहौर में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार के स्नातक जयचंद विद्यालंकार के विचारों से प्राप्त हुई थी।

भगत सिंह अपने समय के सबसे पढ़े-लिखे स्वतंत्रता सेनानियों में से एक माने जाते थे। लाहौर हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने कहा था कि ‘क्रांति की तलवार को विचाररूपी पत्थर पर ही तेज किया जा सकता है।’ लाहौर से लेकर आगरा तक उन्होंने पुस्तकालय खोले थे ताकि सेनानियों का अध्ययन प्रशिक्षण होता रहे।

उनका इस बात पर खास जोर था कि किसी भी विचारधारा का विरोध करने से पहले आप स्वयं को ज्ञान के हथियार से लैस कीजिए। उस विचारधारा को समझिए जिसका आप विरोध कर रहे हैं। खास बात ये कि इतना अध्ययन उन्होंने 17 वर्ष की आयु में शुरू कर 23 वर्ष की आयु में फांसी पर चढ़ने से पहले ही कर लिया था। वो ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे जो ज्ञानमार्गीय हो ताकि 98% जनता का उन 2% लोगों पर राज हो जिन पर सरकार और उद्योग चलाने की जिम्मेदारी है।

वे भारत के वर्तमान और भविष्य के लिए साम्प्रदायिकता, जातिवाद और मानव के शोषण की व्यवस्था को सबसे बड़ा खतरा मानते थे। उनका मानना था कि अंग्रेजों का राज देश से जाने के बाद भी क्रांति नहीं रुक सकती। यह क्रांति तभी पूरी होगी जब देश साम्प्रदायिकता और जातिवाद से पूरी तरह मुक्त होगा। और इसके लिए वे हर नागरिक का पूरी तरह शिक्षित होना जरूरी मानते थे।

भगत सिंह ने अपनी पत्रकारिता का सफर कानपुर से छपने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी के क्रांतिकारी अखबार प्रताप से 1925 में शुरू किया था। कानपुर में नौकरी करते वक्त वे दिल्ली में सांप्रदायिक दंगा कवर करने आए। दंगा दरियागंज में हुआ था। वे दिल्ली में सीताराम बाजार की एक धर्मशाला में रहे थे। अब आप लाख कोशिश करें पर आपको मालूम नहीं चल पाएगा कि वह धर्मशाला कौन सी थी जहां पर भगत सिंह ठहरते थे। वे नयागंज के नेशनल स्कूल में पढ़ाते भी थे।

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पर अफसोस कि इन दोनों शहरों में वे जिधर भी रहे या उन्होंने काम किया, बैठकों में शामिल हुए, उधर उनका कोई नामोनिशान तक नहीं है। यहां तक कि जिस स्कूल में भगत सिंह पढ़ाते थे उसका नाम भी भगत सिंह पर नहीं रखा गया।
भगत सिंह को एक क्रांतिकारी के रूप में जाना जाता है, उनको बम पिस्तौल और आतंक के माध्यम से अंग्रेजों को भारत से भगाने वाली विरादरी का महत्वपूर्ण सदस्य घोषित कर दिया गया है। लेकिन यह उनका अधूरा और एकांगी परिचय है।

भगत सिंह मूलरूप से एक राजनीतिक कार्यकर्ता थे। राजनीति उनका मुख्य क्षेत्र था, लेकिन उन्होनें सामाजिक, सांस्कृतिक सवालों पर भी अपने विचार प्रगट किए। अपने दौर में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों, देशी विदेशी प्रतिक्रियावादी ताकतों तथा उनके विचारों, धार्मिक कठमुल्लावादी, साम्प्रदायिकता जातिवाद जैसे मानव विरोधी धारणाओं के खिलाफ संघर्ष करते हुए उन्होंने जनवादी, समाजवादी विचारों को आजाद भारत के लिए प्रतिष्ठित किया, जरूरी माना उनके इन विचारों का आज भी महत्व है और अगर भारत भगत सिंह के विचारों और उनके चिन्तन से प्रेरणा ले कर चलें तों कई समस्याएं खतम हो सकती है और देश का विकास सभी की खुशहाली के साथ दिखने भी लगेगा।

भगत सिंह एक नए किस्म की भारतीयता की सम्भावनाओं में विश्वास करते थे। यह संकीर्ण राष्ट्रवाद पर आधारित नही बल्कि नजरिया अन्तरराष्ट्रीयतावादी था। भगत सिंह को हिंसा का पक्षधर माना जाता है, लेकिन इस प्रसंग में कई बातें और तथ्य भुला दिए जाते हैं। उनका मानना था कि आंतक और हिंसा सामाजिक बदलाव का आखिरी और कारगर रास्ता नहीं हो सकता।

जेल में भगत सिंह करीब 2 साल रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते रहते थे। जेल में रहते हुए भी उनका अध्ययन लगातार जारी रहा। उनके उस दौरान लिखे गये लेख व सगे सम्बन्धियों को लिखे गये पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं। अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूँजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेजी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था मैं नास्तिक क्यों हूँ।

