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(डॉ भारती वर्मा बौड़ाई)

घर हैं
घर में आँगन भी हैं
पर दिखते नहीं पेड़,
रखे हैं
कुछ गमले
सीधी लाइनों में,
घर तो
बहुत बड़ा है
पर दिखते नहीं बुजुर्ग,
बच्चे भी
व्यस्त मोबाइल में
ऑनलाइन पढ़ाई/खेल में,
आँगन में बैठे
नाना-नानी दादा-दादी होते
तो मिलते खाने को
चावल/बाजरे के दाने
पीने को मिलता
मिट्टी के बर्तनों में रखा पानी
मन होता तो
उसमें नहा भी लेते,
सूने से
इन घरों के
आँगन में आने को
अब मन नहीं करता
सुबह-सुबह
गुनगुनाने का
मन नहीं करता
कोई हमारे
आगे-पीछे भाग-भाग कर
पकड़ने नहीं आता
बैठे हैं हम भी
दूर कहीं
बनाए अपने घोंसले में
चिड़े और बच्चों के साथ
अपने लालच
गलत आदतों के वश
मानव कहीं उजाड़ न दे नीड़
इसी भय से
डर-डर कर
निकलते नीड़ से
थोड़ा उड़ कर
घूम-घाम कर
लौट जाती हूँ मैं गौरैया!

और पढ़ें  "प्रेम"

डॉ भारती वर्मा बौड़ाई ,वरिष्ठ कवियित्री(देहरादून)

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