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कविता

(राघवेंद्र चतुर्वेदी)

प्रेम अनभिज्ञ रहा
अपनी मनोदशा पर
वो चाहता था चिंतन
पर मिली पीड़ा दायक मुक्ति..!

असमय वेदना
मन की चोट
हृदय की विवशता
धमनियों की व्याकुलता
प्रेम फिर भी अपूर्ण रहा..!

उन्मुक्त कामनाओं से परे
स्वाभिमान से परिपूर्ण
इबादत में लिपटा हुआ
स्नेहिल भाव से संचित
वो रिसता रहा अपनी पूर्णता को
प्रेम फिर भी प्रतीक्षारत रहा..!

और पढ़ें  धै लगा धवड़ि लगा।

वासनाओं से मुक्त
ईश्वरीय वरदान स्वरूप
मन की गहराइयों से उद्गम
स्वयं के महत्वाकांक्षा का त्याग कर
फिर भी न जाने क्यूं
प्रेम करूण रस में डूबा रहा..!

प्रेम सदैव अपूर्ण रहा फिर भी
प्रेम सुकून में है विश्वास में है…

प्रेम तुम में है ……!

राघवेन्द्र चतुर्वेदी(बनारस)

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