भीड़ भी तन्हाई भी है।

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निशा”अतुल्य”

भीड़ में अकेले सफर करती जिंदगी ,
तन्हाइयों में यादों के घेरे ,
लिए चलती जिंदगी ।
सफर में भीड़ भी ,
है तन्हाई भी ।
चलता जाता है
बेख़बर आदमी ,
कभी तन्हा,
कभी ले मेले साथ भी ।
सोच बदलती
क्यों नहीं ?
स्वयं से बाहर निकलती
क्यों नहीं ?
निकालते कमी दूसरों में
संभलते क्यों नहीं ?
कभी इंतहा प्यार की
लगाती मेले
कभी बेरुख़ी
बन बेहयाई बिखरती
कभी भीड़ ,कभी तन्हाई लगती ।
चलती जाती
ठहरती क्यों नहीं
जिंदगी ?
भीड़ भी तन्हाई भी है जिंदगी ।
इस भीड़ में सदा ही तन्हा है जिंदगी।
खामोश अंतर्मन से जूझती
बिखरी खड़ी होती जिंदगी ।
फिर भी अनवरत चलती
निखरती बिखरती
भीड़ बनती
तन्हा रहती जिंदगी ।

निशा गुप्ता “अतुल्य” (देहरादून)