बल एक नौना (पुरुष) अर नौनी (स्त्री) के दिल में क्या अंतर है?

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लिख्वार : हरदेव सिंह नेगी


बल नौना का दिल मसाण की तरह होता है, स्वांणी अन्वार देखते ही पट लग जाता है, चाहे वो गाँव का मेला हो, ब्यो बरात्यों में ब्योंली के खाक में माला लेकर हिटने वाली स्याली हो, स्कूल कॉलेज हो, बजारों में किसी खास दिन बार हो, मतलब जख भी हो दिखेंण बार है लगने में देरी नहीं करता ये निरभगी दिल, भौत मैलुख होता है बैखों का दिल द्वी चार दिल रीता कमरा सदानी दगड़ा में रखता है, पर खास बात ये है कि जल्दी तूस जाता है नौना का दिल, नौना का दिल घाम जैंसा है, सुबेर लौंका अर ब्यखुनि तक डूब गया, किलै कि ब्यो का दिन भैजी की स्याली दिखी अर उसकी अन्वार द्वी चार दिन तक जिकुड़ा में रैती है, पर जब भितर बटि आवाज आती है एै लाटा नि च त्येरा भाग मा कुछ कमो धमो, तब कर स्यांणी, फिर मजबूरन दिल को तुसाना पड़ता है, मतलब बिलकुल मसाण की तरह “दिल ना हुआ ये तो मसाण हो गया देखते ही लग गया”
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दूसरी तरफ नौनी का दिल होता है, जो कि मैत्यों के देबता की तरह होता है, इतना जल्दी नहीं लगता है, जैंसे मसाण लगता है, ढंग से हरकता है परखता है, कै कोशिश भी कर लो, पर मजाल है कि लग जाये “इतना कठोर दिल होता है नौनी का, पर जब नौनी का दिल लगता है तो मैत्यों के देबता की तरह की मवासी हिला देता है, और जब तक ब्यो न हो तूसता नहीं है, कै खंड खिलाता है नौनी का दिल, कै पापड़ बेलाता है, जितनी भलि अन्वार उतना ही निठुर सरेल लेकर चलती है नौनी, अर जब नौनी का दिल लगता है और नौना न माने तो ब्योळ्या भी बना देता है,।।
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@ हरदेव नेगी
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