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(कविता)

अनिता मैठाणी

अप्राप्य ही रहे
करीब रहकर भी,
कितने यकीन से
बुनते थे भविष्य;
जैसे माँ सलाइयों में
धागों के फंदे डाल
बुन देती थी स्वेटर!
मेरे लिए
और तुम्हारे लिए भी
हर साल!

मुलाकात दर मुलाकात
यकीन का बढ़ना,
कि हम यूं ही साथ रहेंगे।
साथ चलते हुए अक्सर
सफेद चंपा के नीचे
तुम्हारा रूकना
और तुम्हारे रूकने पर
तुम्हारी आँखों में झांकना
प्रिय शगल था मेरा
या फिर हमारा!

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मेरे घर की खिड़की का
वो झीना पर्दा
जो तुम्हारे गली से गुजरने
की चुगली करता;
और मैं प्रकाश की गति से
आंगन में पहुँच जाता-
कहाँ … कहते हुए
साथ हो लेता
परछाई बनकर!

एक और रास्ता भी तो था
क्यूं तुम उधर से नहीं गुजरती थी,
जिस ओर मेरे घर की दीवार में
कोई खिड़की नहीं थी।
अब सोचता हूँ काश!
तुम रोज वहाँ से नहीं गुजरी होती
तो; ना ही बढ़ता यकीन।
ना ही उठती हूक आज भी
न ही दिल गाता आज भी
याद आती रही ….

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अनीता मैठाणी(देहरादून)

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