आलेख
लक्ष्य”:::::
मधुबाला पुरोहित
बाबू मोशाय जिन्दगी लम्बी नही बड़ी होनी चाहिये।।
चर्चा उस विषय पर जिसमें हमारा भूतकाल,वर्तमान और भविष्य़ निर्भर करता है।संघर्षो से घिरा जीवन हमे कर्तव्यों का निर्वहन करने मे बाध्य करता है।उस कार्यप्रणाली की प्रक्रिया के अन्तर्गत हमे अपने उन उद्देश्यों का बोध या तो नगण्य होता है या हम उसे भूल चुके होते हैं ।
हम अपनी दैनिक प्रक्रियाओ मे इतना लिप्त होते हैं कि हमे ये आभास तक नही होता कि हम सिर्फ जीवन का निर्वहन मात्र कर रहे हैं ।
कुछ आर्थिक विषमताएं और कुछ मूलभूत कारण की वजह से भटकाव की स्थिति का उत्त्पन्न हो जाना ही एकमात्र जीवन जीने का विषय बन जाता है ।जिसे हम कह सकते हैं कि जीवन खींच रहा है।
परंतु कुछ बड़ा हासिल करने के लिये आपको जूनून की वो हद पार करनी होती है जो हमे अनंत की ओर अग्रसर करती है।हमारे हौसले हमे बुलंदी के उस मुकाम तक ले जाने मे सबसे ज्यादा मददगार होते हैं ।कर्तव्यता के साथ साथ यदि हुनर भी शामिल कर लिया जाए तो जीवन नूर से कोहिनूर हो जाता है।
मानवता की परिभाषा मानवमात्र हो जाना ही नही अपितु परिकल्ल्पनाओं को उँची उड़ान के साथ इंद्रधनुषी रंगो से सराबोर कर जीवन को परिभाषित करने का उद्देश्य लेकर आगे बड़ कर अपने लक्ष्यों को साकार करने का बीड़ा उठाएं तो आपकी प्रतिभा आपका हि नही बल्कि देश को भी गौरवशाली होने का प्रतीक बनाती है।
तब हम मानवता को हि नही देश के गौरव का भी मान बढ़ाते हैं।

