कविता
“बसंत पंचमी त्यवार”
(हरदेव नेगी)

सार्यूं पसरी गे पिंगळी बहार,
बौड़ी एैग्ये पंचमी त्यवार,
म्वोर संगार जौउ लगाला,
गौं -गौं बरमा जी पंचमी बाँचला।।
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दिशा ध्यांण मैतुड़ा आईं होली,
खुदेड़ घुघती बासंणी होली,
क्यदार की कांठ्यों ह्यूँ चमकुणु होलु,
यखि कखी म्येरु मन कबळांणु होलु।।
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अपड़ी -अपड़ी बिरत्यूँ मा औजी जाला,
पँचमी की डड्वार तौं सणी द्यूला,
तौं तैली सार्यूं फ्योंलि हैंसड़ी चा,
घर की ड्येळी मा घिंदूड़ी हैंसड़ी चा।।।
हरदेव नेगी,गुप्तकाशी(रुद्रपयाग)

