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मुक्तक

निशा”अतुल्य”

रंगों की बौछार में , भीगी सुन्दर नार ।
भागी बचने के लिए , पिचकारी की धार ।।
नीले पीले वस्त्र में , खुले खुले से बाल ।
हँसती है मन मोहिनी ,ले यौवन का भार ।।

अंग अंग थिरकन बढ़ी, लगा प्रेम का रोग ।
जोगन बन ढूँढू तुम्हें , कहते सारे लोग ।।
हँसती हूँ ज्यों कमलिनी, खिलता लगती फूल ।
मैं मूरत हूँ प्रेम की, बने मिलन के योग ।।

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फागुन के त्योहार में , उड़ता रंग गुलाल ।
छाई मस्ती प्यार की, लिए रँगीली चाल ।।
अंबर सारा रंग गया, बही प्रेम की धार ।
नशा रंग का चढ़ गया ,बिगड़ा सबका हाल ।

निशा”अतुल्य”

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