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भगत सिंह ने अपने सात साल के छोटे से राजनीतिक जीवन और तेइस साल की छोटी सी उम्र में ही देश की स्वाधीनता के लिए चलाए गए क्रांतिकारी आन्दोलन का सार संकलन किया था और ऐसे भारतीय समाज का सपना देखा था जो दमन, अत्याचार, शोषण अन्याय जैसे मानव विरोधी मूल्यों से मुक्त हो और जहां सत्ता मजदूरों, किसानों, युवकों के हाथ में हो। भगत सिंह का मानना था कि आजादी से उनका मतलब ब्रिटिश सत्ता की जगह देशी सामंतो और पूंजीपतियों की सत्ता नहीं है ।

भगत सिंह संभवतः देश के पहले चिंतक क्रांतिकारी थे। वे राजनीतिक विचारक थे तथा निरंतर सक्रिय रहे। उनसे पहले या बाद में कोई उनके कद का चिंतनशील क्रांतिकारी सामने नहीं आया। भगत सिंह को फांसी की सजा मिलने के बाद कानपुर से निकलने वाले प्रताप और इलाहाबाद से छपने वाले भविष्य जैसे अखबारों ने उनके नाम से पहले ‘शहीद ए आजम’ लिखना शुरू कर दिया था।
अपने महापुरूषों की याद हमारे मन में भलें ही कमजोर पड़ गई हो, लेकिन जनता अपने नायक को पहचानने में कभी भूल नहीं करती। वह गांधी का आदर करती है तो भगत सिह को पूजती है। आजकल गांधी से अनेक वर्गों को शिकायत है। इस तरह की शिकायतें तब भी थीं जब गांधी जीवित थे। लेकिन आज तक कोई ऐसा नहीं मिला जिसे भगत सिंह से शिकायत हो।

भगतसिह भारत की जनता के वास्तविक हितों के बारे में ही सोचते थे। सिर्फ तेइस वर्ष तक जीवित रहने वाले इस महापुरूष ने विचार और धारणा के क्षेत्र में जैसी अद्भुत प्रगति की थी, वह सभी नौजवानों के लिए स्पृहा करने योग्य है। भगत सिंह के चिन्तन में हमें भारत की सभी समस्याओं का हल मिल जाता है। कुछ-कुछ वैसे ही, जैसे गांधी के विचार और आचरण में हमारी अधिकांश विफलताओं को सफलता में बदलने की शक्ति दिखाई देती है। देश आज जन पस्ती, निराशा, नाजीवाद के मकड़जाल में फसां है तब हमें एक बार फिर भगत सिंह के पास जाना चाहिए और उनका मत जो उनके विचारों में है, उसे जानना चाहिए।

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जगमोहन सिंह और चमनलाल ने अपनी किताब भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज में लिखा है कि भगत सिंह ने फांसी पर चढ़ने के कुछ समय पहले कहा था, जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है, तो किसी प्रकार की तबदीली से वे घबराते हैं। इस जड़ता को तोड़ने के लिए क्रांतिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत होती है, अन्यथा पस्ती और बर्बादी का वातावरण छा जाता है। प्रगति रूक जाती है और गतिरोध आ जाता है। इसे बदलने के लिए क्रांति की स्पिरिट ताजा की जाए ताकि इंसानियत की रूह में हरकत पैदा हो।

भारतीय समाज ने स्वतंत्रता को बड़े तप से अर्जित किया है। तब से आज तक देश में बहुत कुछ हुआ। देश की स्वतंत्रता का कोई मोल नहीं है। परन्तु समय बीतने के साथ स्वतंत्रता का सच भी लोक स्मृति से तिरोहित होता जा रहा है और स्वतंत्रता का आशय भी कुछ-कुछ ‘उन्मुक्तता’ जैसे अभिप्राय को व्यक्त करने वाला समझा जाने लगा है। हम यह भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता वस्तु न हो कर संयमित जीवन पद्धति होती है, जिसमे अपने को संचालित करने की व्यवस्था (स्वतन्त्र !) को चुनने की छूट होती है। इस तरह स्वतंत्रता निरपेक्ष न हो कर देश काल सापेक्ष होती है। सारी विसंगतियों के बीच देश की यात्रा एक अच्छे भविष्य के स्वप्न के साथ आगे चल रही है। द्वंद्व और संघर्ष जीवन्तता के भी लक्षण हैं। स्वतंत्रता का अमृत बना रहे और हम उससे तृप्त हों, इसके लिए हमें विवेक के साथ अपने दायित्व भी स्वीकार करने होंगे।

आज हमें फिर से सोचना होगा कि क्या हम वाकई में भगत सिंह को जानते भी हैं या नहीं। कोई भगत सिंह कैसे बन जाता है अपने विचारों की यात्रा से या फंसी पर चढ जाने से।

शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता है। इंकलाब जिंदाबाद का नारा बुलंद करके नौजवानों के दिलों में आजादी का जुनून भरने वाले भगत सिंह का नाम इतिहास के पन्नों में अमर है।

लिख रहा हूं मैं अंजाम आज, / जिसका कल आगाज आएगा,/ मेरे लहू का हर एक कतरा इंकलाब लाएगा, / मैं रहूँ या न रहूँ मगर वादा है तुमसे ये मेरा,/ मेरे बाद वतन पे मिटने वालों का सैलाब आएगा।
इंकलाब जिंदबाद ! इंकलाब जिंदबाद ! इंकलाब जिंदबाद !

नीरज कृष्ण,पटना (बिहार)

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