पेड़, पंछी और हमारा पर्यावरण।

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प्रतिभा की कलम से

आलेख

“नित नई पत्तियों का कारवां बढ़ता ही जा रहा है उस सूखी डाल पर जहां पंछी चोंच टिकाये बैठे हैं मीठी नींद के सपने चुगने। यह ख्याल आता हैं कि हमें प्राणवायु और शीतल छांह देने के अलावा ये पेड़ पंछियों के आशियाने और आँचल भी हैं। अपनी जरा सी सुविधा या लालच के लिए किसी पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाने से पहले क्यों नहीं हाथ कांपते हमारे?

प्रतिभा नैथानी

बवा के ख़ौफ के चलते घरों में ठिठके कदमों के साथ ही मन भी जैसे कैदी होकर रह गया है उदासी का।
सुबह-शाम का उगता-ढलता सूरज और हवा से हिलती पेड़ की पत्तियां देखकर ही कुछ चलायमान होने का एहसास होता है वरना तो सब कुछ रुका-रुका सा। हां ! विचारों को गति देने के लिए कुछ पंछी भी नजर आते रहते हैं। उन्हें जाने किस काम से है सुबह पूरब की ओर दौड़ लगाने की देर और शाम ढले पश्चिम लौट आने की अबेर। शाम का धुंधलका छाते ही वे इकट्ठा हो जाते हैं पेड़ों की डाल पर। पंछियों पर लाकडाउन नहीं। छत, आंगन, गार्डन, मुंडेर,.. कहीं भी बेरोकटोक आ-जा सकते हैं वे । अच्छी लगती है प्रकृति की यह दरियादिली।

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चांदनी रात में पेड़ों पर कतार में सोए पंछियों का दृश्य देखकर ऐसा लगता है जैसे किसी छोटे से स्टेशन पर रुके रेलगाड़ी के डिब्बे। पेड़ पर पंछियों के ऐसे सोने के दृश्य आम हैं, लेकिन जिस तरह मोबाइल टावरों के दुष्प्रभाव से बड़ी संख्या में पक्षियों की मरने और दृष्टिहीन शहरीकरण से उनके हमसे दूरी बना लेने की खबरें आ रही हैं, उससे यह चिंता तो बढ़ ही रही है कि किसी दिन ये डाल भी कहीं सूनी न हो जाए। इसलिए अब ये देखते रहना जरूरी लगता है कि घर के सामने वाले पेड़ पर अभी भी कुछ पंछी सो रहे हैं कि नहीं।पक्षियों को नन्हे बच्चों की तरह अपनी गोद में सुलाये पेड़ का मातृवत स्नेह देखकर मन भर आता है। पेड़ ख़ुश है इन नन्हे मेहमानों की आवाजाही से। नित नई पत्तियों का कारवां बढ़ता ही जा रहा है उस सूखी डाल पर जहां पंछी चोंच टिकाये बैठे हैं मीठी नींद के सपने चुगने। यह ख्याल आता हैं कि हमें प्राणवायु और शीतल छांह देने के अलावा ये पेड़ पंछियों के आशियाने और आँचल भी हैं। अपनी जरा सी सुविधा या लालच के लिए किसी पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाने से पहले क्यों नहीं हाथ कांपते हमारे?

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साल के एक दिन पर्यावरण दिवस मना लेने से हमें हासिल नहीं होंगी ये छोटी-छोटी खुशियां जो पेड़ और पंछियों की इस अंतरंगता में सदियो से हम महसूस करते आ रहे हैं।

प्रतिभा नैथानी

1 thought on “पेड़, पंछी और हमारा पर्यावरण।

  1. बहुत-बहुत आभार संवाद सूत्र

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