“धुएं वाली ट्रेन”

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(ध्रुव गुप्त)

इन दिनों सपनों में ट्रेनें बहुत आ रही है
डीजल या बिजली वाली नहीं
बेतहाशा धुएं वाली वह छुकछुकिया ट्रेन
जिनके जादू के साये में
हमारी-तुम्हारी एक उम्र बीती थी

हमारे गांव के स्टेशन से तब
इक्का-दुक्का गाड़ियां ही गुज़रती थीं
शाम की आखिरी ट्रेन की सीटी सुनते ही
हम-तुम दौड़ जाते थे स्टेशन की ओर
हमारे लिए तिलिस्म जैसा होता था
एक दूसरे का हाथ पकड़े
स्टेशन पर तेज-तेज सीटी मारती हुई
ट्रेन का आकर रुकना
और इक्का-दुक्का सवारियों को लेकर
छुक-छुक करती चल देना

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जादू होती थी इंजन से निकलने वाले
कोयले के काले धुएं की महक भी
एक गहरी सांस के साथ
धुएं को भीतर खींचकर खड़े-खड़े
दूर सफ़र पर निकल जाने का वह अहसास
मुझे अब भी नहीं भूला है
पता नहीं तुम्हें वह महक याद है कि नहीं

अब नहीं आती वैसी ट्रेनें
सीटी और धुएं का वह जादू भी न रहा
और तुम भी तो नहीं हो अब साथ
लेकिन अब भी सांसों मे महसूस कर
कोयले, भाप और तुम्हारी मिली-जुली गंध
निकल जाया करता हूं उस सफर पर
जिसपर धुएं वाली वह ट्रेन तुम्हें लेकर
एक दिन कहीं दूर निकल गई थी
और तुम्हें लेकर फिर कभी नहीं लौटी।

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ध्रुव गुप्त,

साहित्यकार, सेवानिवृत आई पी एस अधिकारी, पटना, बिहार

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