उत्तराखण्ड
अब हम बोझ नहीं
“राष्ट्रीय बालिका दिवस 24 जनवरी “
दीपशिखा गुसाईं
अब हम बोझ नहीं ,,
हाँ कब हम बोझ थे, जैसे आपने भाई को जन्म दिया वैसे ही मुझे भी तो अपनी ही कोख से जना फिर क्यों मुझे कहा कि मैं बोझ हूँ, मै भी स्पेशल बनूं आपकी नजरों में इसलिए बड़े भाई से भी ज्यादा काम कर लेती हूँ फिर भी मेरे होने पर क्यों आपको भी ताने दिए जाते घर के बड़े लोगों से ,,क्यों कहा जाता लड़की जात है आखिर लड़की जात कहकर मुझे क्यों हेय और कमजोर कहा जाता, मैं किस काम में कमतर हूँ ,,घर के कामों का सारा बोझ तो मैं ही अपने कंधो पर उठा लेती हूँ,,फिर कमजोर कैसे हुई, भाई तो अपना खुद का काम तक नहीं कर पता तो वो कैसे मजबूत हुआ और कई बार तो मुझे जनने तक की जहमत नहीं उठाते तुम, मेरी किलकारियां इतनी चुभती हैं क्या तुम्हें ,,लोग कहते माँ बाप कभी बच्चों में भेद भाव नहीं रखते तो फिर इतना भेद भाव क्यों? मुझे भी सारे हक़ चाहिए ,हाँ अब मैं कमजोर नहीं और न ही कभी थी ,,बस आपने ही समझा नहीं मुझे न तब न ही अब ???
आज राष्ट्रिय बालिका दिवस
कभी देखिएगा कि जिनके घर बेटियां होती कितनी रौनक दिखती ,,माँ भी कितनी निश्चिन्त होकर अपने काम करती, जानती कि उनके पीछे पूरे घर को संभल लेंगी बेटियां ,,तो फिर क्यों नहीं समझते ये सब ,,देखा होगा लड़कियां समय से पहले ही समझदार हो जाती हैं या यूँ कहें बना दी जाती हैं,,और एक लड़के को लड़का कहकर अच्छी खासी उम्र तक बच्चा ही बना रहने देते ,,सारे काम माँ या बहिने ही करती।
प्रश्न आखिर क्यों जरुरत पड़ी आज बालिका दिवस मनाने की, शायद हम जानते है कमी हममें ही और हमारी ही सोच में, आज भी बड़े बुजुर्ग बच्ची को कभी तो पूजते दीखते कभी लड़की जात ऐसे क्यों कर रही कहकर तिरस्कृत करते ,,और ये मत कहियेगा कि हमारे घर में ऐसा नहीं होता हम बहुत आधुनिक हुए ,,नहीं ये सिर्फ दिखावा ढोंग है बहुत कम लोग होंगे जो बेटे की चाह नहीं रखते आज भी, सोचकर देखो क्यों आप एक बेटी के बाद भी 10 साल इंतजार कर लेते दूसरे बेटे के लिए क्यों इस बीच कई बेटियों के खून से अपने हाथ रंगते, आज भी कई तथाकथित सभ्य शिक्षित ऐसे लोग देखे मैंने ,,,
आज यह आंकड़े भी दिखा रहे।
आज भारत में अगर लिंग अनुपात देखा जाए तो बेहद निराशाजनक है. 2011 में के हिसाब से भारत में 1000 पुरुषों पर 940 है. यह आंकड़े राष्ट्रीय स्तर पर औसतन हैं. अगर हम राजस्थान और हरियाणा जैसे स्थानों पर नजर मारें तो यहां हालात बेहद भयावह हैं. पंजाब में 893, राजस्थान में 877 और चढ़ीगढ़ में तो लिंग अनुपात 818 का है.
एक अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार वर्ष 1980 से 2010 के बीच इस तरह के गर्भपातों की संख्या 42 लाख से एक करोड़ 21 लाख के बीच रही है.,,
कितना दुर्भाग्य पूर्ण है ये सब ,,अगर हम सब कह रहे हम इनमे नहीं फिर ये आंकड़े किसके हैं, साथ ही ‘सेंटर फॉर सोशल रिसर्च’ का अनुमान है कि बीते 20 वर्ष में भारत में कन्या भ्रूण हत्या के कारण एक करोड़ से अधिक बच्चियां जन्म नहीं ले सकीं. वर्ष 2001 की जनगणना कहती है कि दिल्ली में हर एक हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 865 थी. वहीं, हरियाणा के अंबाला में एक हजार पुरुषों पर 784 महिलाएं और कुरुक्षेत्र में एक हजार पुरुषों पर 770 महिलाएं थीं।
भारत में एक मानसिकता है कि बेटे संपति हैं और बेटियां कर्ज. भारतीय परंपरा में हम सिर्फ संपति चाहते हैं, कर्ज नहीं. साथ ही पैसा भी एक ऐसा कारण है जिसकी वजह से लाखों कन्याएं जन्म लेने से पहले ही कोख में मार दी जाती हैं. वर्तमान वैश्वीकरण के युग में भी लड़कियां माता पिता पर बोझ हैं, क्योंकि उनके विवाह के लिए महंगा दहेज देना होता है. बालिकाओं की हत्या के लिए दहेज प्रणाली एक ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है जो सबसे बड़ा कारण है।
कन्या भ्रूण हत्या जटिल मसला है. असल में इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी स्त्रियों की जागरूकता ही है, क्योंकि इस संदर्भ में निर्णय तो स्त्री को ही लेना होता है. दूसरी परेशानी कानून-व्यवस्था के स्तर पर है. भारत में इस समस्या से निबटना बहुत मुश्किल है, पर अगर स्त्रियां तय कर लें तो नामुमकिन तो नहीं ही है. साथ ही शिक्षा व्यवस्था ऐसी बनानी होगी कि बच्चों को लड़के-लड़की के बीच किसी तरह के भेदभाव का आभास न हो. वे एक-दूसरे को समान समझें और वैसा ही व्यवहार करे।
लेकिन कई मामलों में यह भी देखने में आता है कि कई परिजन अपनी बच्चियों को पैदा होने के बाद सही माहौल नहीं देते. बालिकाओं को शुरु से ही घर के कार्य और छोटे भाई संभालने के कार्य प्राथमिकता से करने की हिदायत दी जाती है. जिस उम्र में उन्हें सिर्फ पढ़ाई और बचपन की मस्तियों की फिक्र करनी चाहिए उसमें उन्हें समाज के रिवाजों की रट लगवाई जाती है. ऐसे में अगर बालिकाएं आगे बढ़ना भी चाहे तो कैसे? और अगर घर से सही माहौल मिल भी गया तो समाज की उस गंदी नजर से वह खुद को बचाने के लिए संघर्ष करती हैं जो बालिकाओं को अपनी हवश को मिटाने का सबसे आसान मोहरा मानते हैं।
राहें चाहें कितनी भी मुश्किल हों लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर रात के बाद सवेरा होता ही है. आज चाहे बालिकाओं के विकास के कार्यों में हजारों अड़चनें हो लेकिन एक समय के बाद शायद कुछ सकारात्मक रिजल्ट भी निकले।
“दीप”
(आंकड़े गूगल से)
फोटो- Mayank Arya

