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राहुल गोस्वामी

रक्तिम लालिमा
से ढके हुए
क्षितिज के उस
अंतिम किनारे पर भी
तेरा नाम अंकित होगा
दिव्यलोक की
अप्सरा सी तुम
सौंदर्य सौम्य सौभ्य श्रृंगार रहित
प्रेम किंचित न शंकित होगा
सर्द हवाओं की
तपिश सहेगा
समुंदरी लहरों से भीगा
मन होगा प्रेम मगन होगा
धरती की चाह में प्यासा
नीलाम्बर गगन होगा
रुद्र मेघ का कम्पन्न
स्मृति पटल पर मुखर होगा
प्रेम वर्षा होगी
वाष्प का सघन होगा
निरन्तर होगा अविलम्ब होगा
आच्छादन लताओं के
ओढ़े जाएंगे
कल्पनाओं के सागर में
दिव्यस्वप्न गोते खाएंगे
खैर
सब चले जाएंगे जब
प्रारब्ध फिर से
खंगाला जाएगा
षड्यंत्र रचे जाएंगे
प्रकृति के विरुद्ध
ईश्वर से युद्ध
रचाया जाएगा
सीमाओं को
लांघा जाएगा
विवश होगा यदि
ब्रह्मांड कभी
फिर अपना मिलन
कराया जाएगा

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राहुल गोस्वामी

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