“नदी एक स्त्री”

ख़बर शेयर कर सपोर्ट करें

कविता

रत्नेश अवस्थी

नदी  जिसका पिता पर्वत,
और प्रियतम समुन्दर होता है,
जो हमेशा जीती है परहित के लिए,
कभी नही माँगती दुनिया से कुछ भी,
बस चलती रहती है अपनी धुन में,

उसे मिलते हैं जङ्गल, जानवर, पत्थर और झरने,
जिनको प्रेम बाँटती हुई,
अपनी छाती का वात्सल्य लुटाती हुई,
बढ़ जाती आगे अपने रास्ते पर,

और पढ़ें  मुझे माफ करना

रास्ते में उसे अनगिनत रूप में पूजा जाता है,
और सुनाई जाती हैं अनगिनत गालियाँ,
रोका जाता उसके रास्ते को,
कंकर, पत्थर और बाँध बनाकर,
ता कि वो कैद हो सके चार दीवारों में,

लेकिन नदी फिर भी नाराज नही होती,
क्योंकि उसकी कोख में पलता है जीवन,
उसे तो जीना होता है सबकुछ सहते हुए,
क्योंकि उसे देना है दुनिया को नया जीवन,

और पढ़ें  हम तेरी गलियों में "मौसम" के बहाने आएंगे।

लेकिन जब वो क्रुद्ध होती है,
तो मिटा देती उन पत्थरों का अस्तित्व,
तोड़ देती है सारे बाँध जो उसे रोकते हैं,
ले आती है बाढ़ और लड़ती है स्वयं,
और जीत लेती है अपने अधिकार,

वो जब पा जाती है अपने मन का मैदान या रेत,
तो हो जाती है बिल्कुल शान्त,
और सुनाती है कल-कल का संगीत,
फैलाती है खुशियाँ, समृद्धि और हरियाली,
बिल्कुल उस स्त्री की तरह,
जिसे मिल जाती मन चाही स्वतंत्रता,

और पढ़ें  हिमालय को जिंदा रखना है, तो उसे सगा समझिए

अन्त में मिलती है अपने प्रियतम से,
और समाप्त कर लेती है स्वयं अपना अस्तित्व,
और खारी हो जाती है एक विवाहित स्त्री की तरह,
जिसका उपनाम से लेकर घर तक,
कुछ भी अपना नही रहता…

© रत्नेश अवस्थी ( उन्नाव, उत्तर प्रदेश)

1 thought on ““नदी एक स्त्री”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *