“रथयात्रा”

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लघुकथा

जुगेश चंद्र दास

उत्तराखंड की जिया” साहित्यिक ग्रुप द्वारा आयोजित लघु कथा प्रतियोगिता के क्रम में जुगेश चंद्र दास जी की रचना।

टन टन टन लंबी घंटी बजते ही बच्चों में धमाचौकड़ी मच गई ।कई बच्चे जल्दी-जल्दी बस्ता बांँधने लगे, कई बच्चे घर की ओर दौड़ने लगे, कई बच्चे सोचने लगे आज लंबी घंटी क्यों बजी? लंबी घंटी का मतलब तो पूरी छुट्टी? बच्चे खुशी से दौड़ दौड़ कर, चिल्ला चिल्ला कर, नाच- गाकर, घर की ओर दौड़ने लगे। बच्चें आ आ कर संजीव से पूछते गुरुजी पूरी छुट्टी हो गई?

संजीव को बहुत अच्छा लगता था, बच्चों की भाषा,बोली एवं उनके मन की छुट्टी की खुशी। अपने बचपन की भी याद उनको आने लगी, स्कूल की छुट्टी की याद, छुट्टी होने पर खुशी खुशी घर जाने,बरसात के समय कपड़े निकाल कर बस्ता में डालकर दौड़ दौड़ कर उछल कूद कर घर पहुंँचने की याद। गुरुजी को डरना, बड़े होकर मैं भी गुरुजी बन जाता तो कितना अच्छा होता यह सपना देखना और आज मैं भी खुशी बन गया। संजीव के अंदर एक खुशी की लहर दौड़ने लगी। कुछ ही क्षणों में स्कूल पूरा खाली। आज रथ यात्रा के लिए लंच टाइम में ही छुट्टी हो गई थी। संजीव कुछ दिन पहले ही स्कूल में नया पदभार ग्रहण किया था। उसे बच्चों के बीच बहुत ही आनंद आने लगा । अच्छा लगने लगा।

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आज से लगभग 45 वर्ष पहले की बात है अपने गांँव से लगभग 25 किलोमीटर दूर एक गांँव में प्राथमिक शाला में सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्ति हुई थी।आवागमन के साधन के अभाव से उसी गांँव में रहता था। उस समय विकास नहीं हुआ था। बिजली सड़क पानी की व्यवस्था बिल्कुल नहीं थी। बरसात में तो बहुत ही कष्ट उठाना पड़ता था। चारों तरफ गांँव छोटे बड़े नालों से घिर जाता था ।गांँव में ,गलियों में कीचड़ का राज था ।गांँव तक पहुंँच मार्ग था ही नहीं। दुर्गम मार्ग से पैदल चलकर ही गांँव पहुंचना पड़ता था।

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जल्दी छुट्टी होने के कारण संजीव अपने गांँव के लिए निकले 3 किलोमीटर पैदल चलकर एक गांँव पहुंँचा जहांँ अपना साइकिल छोड़ता था, वहांँ से फिर साइकिल से घर की ओर निकले।
जुलाई का महीना था, बहुत दिनों से पानी नहीं गिरा था, भीषण गर्मी थी। करीब आधे रास्ते पार होने पर रास्ते के किनारे एक वृद्ध महिला उसके पास शायद उनकी बहू एवं बेटे दिखे, वृद्ध महिला जमीन पर लेटी हुई थी , शायद उन्हें कुछ परेशानी थी।कौतूहलवश संजीव ने पूछा क्या हो गया? बेटे ने बताया मांँ अचानक बेहोश हो गई,हम लोग खेत में काम करने आए थे, अत्यधिक गर्मी,उमस के कारण मांँ को बेचैनी लगने लगी और माँ बेहोश हो गई।

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संजीव ने कहा क्या मैं कुछ मदद कर सकता हूंँ? चलिए मैं साइकिल में बिठाकर आपके घर तक पहुंँचा देता हूंँ। साइकिल के पीछे माताजी को बिठाया। बेटे ने मांँ को संभाल लिया और संजीव साईकिल का हैंडल संभाल लिया। धीरे धीरे पैदल माताजी को लेकर निकले करीब 1 घंटे में उनके घर पहुंँच गए। पैदल चलने की थकान गर्मी और पसीने से संजीव लथपथ हो गया था। लेकिन संजीव को मानसिक कोई कष्ट नहीं था। उनकी आत्मा को परम शांति मिली। पुण्य- कर्म कर पाने का अवसर पाकर एक सुखद अनुभूति हुई। मन में खुश हो वह कहने लगा, आज की मेरी रथ यात्रा पूर्ण सफल हुई।आत्म संतुष्टि एवं सुखद अनुभूति के साथ संजीव साईकिल में सवार हो अपनी मांँ से मिलने घर के लिए निकल पड़े।

जुगेश चंद्र दास