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ये दुःख काहे खत्म नहीं होते …

आलेख

ये दुःख काहे खत्म नहीं होते …

व्यंग

हरदेव नेगी

देहरादून रिस्पना पुल से श्रीनगर गढ़वाल जाने वाली बुलैरो में बीच वाली सीट पर बैठा था, बगल में एक बोडी और बोडा बैठे थे,,,, आगे की सीट पर ज्वान मैरिड कपल, बीच में एक सीट और खाली थी, पीछे भी एक,,,, इतने में एक लड़का आया अंदर झांका फिर बाहर मुंडली करके इधर उधर देखने लगा,,,,,, डिरैबर भैजी से कुछ बात करने लगा,,,, फिर बुलैरो के पास आया,,,, और साहस कर झिझकते हुए बोला,,,, बल भैजी थोड़ा एडजस्ट कर सकते हो,,,, मैने कहा क्यूं नहीं, बैठो,,,, अरे भैजी मेरा मतलब है कि पीछे की सीट पर बैठ सकते हो बल,,,, मेरे साथ कोई और भी है,,,,, उनको रींग लगती है,,,,।।। कर लो भैजी एडजस्ट,,,, इतने में फिल्मी स्टाईल में भाईसाब की न्यू नवेली ब्वारी ने लड़के की गर्दन के पीछे से अपनी मुंडि खिसकाई,,,,, और स्वांणी मुखड़ी को रूंड़ादी करके मेरी तरफ देखने लगी,,,,,, मैं किसी भी प्रकार की समाज सेवा के मूड़ में नहीं था,,,, कि सीट दे दूँ, सीजन के टाइम में सीट मुश्किल से मिलती है,,,,,

इतने में बगल पर बैठा बोडा बोल बैठा, अरे बेटा कर दो एडजस्ट, तुम अभी जवान हो पीछे बैठ सकते हो,,,, तो मैने कहा बोडा जी ये भी जवान ही हैं, नयु नयु तो ब्यो हो रखा है,,,, तुम्हारा मतलब क्या है? ब्यो के बाद इंसान बूढ़ा हो जाता है क्या? बोडी बोली ऐ मेरा लाटा बैठ जा पिछनै,,,, बोडी ने इमोशनल कर दिया,,,,, आगे वाले न्यू मैरिड कपल ने 45 डिग्री अपनी गर्दन मोड़ते हुए मेरी तरफ ऐसा देखा,,, जैसे मैने ही इनका कन्यादान करवाया हो,,,,, 😎।। जैंसे मेरी ही गलती हो,,,,इतने में डिरैबर भी आ गया अरे भैजी कर दो यार,,, बस निकलते हैं,,, सूछ्म सामाजिक दवाब में मुझे पीछे एडजस्ट होना पड़ा,,,,,,

पीछे बैठते ही द्वी झंणों का चेहरा ऐसा खिल उठा जैंसे तहसील में मैरिज सर्टिफिकेट जाते ही बन जाने पर खिलता है,,,, या फिर लिव इन रिलेशनशिप वाले कपलों के घर वाले उनकी शादी के लिए राजी हो जाए।।।। फिर भनियावाला से लड़की ने अपने पर्स से लेज और एक लीटर माजा निकाला,,,, सफर का आनंद लेने लगे,,,,,, डरैबर भाईसाब ने चलती गाड़ी में ही गोल्डन का डोज बना कर मुह में रख दिया,,,, आगे बैठे कपल एक दूसरे के कांधे पर सर टिकाकर हैडफोन लगा कर,,,,,, मस्त मगन हो गए,,,, बोडा बोडी फसोड़ पट सो गए,,,,,, तीन धारा में चौहान होटल में दोनों कपलों दो परांठे चट कर दिए,,,, फिर लूंण लगाकर काखड़ी खाई,,, आगे के सफर के लिए भुटा भी रखा,,,,, देवप्रयाग आते ही चलती गाड़ी से रील्स बनाई,,,,,,, ।
पर रास्ते भर उसको रींग नहीं लगी,,,,,,,, ।।
रींग तो हम पीछे वालों को लग रही थी जो एडजस्ट किए गये थे,,,, अंदड़े पैंदड़े एक हो गए थे,,,,, थरा ररा प्वां प्वां हमारे वर्तमान का हो रहा था,,,,,,
सिंगल लोंडो को ही रियल लाईफ में एडजस्ट करना पड़ता है,,,,,,

श्रीनगर आते ही द्वी नये नवेले कपलों ने धन्यवाद भी नहीं कहा,,,, निरदैयी दुनिया।।।
सचि धारी देवी होगी तो न्यौ निसाब करेगी।
क्यूंकि एक टाइम पर पीछे सैठे चारों लड़के आगे बैठे थे,,,,
कनक्वे ठैलंण अब भारि गरि व्हेगि जिंदगी

हरदेव नेगी,गुप्तकाशी(रुद्रप्रयाग)

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